
- जल गंगा संवर्धन अभियान ने बदल दी मप्र की तस्वीर
मप्र को सदानीरा बनाने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर प्रदेश में जल गंगा संवर्धन अभियान चलाया गया। अभियान के 100 दिन में 3 लाख 62 हजार से अधिक जल संरक्षण कार्य किए गए। बकौल इस अभयान के कारण मप्र जल संरक्षण में देशभर में नंबर वन बन गया है।
विनोद कुमार उपाध्याय/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)। जलवायु परिवर्तन, घटते भूजल स्तर और अनिश्चित मानसून के दौर में जल संरक्षण आज केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और विकास की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। भारत के अधिकांश राज्यों की तरह मध्यप्रदेश भी पिछले वर्षों में लगातार जल संकट की चुनौती से जूझता रहा है। कई जिलों में गर्मियों के दौरान पेयजल संकट, सूखते तालाब, गिरता भूजल स्तर और वर्षा पर अत्यधिक निर्भर कृषि व्यवस्था ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल नई सिंचाई परियोजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। स्थानीय जल स्रोतों का संरक्षण और वर्षा जल का संचयन ही दीर्घकालिक समाधान बन सकता है। इसी पृष्ठभूमि में मध्यप्रदेश सरकार ने 19 मार्च से 30 जून तक जल गंगा संवर्धन अभियान चलाया। सरकार के अनुसार यह 100 दिनों का विशेष अभियान था, जिसका उद्देश्य केवल जल संरचनाओं का निर्माण नहीं, बल्कि जल संरक्षण को जनभागीदारी का आंदोलन बनाना था। समापन अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्रदेश में तीन लाख बासठ हजार से अधिक जल संरक्षण कार्य पूरे किए गए हैं और लगभग दस हजार करोड़ रुपये से अधिक के कार्यों के माध्यम से जल सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। सरकार का कहना है कि यह अभियान आगे भी निरंतर जारी रहेगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकार का कार्य नहीं बल्कि समाज की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि अल नीनो के कारण कम वर्षा की संभावना है, इसलिए वर्षा जल संचयन और नदी संरक्षण के कार्य भविष्य में भी जारी रहेंगे। मुख्यमंत्री ने लोगों से प्रत्येक बूंद बचाने का आह्वान किया।
गौरतलब है कि मध्यप्रदेश लंबे समय से नदियों, तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों की धरती रहा है। नर्मदा, ताप्ती, बेतवा, चंबल, केन, सोन, शिप्रा और तवा जैसी नदियों ने इस प्रदेश को केवल भौगोलिक पहचान ही नहीं दी, बल्कि इसकी कृषि, संस्कृति और सभ्यता की नींव भी तैयार की। लेकिन बीते दो दशकों में जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, भूजल के अंधाधुंध दोहन, शहरीकरण और पारंपरिक जल स्रोतों की उपेक्षा ने मध्यप्रदेश को भी जल संकट की चुनौती के सामने खड़ा कर दिया। ऐसे समय में राज्य सरकार ने जल गंगा संवर्धन अभियान चलाया। सरकार का दावा है कि यह केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि जनभागीदारी पर आधारित जल आंदोलन था। 100 दिनों तक चले इस अभियान में कुएं, बावडिय़ां, तालाब, अमृत सरोवर, नदियां, स्टॉप डैम, खेत तालाब और वर्षा जल संचयन संरचनाओं का बड़े पैमाने पर निर्माण एवं पुनर्जीवन किया गया। अभियान के समापन अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की कि मध्यप्रदेश जल संरक्षण के क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बन चुका है। हालांकि इस दावे का वास्तविक मूल्यांकन आने वाले वर्षों में होगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि जल संरक्षण अब राज्य की राजनीतिक और विकासात्मक प्राथमिकताओं के केंद्र में आ चुका है। जल गंगा संवर्धन अभियान-2026 ने मध्यप्रदेश में जल संरक्षण को सरकारी योजना से आगे बढ़ाकर सामाजिक अभियान का स्वरूप देने का प्रयास किया है। 