
- मप्र में आगामी तीन साल चुनावी घमासान
मप्र में आगामी तीन साल भाजपा और कांग्रेस के लिए चुनौती भरे रहेंगे। दरअसल, प्रदेश में 2027 के नगरीय निकाय, 2028 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव होंगे। यानी तीन साल, तीन चुनाव- सत्ता, संगठन और संघ की सबसे बड़ी परीक्षा के होंगे। इसके लिए जहां मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की टीम पूरी तरह तैयार है, वहीं कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और उमंग सिंघार की कांग्रेस अभी पूरी तरह संगठित नहीं हो पाई है।
गौरव चौहान/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)। मध्यप्रदेश की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। वर्ष 2027 से 2029 के बीच होने वाले तीन बड़े चुनाव-नगरीय निकाय, विधानसभा और लोकसभा-सिर्फ चुनावी कैलेंडर की घटनाएं नहीं हैं, बल्कि प्रदेश की सत्ता, संगठन और राजनीतिक नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा होंगे। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, दोनों ने अभी से अपनी-अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। भाजपा, जो राज्य और केंद्र दोनों में सत्ता में है, उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी राजनीतिक बढ़त बनाए रखने की है। वहीं कांग्रेस के लिए यह दौर अस्तित्व और पुनर्निर्माण का है। दोनों दलों के सामने अलग-अलग चुनौतियां हैं, लेकिन लक्ष्य एक है-जनता का विश्वास जीतना। आमतौर पर राजनीतिक दल चुनाव से छह महीने पहले सक्रिय होते हैं, लेकिन मध्यप्रदेश में इस बार तस्वीर अलग दिखाई दे रही है। कारण स्पष्ट है। लगातार तीन वर्षों तक बड़े चुनाव होने हैं। सबसे पहले नगरीय निकाय चुनाव होंगे। इन्हें विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जाएगा। इसके बाद 2028 में विधानसभा चुनाव होंगे, जो अगले पांच वर्षों की सत्ता तय करेंगे। विधानसभा चुनाव के ठीक बाद 2029 का लोकसभा चुनाव आएगा, जिसका असर राष्ट्रीय राजनीति तक दिखाई देगा। यानी एक चुनाव का परिणाम दूसरे चुनाव की दिशा तय करेगा।
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका बहुस्तरीय संगठन माना जाता है। पार्टी केवल सरकार के भरोसे चुनाव नहीं लड़ती, बल्कि संगठन, बूथ स्तर के कार्यकर्ता और वैचारिक नेटवर्क के साथ चुनावी तैयारी करती है। प्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार विकास योजनाओं और प्रशासनिक फैसलों के माध्यम से अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है। दूसरी ओर संगठनात्मक स्तर पर नए प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की कवायद शुरू हो चुकी है। भाजपा की रणनीति केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि लगातार राजनीतिक बढ़त बनाए रखने की दिखाई देती है। भाजपा की कार्यशैली की विशेषता यह रही है कि सरकार और संगठन के बीच समन्वय बनाए रखने का प्रयास किया जाता है। प्रदेश में सरकार विकास योजनाओं पर काम करती है, संगठन उन्हें जनता तक पहुंचाता है और वैचारिक सहयोगी संगठन सामाजिक स्तर पर संपर्क बनाए रखते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही त्रिकोण भाजपा की चुनावी मजबूती का आधार है। हालांकि किसी भी दल की सफलता अंतत: मतदाताओं के निर्णय पर निर्भर करती है। मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. मोहन यादव के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि सरकार के कामकाज को चुनावी विश्वास में बदलना भी है। सरकार ने पिछले समय में निवेश, उद्योग, धार्मिक पर्यटन, अधोसंरचना, कृषि, जल संरक्षण और रोजगार जैसे विषयों पर विशेष ध्यान दिया है। आने वाले वर्षों