54 में से 27 जलाशय आधे से अधिक सूखे

जलाशय
  • कमजोर मानसून ने बढ़ाई चिंता, पेयजल और बिजली उत्पादन पर मंडराया संकट

    भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश में मानसून की धीमी रफ्तार अब सीधे जलाशयों के जलस्तर पर असर दिखाने लगी है। जुलाई का आधा महीना बीतने के बावजूद प्रदेश के अधिकांश प्रमुख बांध अपेक्षित स्तर तक नहीं भर सके हैं। जल संसाधन विभाग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक राज्य के 54 प्रमुख जलाशयों में केवल 15 ही अपनी आधी क्षमता तक पहुंच पाए हैं, जबकि 27 जलाशयों में जलभराव 40 से 50 प्रतिशत के बीच है। विशेषज्ञ इसे आने वाले महीनों के लिए गंभीर चेतावनी मान रहे हैं। सामान्य वर्षों में जुलाई के मध्य तक अधिकांश जलाशयों में लगभग 70 से 75 प्रतिशत तक पानी भर जाता था, लेकिन इस बार कमजोर मानसून के कारण स्थिति इसके उलट है। यदि अगस्त और सितंबर में अच्छी बारिश नहीं हुई तो खरीफ फसलों की सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन पर व्यापक असर पड़ सकता है।
    सबसे अधिक चिंता प्रदेश के बड़े बहुउद्देशीय जलाशयों को लेकर है। बरगी, इंदिरा सागर, तवा, केरवा और संजय सागर जैसे प्रमुख बांधों में जलभराव क्षमता के मुकाबले बेहद कम पानी बचा है। कई जलाशयों में पानी का स्तर पिछले वर्ष की तुलना में भी काफी नीचे पहुंच गया है।
    इंदिरा सागर और बरगी की स्थिति सबसे चिंताजनक
    प्रदेश के सबसे बड़े इंदिरा सागर बांध में इस समय केवल 14.72 प्रतिशत जलभराव है। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह करीब 24.5 प्रतिशत था। यानी एक वर्ष में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। जबलपुर स्थित बरगी बांध में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। यहां जलभराव करीब 12 से 14 प्रतिशत के बीच है। बांध का जलस्तर लगभग 407 मीटर पर पहुंच गया है, जबकि इसकी पूर्ण जलभराव क्षमता 422 मीटर से अधिक है।
    कई बड़े बांधों में भी जलस्तर सामान्य से कम
    जल संसाधन विभाग के अनुसार अन्य प्रमुख जलाशयों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। बरगी में 12.45 प्रतिशत, तवा में 9.03 प्रतिशत, केरवा में 8.13 प्रतिशत, दहोद में 7.50 प्रतिशत, संजय सागर में 3.42 प्रतिशत, बाणसागर में 46.87 प्रतिशत और  वैनगंगा संजय सरोवर में 9.20 प्रतिशत, राजगढ़ सहित कई इलाकों में स्थानीय जलाशयों में पानी कम होने से सिंचाई व्यवस्था प्रभावित होने लगी है। वहीं चंबल और नौनेरा जैसे प्रमुख बांधों में भी जलस्तर सामान्य से नीचे बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दो महीनों में मानसून सामान्य नहीं हुआ तो सबसे पहले खरीफ फसलों की सिंचाई प्रभावित होगी। इसके साथ ही जलविद्युत परियोजनाओं में बिजली उत्पादन भी घट सकता है। पेयजल आपूर्ति पर भी दबाव बढऩे की संभावना है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां जलाशयों पर निर्भरता अधिक है।
    सरकार ने शुरू किए एहतियाती कदम
    जल संसाधन विभाग ने जल संरक्षण को लेकर एहतियाती रणनीति अपनानी शुरू कर दी है। नहरों में केवल आवश्यकता के अनुसार ही पानी छोड़ा जा रहा है। साथ ही पुराने तालाबों, चेक डैम और जल संरक्षण संरचनाओं के सुधार का कार्य तेज किया जा रहा है ताकि भूजल स्तर को भी बढ़ाया जा सके। जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट का कहना है कि विभाग जल उपलब्धता की लगातार निगरानी कर रहा है और उपलब्ध पानी का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग सुनिश्चित किया जा रहा है।

Related Articles