100 दिनों में लाखों जल संरचनाओं के निर्माण और पुनर्जीवन, व्यापक जनभागीदारी, कृषि एवं पर्यावरण के साथ समन्वित दृष्टिकोण तथा जल को सांस्कृतिक चेतना से जोडऩे जैसे प्रयास इसे महत्त्वपूर्ण बनाते हैं। हालांकि किसी भी जल संरक्षण अभियान की वास्तविक सफलता का आकलन केवल निर्माण कार्यों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके दीर्घकालिक प्रभाव से होगा। आने वाले वर्षों में यदि भूजल स्तर में सुधार, नदियों के प्रवाह में स्थायित्व, ग्रामीण क्षेत्रों में जल उपलब्धता में वृद्धि और जल उपयोग के प्रति समाज में स्थायी व्यवहार परिवर्तन दिखाई देता है, तभी यह अभियान वास्तव में ऐतिहासिक सिद्ध होगा। फिलहाल इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जल संकट के बढ़ते दौर में मध्यप्रदेश ने जल संरक्षण को विकास के केंद्र में लाने का प्रयास किया है। यदि इस अभियान की निरंतरता, पारदर्शिता और सामुदायिक भागीदारी बनी रहती है, तो यह मॉडल न केवल राज्य बल्कि देश के अन्य हिस्सों के लिए भी उपयोगी उदाहरण बन सकता है। आखिरकार, जल संरक्षण किसी सरकार का नहीं, पूरी पीढ़ी का साझा दायित्व है—क्योंकि जल रहेगा, तभी भविष्य सुरक्षित रहेगा।
जनभागीदारी बना सबसे बड़ा आधार
भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जहां प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता लगातार घट रही है। मध्यप्रदेश भी इससे अछूता नहीं रहा। कई जिलों में गर्मियों के दौरान पेयजल संकट, गिरता भूजल स्तर और सूखते जल स्रोत प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बने। विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल नए बांध या बड़ी सिंचाई परियोजनाएं भविष्य का समाधान नहीं हैं। स्थानीय जल संरचनाओं का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन और सामुदायिक भागीदारी ही स्थायी समाधान है। इसी सोच के साथ राज्य सरकार ने जल गंगा संवर्धन अभियान की शुरुआत की। अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसे केवल सरकारी विभागों तक सीमित नहीं रखा गया। ग्राम पंचायतों, नगर निकायों, स्वयंसेवी संस्थाओं, किसान संगठनों, महिला स्व-सहायता समूहों, विद्यालयों, महाविद्यालयों और युवाओं को इसमें जोड़ा गया। प्रदेशभर में हजारों स्थानों पर श्रमदान हुआ। कई गांवों में वर्षों से बंद पड़े तालाबों को ग्रामीणों ने स्वयं साफ किया। कहीं महिलाओं ने जल चौपाल आयोजित की तो कहीं विद्यार्थियों ने जल संरक्षण रैली निकाली। यही कारण है कि सरकार इसे प्रशासनिक कार्यक्रम के बजाय सामाजिक आंदोलन बताती है। सरकार चाहे जितनी योजनाएं बना ले, जल संरक्षण तभी सफल होगा जब समाज अपनी भूमिका निभाए।हर परिवार यदि वर्षा जल संचयन करे, पानी की बर्बादी रोके, तालाबों में कचरा न डाले, भूजल का सीमित उपयोग करे, पेड़ लगाए तो जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सरकार अब अभियान को समाप्त नहीं बल्कि निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बताती है। आगामी वर्षों में जिन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान रहेगा उनमें रेन वाटर हार्वेस्टिंग, नदी पुनर्जीवन, अमृत सरोवर, भूजल पुनर्भरण, जल गुणवत्ता, जल संरक्षण में नई तकनीक, जल उपयोग दक्षता और समुदाय आधारित जल प्रबंधन उन्हीं पर भविष्य की सफलता निर्भर करेगी। अभियान के दौरान हजारों जल चौपाल आयोजित की गईं। इनमें ग्रामीणों को बताया गया कि घर में पानी कैसे बचाएं, खेत में पानी कैसे रोकें, वर्षा जल कैसे संग्रहित करें, भूजल दोहन कैसे कम करें और तालाबों को कैसे बचाएं। सरकार का मानना है कि केवल निर्माण कार्य पर्याप्त नहीं, बल्कि व्यवहार परिवर्तन भी आवश्यक है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को जल नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस छवि के पीछे सबसे प्रमुख कारण उज्जैन और शिप्रा नदी के संरक्षण के लिए उनका लगातार किया गया प्रयास बताया जाता है। सरकार का कहना है कि उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष रहने के समय से ही उन्होंने जल संरक्षण को प्राथमिकता दी थी। मुख्यमंत्री बनने के बाद इसे राज्यव्यापी अभियान का स्वरूप दिया गया। मालवा की जीवनरेखा मानी जाने वाली शिप्रा नदी केवल जलधारा नहीं बल्कि धार्मिक आस्था का केंद्र है। सिंहस्थ महापर्व इसी नदी के तट पर आयोजित होता है। बीते वर्षों में सीवेज और प्रदूषण के कारण शिप्रा की स्थिति लगातार बिगड़ रही थी। सरकार ने शिप्रा पुनर्जीवन को प्राथमिकता देते हुए सीवेज ट्रीटमेंट, गंदे नालों का डायवर्जन, स्टॉप डैम, घाटों का पुनर्निर्माण, नदी सफाई, जल प्रवाह बनाए रखने की योजना पर कार्य प्रारंभ किया। सरकार का लक्ष्य है कि सिंहस्थ-2028 में श्रद्धालुओं को स्वच्छ और अविरल शिप्रा उपलब्ध हो। लगभग 614 करोड़ रुपये की लागत वाली यह परियोजना शिप्रा नदी के लिए गेम चेंजर मानी जा रही है। परियोजना के तहत बैराज निर्माण, जलाशय विकास और आधुनिक पंपिंग प्रणाली तैयार की जा रही है। सरकार का दावा है कि इससे शिप्रा में सालभर जल उपलब्ध रहेगा। साथ ही उज्जैन शहर की पेयजल व्यवस्था भी मजबूत होगी।
मप्र का शानदार प्रदर्शन
जल शक्ति मंत्रालय के जल संचय जन भागीदारी 2.0 डैशबोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, जल संरक्षण के क्षेत्र में मध्यप्रदेश ने देश भर में अपनी एक विशेष पहचान बनाई है। पानी बचाने और जल स्रोतों को सहेजने के पूरे हो चुके कार्यों के आधार पर हमारा मध्यप्रदेश पूरे देश में तीसरे स्थान पर चमक रहा है। राज्य में अब तक 21,90,930 कार्य सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं, जबकि 1,81,506 कार्यों पर अभी तेज़ी से काम चल रहा है। केवल राज्य ही नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश के जिलों ने भी राष्ट्रीय रैंकिंग में बड़ी कामयाबी हासिल की है। भारत के शीर्ष 10 जिलों की सूची में प्रदेश का डिंडोरी जिला तीसरे स्थान पर, खंडवा (पूर्वी निमार) पांचवें स्थान पर और शहडोल जिला नौवें स्थान पर अपनी जगह बनाने में सफल रहा है। शहरों की बात करें तो नगर निगमों की श्रेणी में भी प्रदेश का सुंदर प्रदर्शन रहा है, जिसमें खंडवा नगर निगम ने देश भर में दूसरा स्थान और इंदौर नगर निगम ने पांचवां स्थान पाया है। यह सफलता दर्शाती है कि पानी की हर बूंद को सहेजने के इस पुनीत कार्य में मध्यप्रदेश का प्रशासन और वहां की जनता कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव के कृषि समृद्धि और जल संचय जनभागीदारी के व्यवहारिक मॉडल जल गंगा संवर्धन अभियान के लिए राज्य सरकार द्वारा 10,475.14 करोड़ रूपये की भारी-भरकम राशि स्वीकृत की गई है। धरातल पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जल-संचय को मजबूती देने के लिए रिकॉर्ड कार्य हुए हैं। इसके तहत राज्य में 65,763 फार्म पॉन्ड (खेत तालाब) का निर्माण कर उन्हें भौतिक रूप से पूर्ण किया गया है, जबकि कूप पुनर्भरण के लिए 96,670 डग वेल रीचार्ज संरचनाएं तैयार की गई हैं। इसके अतिरिक्त, व्यापक स्तर पर जल संरक्षण एवं रीचार्ज से जुड़े 34,488 कार्यों को पूरा किया गया है। जल संकट के दीर्घकालिक समाधान के उद्देश्य से प्रदेश में 208 भव्य अमृत सरोवरों का निर्माण व विकास सुनिश्चित किया गया है, 3,129 पारंपरिक जल संरचनाओं का मरम्मत और रखरखाव कर उन्हें नया जीवन दिया गया। साथ ही 5,448 वॉटरशेड संबंधी कार्यों को सफलता के साथ धरातल पर उतारा गया है। जल चौपालों और जनजागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को कम पानी वाली फसलों, ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर सिस्टम जैसी तकनीकों के प्रति प्रशिक्षित किया जा रहा है। प्रति बूंद अधिक फसल और कम पानी में अधिक उत्पादन के इस मंत्र ने न केवल भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार किया है, बल्कि किसानों की लागत को कम कर उनके उत्पादन और आय में वृद्धि की है। यह मॉडल इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि जल नीतियों को जनभागीदारी और कृषि आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला जाए, तो वे राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा स्तंभ बन सकती हैं।