में इन्हीं क्षेत्रों की उपलब्धियां चुनावी विमर्श का हिस्सा बन सकती हैं। इसके साथ ही महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की आय, शहरी सुविधाएं और स्थानीय समस्याएं भी जनता के सामने प्रमुख मुद्दे रहेंगी। भाजपा नेतृत्व यह मानता है कि चुनाव केवल लोकप्रिय नेतृत्व के भरोसे नहीं जीते जा सकते। बूथ स्तर का संगठन किसी भी चुनाव की रीढ़ होता है। इसी कारण प्रदेश संगठन कार्यकर्ता प्रशिक्षण, बूथ समितियों के पुनर्गठन, युवा और महिला मोर्चा की सक्रियता तथा डिजिटल संपर्क अभियान पर जोर दे रहा है। भाजपा का प्रयास है कि प्रत्येक मतदान केंद्र पर संगठन सक्रिय और संगठित दिखाई दे। वहीं कांग्रेस के लिए स्थिति अपेक्षाकृत कठिन मानी जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी संगठन को सक्रिय बनाने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठनात्मक एकजुटता अभी भी कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। कई जिलों में स्थानीय स्तर पर नेतृत्व को लेकर मतभेद और निष्क्रियता जैसी समस्याओं की चर्चा होती रही है। यदि कांग्रेस को आगामी चुनावों में प्रभावी चुनौती देनी है, तो उसे मजबूत संगठन, स्पष्ट रणनीति और एकजुट नेतृत्व की आवश्यकता होगी।
निकाय चुनाव पहला बड़ा इम्तिहान
नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषद चुनावों को अक्सर स्थानीय चुनाव माना जाता है, लेकिन उनका राजनीतिक महत्व कहीं अधिक होता है। यहीं से कार्यकर्ताओं का मनोबल तय होता है। यहीं से स्थानीय नेतृत्व उभरता है। यहीं से विधानसभा चुनाव का माहौल बनता है। यदि भाजपा निकाय चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करती है तो उसका मनोवैज्ञानिक लाभ विधानसभा चुनाव तक जा सकता है। वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनाव संगठन की वास्तविक ताकत दिखाने का अवसर होंगे। पिछले कुछ वर्षों में मध्यप्रदेश का मतदाता पहले की तुलना में अधिक जागरूक और अपेक्षाकृत मुद्दा-आधारित होता दिखाई देता है। सडक़, बिजली, पानी, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय विकास अब चुनावी चर्चा के प्रमुख विषय बनते जा रहे हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने भी चुनाव प्रचार की शैली बदल दी है। अब केवल बड़ी सभाएं पर्याप्त नहीं हैं। मतदाताओं तक लगातार संवाद और विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना भी महत्वपूर्ण हो गया है।
2027 के नगरीय निकाय चुनाव केवल नगर निगमों के महापौर या पार्षद चुनने तक सीमित नहीं होंगे। इन्हें 2028 विधानसभा चुनाव का पहला राजनीतिक संकेत माना जाएगा। शहरी क्षेत्रों में भाजपा का परंपरागत प्रभाव रहा है, लेकिन बदलती आर्थिक परिस्थितियां, रोजगार, यातायात, प्रदूषण, पेयजल, सफाई और शहरी विकास जैसे मुद्दे मतदाताओं की प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकते हैं। कांग्रेस भी इन स्थानीय मुद्दों को चुनावी एजेंडा बनाने की कोशिश करेगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार ने निवेश, अधोसंरचना, धार्मिक पर्यटन, कृषि, जल संरक्षण, औद्योगिक विकास और प्रशासनिक सुधारों पर जोर दिया है। आने वाले चुनावों में सरकार की यही उपलब्धियां भाजपा का प्रमुख राजनीतिक आधार बन सकती हैं। लेकिन विपक्ष इन दावों की पड़ताल करते हुए रोजगार, महंगाई, किसानों की आय, स्थानीय समस्याओं और प्रशासनिक कार्यप्रणाली जैसे मुद्दे भी उठाएगा। इसलिए चुनाव केवल उपलब्धियों का नहीं बल्कि उनकी जनस्वीकृति का भी होगा। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक मजबूती है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी लगातार प्रदेश का दौरा कर संगठन को सक्रिय बनाने की कोशिश कर रहे हैं। