
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र सरकार का फोकस बिगड़े हुए वनों को पुनर्जीवित करने पर है। प्रदेश में करीब 95 लाख हेक्टेयर वन भूमि है। इनमें से 37 लाख हेक्टेयर भूमि पर जंगल नहीं है। इसी खाली जमीन को जंगल के रूप में विकसित करने के नीति पर सरकार काम कर रही है। जानकारी के अनुसार, प्रदेश सरकार प्रदेश के बिगड़े हुए वनों को पुनर्जीवित करने के लिए एक बार फिर नई वन भूमि लीज नीति तैयार करने जा रही है। मुख्य सचिव अनुराग जैन के निर्देशों के बाद वन विभाग ने इस पर काम तेज कर दिया है। पूर्व में आरएसएस से जुड़े आदिवासी संगठनों की आपत्ति, राजनीतिक विरोध और आदिवासी संगठनों के तीखे रुख को देखते हुए इस बार राज्य सरकार ने फूंक-फूंक कर कदम रखने का फैसला किया है।
केंद्र की नई गाइडलाइन में अहम छूट दी गईं है। वानिकी गतिविधियों की नई परिभाषा के अनुसार, यदि कोई राज्य सरकारी या गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर असिस्टेड नेचुरल रीजनरेशन, जिसमें वनीकरण या वृक्षारोपण शामिल है, करने के लिए सहमत होती है, तो इसे वानिकी गतिविधि माना जाएगा। इसके लिए शर्त यह है कि ये गतिविधियां एक अनुमोदित वर्किंग प्लान या मैनेजमेंट प्लान के तहत राज्य के वन विभाग की देखरेख में की जानी चाहिए। ऐसी गतिविधियों के लिए प्रतिपूरक वनीकरण की आवश्यकता और नेट प्रेजेंट वैल्यू का भुगतान अनिवार्य नहीं होगा। वहीं राज्यों को यह छूट दी गई है कि वे इन वृक्षारोपण के उपयोग और उनसे होने वाली राजस्व हिस्सेदारी के लिए अपनी सुविधानुसार नया ढांचा तैयार कर सकेंगे।
आवंटित पट्टों की जमीन लीज नीति से बाहर
जानकारी के अनुसार, नई नीति में पेसा (पंचायत-अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार-अधिनियम) नियमों के तहत आने वाले अनुसूचित क्षेत्रों और वनाधिकार कानून (एफआरए) के तहत आवंटित पट्टों की जमीनों को नई वन भूमि लीज नीति से पूरी तरह से बाहर रखा जाएगा। नई वन भूमि लीज नीति में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से 2 जनवरी को जारी नई गाइडलाइन को मूल आधार बनाया जाएगा, ताकि वनीकरण के लिए प्राइवेट और सीएसआर फंडिंग को बढ़ावा दिया जा सके।
नई नीति में इन ३ बातों पर रहेगा जोर
नई नीति में तीन बातों पर विशेष जोर रहेगा। पहला आदिवासी क्षेत्रों की सुरक्षा। नई नीति केवल उन्हीं वनों पर लागू होगी जो गैर-अनुसूचित क्षेत्रों में आते हैं। पेसा और एफआरए पट्टों वाली जमीनें इससे पूरी तरह मुक्त रहेंगी। दूसरा जमीन का मालिकाना हक। वन भूमि का मालिकाना हक और नियंत्रण पूरी तरह से राज्य सरकार (वन विभाग) के पास ही रहेगा। निजी डेवलपर्स केवल वर्किंग प्लान के दिशा-निर्देशों के तहत वृक्षारोपण करेंगे। वे उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालेंगे। तीसरा रोजगार और राजस्व पर। स्थानीय ग्रामीणों और संयुक्त वन प्रबंधन समितियों को रोजगार में प्राथमिकता दी जाएगी। राजस्व की हिस्सेदारी भी तय की जाएगी। गौरतलब है कि इससे पहले, मप्र वन विभाग ने राज्य के करीब 37 हजार वर्ग किमी के बिगड़े हुए वन क्षेत्र को 40 साल की लीज पर निजी निवेशकों और कॉर्पोरेट घरानों को देने का एक मसौदा तैयार किया था। तर्क था कि वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण इन जंगलों को सुधारने में दिक्कत आ रही है, और निजी निवेश से हरियाली बढ़ेगी जिसका लाभ कंपनियों को कार्बन क्रेडिट के रूप में मिलेगा।