वैश्विक पटल पर गूंजा मप्र मॉडल
मुख्यमंत्री डॉ. यादव के इन अभिनव और दूरदर्शी प्रयासों की गूंज अब केवल मध्यप्रदेश या भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भरपूर सराहना मिल रही है। वीर भारत न्यास द्वारा भोपाल के भारत भवन में आयोजित ‘सदानीरा समागम’ ने जल संरक्षण को हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ जोडक़र एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। इस ऐतिहासिक समागम में साइप्रस, फिजी, मेक्सिको, नेपाल, त्रिनिदाद एवं टोबैगो और इक्वाडोर जैसे विभिन्न देशों के राजनयिकों, राजदूतों और नीति विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। समागम में शामिल विदेशी प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री डॉ. यादव द्वारा संचालित जल प्रबंधन के मध्यप्रदेश मॉडल को आज की सबसे बड़ी वैश्विक आवश्यकता बताया। उन्होंने जनभागीदारी और शासकीय संकल्प के इस अनूठे समन्वय की भूरि-भूरि प्रशंसा की और इस मॉडल को अपने-अपने देशों में भी लागू करने की तीव्र इच्छा जताई। अंतर्राष्ट्रीय पटल पर मिली यह स्वीकृति इस बात को प्रमाणित करती है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश जल-आत्मनिर्भरता की दिशा में विश्व का मार्गदर्शन करने में सक्षम हो रहा है। जल संरक्षण अब मात्र एक प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का सामाजिक और नैतिक कर्तव्य बन चुका है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव के नेतृत्व में महिलाओं, युवाओं और कृषकों की सक्रिय भागीदारी ने इस अभियान को एक पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी बना दिया है। जल गंगा संवर्धन अभियान और जल संचय जनभागीदारी जैसे प्रयास केवल वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर रहे, बल्कि आने वाली पीढिय़ों के लिए एक समृद्ध, सुरक्षित और जल-संपन्न मध्यप्रदेश की सुदृढ़ नींव रख रहे हैं। मध्यप्रदेश आज जल संरचनाओं की संख्या में रिकॉर्ड वृद्धि, नदियों के पुनर्जीवन और पर्यावरण संतुलन के क्षेत्र में देश का एक अनुकरणीय राज्य बन चुका है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव के ‘जल नायक’ के रूप में किए गए ये ऐतिहासिक प्रयास आने वाले समय में स्वर्णिम मध्यप्रदेश के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होंगे। स्वच्छ, समृद्ध और जल-आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश का यह सपना तभी पूर्णता को प्राप्त करेगा, जब हर नागरिक इस महा-अभियान से जुडक़र जल की हर बूंद को सहेजने का संकल्प लेगा। आइए, हम सब मिलकर इस जल-आंदोलन के सहभागी बनें और प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री के संकल्पों को सिद्ध कर राज्य को प्रगति के शिखर पर ले जाएं।
अभियान में जल संरक्षण का सबसे व्यावहारिक मॉडल खेत तालाब और अमृत सरोवर रहे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 65 हजार से अधिक खेत तालाब, लगभग 97 हजार डग वेल रिचार्ज, 34 हजार से अधिक जल संरक्षण कार्य, 208 अमृत सरोवर और तीन हजार से अधिक पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनर्जीवन किया गया। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण क्षमता बढऩे की उम्मीद है। जल संरक्षण का सबसे बड़ा लाभ कृषि क्षेत्र को मिलने की संभावना है। प्रदेश में किसानों को ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर, माइक्रो इरिगेशन, कम पानी वाली फसलें और वर्षा आधारित खेती के लिए प्रशिक्षण दिया गया। यदि इन तकनीकों का व्यापक उपयोग होता है तो भविष्य में सिंचाई जल की बचत के साथ उत्पादन लागत भी कम हो सकती है।
पर्यावरण संरक्षण के साथ जुड़ा अभियान