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेरने का प्रयास कर रहे हैं। फिर भी कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस को बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने, स्थानीय नेतृत्व को सक्रिय करने और गुटीय मतभेद कम करने की दिशा में अभी काफी काम करना है। यदि संगठनात्मक मजबूती नहीं आती, तो केवल जनसभाओं और विरोध प्रदर्शनों से चुनावी लाभ सीमित रह सकता है। विपक्ष की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि वह जनता के मुद्दों को किस प्रभावशीलता से उठाता है। कांग्रेस रोजगार, महंगाई, किसानों की समस्याएं, युवाओं की अपेक्षाएं, स्थानीय विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विषयों को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकती है। हालांकि, इन मुद्दों को मतदाताओं तक संगठित तरीके से पहुंचाने के लिए मजबूत संगठन और स्पष्ट संदेश आवश्यक होगा।
विधानसभा असल मुकाबला
राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण चुनाव 2028 का विधानसभा चुनाव होगा। यहीं तय होगा कि वर्तमान सरकार को दूसरा कार्यकाल मिलता है या सत्ता परिवर्तन होता है। भाजपा के लिए यह सरकार के कामकाज का जनादेश होगा, जबकि कांग्रेस के लिए वापसी का अवसर। इसी कारण दोनों दलों की वर्तमान रणनीति का केंद्र 2028 ही माना जा रहा है। अगले दो वर्षों में प्रदेश की राजनीति लगातार सक्रिय रहने वाली है। विकास योजनाओं की घोषणाएं, संगठनात्मक विस्तार, सामाजिक संपर्क अभियान, नए राजनीतिक समीकरण और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका लगातार बढ़ेगी। स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश अब चुनावी तैयारी के लंबे दौर में प्रवेश कर चुका है। आने वाले तीन वर्षों में केवल सरकारें ही नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीतिक दिशा भी तय होगी। यदि राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो 2028 का विधानसभा चुनाव पूरे तीन वर्षीय चुनावी चक्र का केंद्र होगा। यही चुनाव तय करेगा कि वर्तमान सरकार को जनता दोबारा अवसर देती है या सत्ता परिवर्तन का रास्ता चुनती है। इसलिए निकाय चुनाव और लोकसभा चुनाव की रणनीति भी काफी हद तक विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर तैयार की जाएगी। अभी चुनाव में समय है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। सरकारी योजनाओं की घोषणाएं, संगठनात्मक बैठकें, सदस्यता अभियान, सामाजिक संपर्क कार्यक्रम और क्षेत्रीय यात्राएं इसी तैयारी का हिस्सा मानी जा रही हैं। स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश अगले तीन वर्षों तक लगातार चुनावी वातावरण में रहने वाला है। अब देखना यह होगा कि विकास, संगठन, नेतृत्व और जनविश्वास—इन चारों मोर्चों पर कौन-सा दल बेहतर प्रदर्शन करता है। मध्यप्रदेश की राजनीति एक नए चुनावी दौर में प्रवेश कर चुकी है। 2027 का नगरीय निकाय चुनाव, 2028 का विधानसभा चुनाव और 2029 का लोकसभा चुनाव—ये तीनों केवल संवैधानिक प्रक्रियाएं नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीतिक दिशा तय करने वाले पड़ाव होंगे। भारतीय जनता पार्टी के सामने सत्ता में रहते हुए जनविश्वास बनाए रखने और संगठन को सक्रिय रखने की चुनौती है। