सिफारिशी जिलाध्यक्षों पर गिरेगी गाज

  • दतिया बवाल के बाद एक दर्जन से ज्यादा जिलाध्यक्षों की कार्यशैली होगी जांच
  • गौरव चौहान
जिलाध्यक्षों

दतिया उपचुनाव में टिकट वितरण के बाद सामने आए विरोध और इस्तीफों ने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को संगठनात्मक स्तर पर बड़ा संदेश दिया है। अब पार्टी का फोकस केवल उपचुनाव नहीं, बल्कि पूरे संगठन को अनुशासन की कसौटी पर कसने पर है। सूत्रों के अनुसार, विधायकों और मंत्रियों की सिफारिश पर बने ऐसे जिलाध्यक्ष, जिनकी निष्ठा संगठन से अधिक किसी नेता के प्रति मानी जा रही है, उन्हें पद से हटाया जा सकता है। ऐसे एक दर्जन से अधिक जिलाध्यक्षों की सूची तैयार होने की चर्चा है।
भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश संगठन को स्पष्ट संकेत दिए हैं कि संगठनात्मक पदों पर बैठे पदाधिकारियों की प्राथमिक जवाबदेही पार्टी के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी व्यक्ति विशेष के प्रति। दतिया में प्रत्याशी चयन के बाद जिला संगठन के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं द्वारा सामूहिक इस्तीफे तथा खुले विरोध को नेतृत्व ने गंभीर अनुशासनहीनता माना है।
उपचुनाव के बाद शुरू होगी संगठन की समीक्षा
सूत्रों के मुताबिक दतिया उपचुनाव समाप्त होने के बाद प्रदेश के सभी संगठनात्मक जिलों की विस्तृत समीक्षा की जाएगी। इसमें जिलाध्यक्षों और प्रमुख पदाधिकारियों के कामकाज, संगठन के प्रति उनकी सक्रियता और नेतृत्व के प्रति उनकी निष्ठा का मूल्यांकन होगा। जिन पदाधिकारियों का झुकाव संगठन से अधिक किसी मंत्री, सांसद या विधायक की ओर पाया जाएगा, उन्हें बदला जा सकता है। पार्टी का मानना है कि संगठनात्मक पद किसी नेता की सिफारिश से नहीं, बल्कि संगठन के प्रति प्रतिबद्धता के आधार पर चलने चाहिए। इसी कारण अब जिलाध्यक्षों की कार्यशैली का परीक्षण किया जाएगा।
दतिया बना बड़ा कारण
दतिया उपचुनाव में पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिलने के बाद जिला अध्यक्ष सहित कई पदाधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया था। कई कार्यकर्ताओं ने खुलकर विरोध प्रदर्शन भी किया। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि इससे संगठन की सार्वजनिक छवि प्रभावित हुई और यह संदेश गया कि जिला संगठन केंद्रीय निर्णयों के साथ खड़ा नहीं है। दिल्ली से जुड़े सूत्रों का कहना है कि प्रत्याशी चयन का निर्णय केंद्रीय स्तर पर हुआ था, इसलिए उसके खिलाफ सार्वजनिक विरोध को पार्टी ने अनुशासनहीनता माना है।
फिर लौट सकते हैं संगठन मंत्री
दतिया प्रकरण के बाद भाजपा एक बार फिर जिला और संभाग स्तर पर संगठन मंत्री नियुक्त करने पर विचार कर रही है। इनकी भूमिका संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय बनाए रखने, अनुशासन की निगरानी करने तथा कार्यकर्ताओं की समस्याओं और सुझावों को प्रदेश नेतृत्व तक पहुंचाने की होगी। पार्टी का मानना है कि संगठन मंत्री की सक्रिय व्यवस्था से जिलों में असंतोष समय रहते दूर किया जा सकेगा और भविष्य में दतिया जैसी स्थिति बनने से रोका जा सकेगा।
निकाय चुनाव से पहले संगठन होगा दुरुस्त
भाजपा अगले वर्ष प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनावों की तैयारी अभी से शुरू कर रही है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि मजबूत संगठन ही चुनावी सफलता की कुंजी है। अगले महीने होने वाली प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के बाद भाजपा पूरी तरह निकाय चुनाव की तैयारियों में जुट जाएगी। उससे पहले प्रत्येक जिले के संगठन की समीक्षा कर आवश्यक बदलाव किए जा सकते हैं।
वरिष्ठ नेताओं ने भी उठाए सवाल
भाजपा के वरिष्ठ नेता रघुनंदन शर्मा पहले ही सार्वजनिक रूप से यह मुद्दा उठा चुके हैं कि कई जिलों में संगठन की कमान मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के करीबी नेताओं को दी गई है। उनका कहना है कि ऐसे जिलों में यदि संबंधित नेता कमजोर पड़ता है तो पूरा संगठन भी प्रभावित हो जाता है। पार्टी अब इसी स्थिति से बचने के लिए संगठन को व्यक्ति-आधारित नहीं, बल्कि संगठन-आधारित बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।

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