जल संरक्षण और पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए अभियान के दौरान पौधारोपण, जल स्रोतों के आसपास हरित क्षेत्र विकास, नदी किनारे वृक्षारोपण, मिट्टी संरक्षण और कैचमेंट क्षेत्र सुधार पर भी कार्य किया गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि जल संरक्षण तभी सफल होगा जब जलग्रहण क्षेत्र भी सुरक्षित रहे। भारतीय परंपरा में जल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि जीवन का प्रतीक माना गया है। मध्यप्रदेश सरकार ने इस सांस्कृतिक दृष्टिकोण को अभियान से जोड़ा। जिसके तहत बेतवा उद्गम स्थल पर पूजा, शिप्रा परिक्रमा, घाटों की सफाई, जल स्रोतों पर पौधारोपण और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से जल संरक्षण का संदेश दिया गया। इन प्रयासों ने अभियान को सांस्कृतिक स्वरूप भी दिया। प्रदेश के पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल कहते हैं कि पीढिय़ों से हम सुनते आए हैं कि जल ही जीवन है। किंतु विडंबना यह है कि इस सत्य को समझने में हमें एक गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ा। आज यह संकट किसी एक मोहल्ले, शहर, राज्य या देश तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण पृथ्वी के अस्तित्व से जुड़ा वैश्विक प्रश्न बन चुका है। भारत भी इस चुनौती से अछूता नहीं है। बढ़ती जनसंख्या, अनियंत्रित शहरीकरण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन ने प्राकृतिक जल स्रोतों को तेजी से क्षीण कर दिया है। ऐसे समय में पानी की प्रत्येक बूंद को सहेजना मानवता का सबसे बड़ा दायित्व बन गया है। जल संकट की गंभीरता केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं है। भू-जल स्तर का निरंतर गिरना, नदियों का प्रदूषित होना, पारंपरिक जल स्रोतों का लुप्त होना और वर्षा जल का व्यर्थ बह जाना इस संकट के प्रमुख कारण हैं। गांवों और नगरों की जीवन रेखा रहे तालाब, बावडिय़ाँ और कुएं आज उपेक्षा, अतिक्रमण और कचरे के बोझ तले दम तोड़ रहे हैं। दूसरी ओर कृषि और उद्योगों में भूजल के अंधाधुंध दोहन ने स्थिति को और अधिक विकट बना दिया है। ऐसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में जल गंगा संवर्धन अभियान आशा की एक सशक्त किरण बनकर उभरा है। यह अभियान केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि जनभागीदारी पर आधारित एक सामाजिक आंदोलन है, जिसका मूल मंत्र है…जन सहयोग से जल संरक्षण और संवर्धन। इसका उद्देश्य जल संकट के मूल कारणों का समाधान करते हुए समाज को जल संरक्षण के लिए प्रेरित करना है।
वह कहते हैं कि मैंने स्वयं अपने विधानसभा क्षेत्र नरसिंहपुर तथा गृह नगर गोटेगांव में सिंगरी नदी के पुनर्जीवन के लिये सफाई अभियान चलाकर जल स्रोतों के संरक्षण का प्रयास किया है। इसी अनुभव के आधार पर मैं सदैव आह्वान करता हूं नदियों को नाला बनाना बंद करें। वास्तव में नदी का उद्गम स्थल ऊर्जा का केंद्र होता है और जहां नदियों का संगम होता है, वहां जीवन की नई संभावनाएँ जन्म लेती हैं। इसलिए नदियों के उद्गम और उनके प्राकृतिक स्वरूप की रक्षा करना हमारा सामूहिक दायित्व है। मेरे आराध्य परम पूज्य श्रीश्री बाबा श्री जी की वाणी है कि संकल्प में विकल्प नहीं होता। संकल्प में विक्लप खोजने पर महानतम कार्य रुक जाते हैं। जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत पुराने तालाबों, कुओं, बावडिय़ों और नदियों का जीर्णोद्धार किया जा रहा है। वर्षा जल संचयन को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि बारिश का पानी धरती में समाहित होकर भू-जल स्तर को पुनर्जीवित कर सके। जल स्रोतों के आसपास व्यापक वृक्षारोपण किया जा रहा है, जिससे जल संरक्षण की प्राकृतिक प्रक्रिया मजबूत हो सके। साथ ही नदियों में प्रदूषण रोकने और गंदे नालों के प्रवाह को नियंत्रित करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। इस