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने स्वयं को एक प्रभावी और विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित करने की परीक्षा है। आने वाले वर्षों में विकास, सुशासन, संगठन, नेतृत्व, स्थानीय मुद्दे और मतदाताओं का भरोसा—यही चुनावी सफलता के प्रमुख आधार होंगे। फिलहाल यह स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश की राजनीति अब लंबे चुनावी अभियान के दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहाँ हर निर्णय, हर योजना और हर राजनीतिक संदेश का प्रभाव अगले तीन वर्षों के चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है। राजनीतिक मुकाबला अभी शुरू हुआ है। अंतिम फैसला हमेशा की तरह मतदाता ही करेगा। 2028 के विधानसभा चुनाव तक लाखों नए मतदाता मतदाता सूची में शामिल हो चुके होंगे। इनमें बड़ी संख्या पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की होगी। यह वर्ग रोजगार, स्टार्टअप, डिजिटल अवसर, शिक्षा, कौशल विकास और आधुनिक अधोसंरचना जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देता है। इसलिए दोनों दल युवाओं के लिए अलग-अलग कार्यक्रम और अभियान तैयार करने की कोशिश करेंगे। पिछले कुछ चुनावों में महिला मतदाताओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है। लाड़ली बहना जैसी योजनाओं ने महिला मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका को नई चर्चा दी। भविष्य के चुनावों में महिलाओं से जुड़े विषय—स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, स्व-सहायता समूह, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा—अहम चुनावी मुद्दे बन सकते हैं। मध्यप्रदेश की राजनीति में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों की अलग-अलग प्राथमिकताएं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई, कृषि, समर्थन मूल्य, सडक़, बिजली और पेयजल प्रमुख मुद्दे रहते हैं। वहीं शहरी क्षेत्रों में रोजगार, ट्रैफिक, प्रदूषण, नगर सेवाएं, स्मार्ट अधोसंरचना और निवेश जैसे विषय अधिक प्रभाव डालते हैं। इसलिए दोनों दलों को अलग-अलग रणनीति अपनानी होगी। चुनावी राजनीति अब केवल रैलियों तक सीमित नहीं रही। डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया, वीडियो संदेश और स्थानीय डिजिटल अभियान मतदाताओं तक पहुंचने के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही डिजिटल संचार को मजबूत करने पर काम कर रही हैं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डिजिटल प्रचार के साथ-साथ जमीनी संगठन की भूमिका अभी भी निर्णायक बनी हुई है। चुनाव जीतने की रणनीति में उम्मीदवार चयन सबसे कठिन प्रक्रिया होती है। भाजपा और कांग्रेस दोनों को ऐसे उम्मीदवार चुनने होंगे जो स्थानीय स्तर पर स्वीकार्य हों और संगठन के भीतर भी समर्थन रखते हों। गलत टिकट वितरण कई बार मजबूत चुनावी तैयारी को भी कमजोर कर देता है।
भाजपा-कांग्रेस की रणनीति
मध्यप्रदेश की राजनीति में चुनाव केवल मतदान का दिन नहीं होता, बल्कि वर्षों तक चलने वाली संगठनात्मक तैयारी का परिणाम होता है। यही कारण है कि 2027 के नगरीय निकाय, 2028 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी रणनीति पर काम तेज कर दिया है। फर्क केवल इतना है कि भारतीय जनता पार्टी सत्ता में रहते हुए अपनी बढ़त बनाए रखने की कोशिश कर रही है, जबकि कांग्रेस संगठन को मजबूत कर चुनावी मुकाबले को रोचक बनाने की चुनौती से जूझ रही है। भाजपा लंबे समय से चुनावी राजनीति में संगठन आधारित मॉडल पर काम करती रही है। पार्टी का मानना है कि केवल सरकार की लोकप्रियता चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त नहीं होती। इसके लिए बूथ स्तर तक मजबूत संगठन, प्रशिक्षित कार्यकर्ता, निरंतर जनसंपर्क और स्थानीय नेतृत्व की सक्रियता आवश्यक होती है। प्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार के विकास कार्यों और प्रशासनिक फैसलों का नेतृत्व कर रहे हैं, जबकि संगठनात्मक मोर्चे पर प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के सामने कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने और संगठन को चुनावी मोड में बनाए रखने की जिम्मेदारी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि सरकार की योजनाएं सीधे मतदाताओं तक पहुंचें और उनका राजनीतिक लाभ भी मिले। किसी भी राजनीतिक दल के लिए सरकार और संगठन के बीच तालमेल महत्वपूर्ण होता है। यदि सरकार और संगठन अलग-अलग दिशा में काम करें तो चुनावी नुकसान हो सकता है। भाजपा की रणनीति में सरकार नीतियां बनाती है, संगठन उन्हें जनता तक पहुंचाता है और कार्यकर्ता स्थानीय स्तर पर फीडबैक जुटाते हैं। यह मॉडल पार्टी की चुनावी तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। हालांकि, किसी भी दल के लिए यह समन्वय लगातार बनाए रखना आसान नहीं होता। स्थानीय असंतोष, टिकट वितरण, क्षेत्रीय अपेक्षाएं और नेतृत्व की महत्वाकांक्षाएं समय-समय पर चुनौती बन सकती हैं।
संघ और भाजपा का चुनावी मॉडल
मध्यप्रदेश की राजनीति में केवल नेतृत्व ही चुनाव नहीं जिताता, बल्कि सामाजिक समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन, संगठन की मजबूती, उम्मीदवारों का चयन और चुनावी मुद्दे मिलकर परिणाम तय करते हैं। यही कारण है कि आगामी तीन वर्षों के चुनावों को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही बहुस्तरीय रणनीति तैयार कर रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार चुनाव पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण होंगे क्योंकि मतदाता अब केवल राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि सरकार के प्रदर्शन, स्थानीय विकास और उम्मीदवार की स्वीकार्यता को भी महत्व दे रहे हैं। भाजपा की सबसे बड़ी संगठनात्मक ताकत उसका विस्तृत कार्यकर्ता नेटवर्क माना जाता है। चुनावी समय में बूथ प्रबंधन, मतदाता संपर्क, प्रशिक्षण और स्थानीय स्तर पर संगठन को सक्रिय रखने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। हालांकि, चुनाव संचालन और रणनीति राजनीतिक दल का विषय होता है, जबकि विभिन्न सामाजिक और वैचारिक संगठन अपनी-अपनी स्वतंत्र गतिविधियाँ संचालित करते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की दीर्घकालिक संगठनात्मक संस्कृति उसे जमीनी स्तर पर लाभ देती रही है।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में हेमंत खंडेलवाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को लगातार सक्रिय रखना है। उनकी प्राथमिकताओं में शामिल हो सकते हैं बूथ समितियों को मजबूत करना। मंडल और जिला इकाइयों को सक्रिय रखना। नए कार्यकर्ताओं को जोडऩा। युवा नेतृत्व को अवसर देना। महिला कार्यकर्ताओं की भागीदारी बढ़ाना। डिजिटल प्रचार को गांव तक ले जाना। राजनीतिक दृष्टि से यह जिम्मेदारी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती है जितनी सरकार चलाना।
कांग्रेस का सबसे बड़ा सवाल—एकजुटता
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल भाजपा से मुकाबला नहीं, बल्कि स्वयं को मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करना है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी संगठन को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं जबकि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि संगठनात्मक स्तर पर समन्वय और कार्यकर्ता सक्रियता नहीं बढ़ी, तो चुनावी चुनौती कठिन बनी रह सकती है। मध्य प्रदेश में दो दशक से अधिक समय से सत्ता से बाहर कांग्रेस 2028 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में संगठन को मजबूत करने में जुटी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी लगातार संगठनात्मक बैठकों