अभियान के परिणाम उत्साहवर्धक हैं। जल संरचनाओं की सफाई और गहरीकरण से भू-जल स्तर में सुधार हुआ है। अनेक ऐतिहासिक तालाबों और बावडिय़ों का पुनर्जीवन हुआ है, जिससे स्थानीय स्तर पर जल उपलब्धता बढ़ी है। “पानी चौपाल” जैसे कार्यक्रमों ने लोगों में जल संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा की है और जल बचाने की संस्कृति को पुनर्जीवित किया है। कृषि क्षेत्र में भी इस अभियान ने सकारात्मक प्रभाव डाला है। किसानों को ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए, जिससे कम पानी में अधिक उत्पादन संभव हो । यह न केवल जल संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि किसानों की आर्थिक समृद्धि का भी आधार बन रहा है। जल संकट के स्थायी समाधान के लिए कुछ अतिरिक्त प्रयास भी आवश्यक हैं।
चुनौतियां अभी भी शेष
अभियान की उपलब्धियों के बावजूद कई प्रश्न अभी भी महत्वपूर्ण हैं। क्या सभी निर्मित संरचनाओं का नियमित रखरखाव होगा? क्या अतिक्रमण मुक्त जल स्रोत स्थायी रूप से सुरक्षित रहेंगे? क्या भूजल दोहन पर नियंत्रण संभव होगा? क्या शहरी क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन अनिवार्य रूप से लागू होगा? क्या उद्योगों द्वारा जल प्रदूषण पर प्रभावी रोक लगेगी? यदि इन प्रश्नों का समाधान नहीं हुआ तो केवल निर्माण कार्य पर्याप्त नहीं होंगे। जल विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण का वास्तविक मूल्यांकन मानसून के बाद होना चाहिए। यदि भूजल स्तर बढ़ता है, सूखे जल स्रोत पुनर्जीवित होते हैं, किसानों को सिंचाई में लाभ मिलता है, पेयजल संकट घटता है, तो अभियान की सफलता अधिक स्पष्ट होगी। जल संरक्षण एक सतत प्रक्रिया है, जिसे निरंतर निगरानी और रखरखाव की आवश्यकता होती है। भारतीय संस्कृति में यह अनादि काल से माना गया है कि पृथ्वी, पर्वत, नदी और पेड़-पौधों में साक्षात जीवंतता है और वे हमारे लिए परम पूजनीय हैं। जिस प्रकार मानव देह में धमनियों के माध्यम से रक्त का संचार होता है, ठीक उसी प्रकार नदियां भी इस पृथ्वी पर साक्षात जीवन का संचार करती हैं। यही कारण है कि हम सबके अस्तित्व के लिए नदियों का अक्षुण्ण और निरंतर प्रवाह अनिवार्य है। नदियों के प्रवाह को दूषित करना या उनमें मानवीय अवरोध उत्पन्न करना, वास्तव में मानव जीवन की प्रगति में अवरोध उत्पन्न करने के समान है। हाल ही में जारी हुई यूनिसेफ की क्लाइमेट रिस्क रिपोर्ट ने संपूर्ण विश्व को जलवायु परिवर्तन और जल संकट के प्रति सचेत किया है। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के करीब 180 करोड़ बच्चे जल संकट और सूखे के सीधे खतरे में हैं, जबकि राष्ट्रीय भूजल सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि देश के कई हिस्सों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। ऐसे चिंताजनक वैश्विक और राष्ट्रीय परिदृश्य में मध्यप्रदेश की स्थिति आज जल नायक मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के भगीरथ प्रयासों से काफी सुदृढ़ है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के पारंपरिक जल स्रोतों जैसे नदियों, तालाबों, कुओं, बावडिय़ों और चेकडैम का संरक्षण, संवर्धन, गहरीकरण और जीर्णोद्धार करना है। मध्यप्रदेश में प्राचीन बावडिय़ाँ और तालाब हमारी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर हैं, और इनका पुनरुद्धार न केवल जल संकट से मुक्ति दिला रहा है बल्कि हमारे सांस्कृतिक गौरव को पुनस्र्थापित कर पर्यटन को भी बढ़ावा दे रहा है। जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत 3,61,001 कार्यों का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें से अब तक 2,40,386 कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण किए जा चुके हैं। प्रदेश का हर जिला, प्रशासन और वहां का हर नागरिक इस जल संरक्षण महायज्ञ में अपनी सर्वश्रेष्ठ आहुति दे रहा है।