और आंदोलनों के जरिए कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर पार्टी के भीतर दिग्गज नेताओं से लेकर छात्र संगठनों तक सामने आ रहे विवाद कांग्रेस की एकजुटता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। हाल के दिनों में उज्जैन भूमि आवंटन विवाद पर नेताओं के अलग-अलग बयान, यूथ कांग्रेस की बैठक में धक्का-मुक्की और एनएसयूआई में अनुशासनहीनता जैसे घटनाक्रमों ने संगठन के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस इन अंदरूनी मतभेदों को खत्म कर 2028 और 2029 के चुनाव से पहले खुद को मजबूत कर पाएगी? उज्जैन भूमि आवंटन मामले को लेकर हुई कांग्रेस की राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बयान पर कई नेताओं ने नाराजगी जताई। विधायक आरिफ मसूद ने कहा कि प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने जिस मुद्दे को गंभीरता से उठाया, उस पर अलग-अलग बयान आने से कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा हो रहा है। उन्होंने कहा कि जनता पूछेगी कि आखिर सही कौन है। पूर्व विधायक प्रवीण पाठक ने भी बैठक में कहा कि यदि वरिष्ठ नेता ही प्रदेश अध्यक्ष के रुख को कमजोर करेंगे तो मैदान में संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटेगा और पार्टी की मुहिम कमजोर पड़ेगी। बैठक के दौरान बढ़ते विवाद के बीच प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि पूरे मामले की जानकारी कांग्रेस आलाकमान को भेज दी गई है और आगे की रणनीति केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश के अनुसार तय होगी। संगठनात्मक मजबूती के दावों के बीच भोपाल में आयोजित यूथ कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारिणी बैठक विवादों में घिर गई। संगठनात्मक समीक्षा के दौरान मऊगंज विधानसभा अध्यक्ष आशुतोष ने कार्यों के मूल्यांकन वाले ऐप को फर्जी बताया। इसके बाद प्रदेश सचिव सलमान गौरी और आशुतोष के बीच तीखी बहस शुरू हो गई, जो देखते ही देखते धक्का-मुक्की तक पहुंच गई। स्थिति बिगडऩे पर प्रदेश अध्यक्ष यश घनघोरिया ने हस्तक्षेप कर दोनों पक्षों को शांत कराया। बाद में वरिष्ठ नेताओं ने दोनों पदाधिकारियों को बैठक कक्ष से बाहर भेजा, जिसके बाद समीक्षा बैठक दोबारा शुरू हुई। कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई में भी अनुशासनहीनता की तस्वीर सामने आई है। मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा चुनाव नामांकन निरस्त होने के विरोध में मुख्य चुनाव आयुक्त का पुतला दहन करने का निर्देश सभी जिला अध्यक्षों को दिया गया था, लेकिन कई जिलों में कार्यक्रम ही आयोजित नहीं किया गया। इस पर संगठन ने संबंधित जिला अध्यक्षों को कारण बताओ नोटिस जारी किए, लेकिन कई पदाधिकारियों ने जवाब तक नहीं दिया। इसके बाद भोपाल में बुलाई गई प्रदेश स्तरीय बैठक में भी आधे से ज्यादा जिला अध्यक्ष और कई पदाधिकारी अनुपस्थित रहे, जबकि प्रदेश अध्यक्ष आशुतोष चौकसे ने बैठक में सभी की उपस्थिति अनिवार्य बताई थी। हालांकि प्रदेश प्रभारी रविंद्र दांगी ने संगठन में किसी भी तरह के मतभेद से इनकार करते हुए कहा कि कुछ पदाधिकारी व्यक्तिगत कारणों से बैठक में नहीं पहुंच सके। लगातार सामने आ रहे इन घटनाक्रमों ने कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे और अनुशासन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर पार्टी प्रदेश सरकार को घेरने की रणनीति बना रही है, वहीं दूसरी ओर नेताओं और छात्र संगठनों के भीतर बढ़ती खींचतान संगठन की एकजुटता पर असर डालती दिख रही है। ऐसे में 2028 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को एकजुट और अनुशासित बनाए रखने की होगी।
