
- बल की कमी बनी बड़ी चुनौती, अधिकारों के अभाव में व्यवस्था पर सवाल
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। राजधानी भोपाल में महानगरों की तर्ज पर पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू हुए चार वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन यह व्यवस्था अब भी अपने मूल स्वरूप में पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकी है। पुलिस अधिकारियों का मानना है कि कमिश्नरेट को कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और कानूनी अधिकार अब तक नहीं मिले हैं, जिसके कारण यह व्यवस्था अपेक्षित परिणाम देने में असफल साबित हो रही है। वर्तमान में हथियार लाइसेंस जारी करने, आबकारी संबंधी अधिकार, गुंडा एक्ट की कार्रवाई और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका) जैसे महत्वपूर्ण अधिकार पुलिस कमिश्नरेट के पास नहीं हैं। ऐसे में कानून-व्यवस्था से जुड़े कई मामलों में पुलिस को अन्य प्रशासनिक तंत्र पर निर्भर रहना पड़ता है। अधिकारियों का तर्क है कि जब तक पूर्ण अधिकार नहीं मिलेंगे, तब तक कमिश्नरेट व्यवस्था का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा।
कमिश्नरेट व्यवस्था के बावजूद थानों में पुलिस बल की कमी आज भी गंभीर समस्या बनी हुई है। कई थानों में जहां 80 कर्मियों की आवश्यकता है, वहां 50 से 60 पुलिसकर्मियों के भरोसे काम चलाया जा रहा है। छुट्टियों और अन्य ड्यूटी के कारण उपलब्ध बल और कम हो जाता है। ऐसे में अपराध नियंत्रण, कानून-व्यवस्था, बीट सिस्टम, जनसंवाद और वीआईपी ड्यूटी जैसी जिम्मेदारियों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। खासकर भोपाल में लॉ एंड आर्डर ड्यूटी प्रदेश के अन्य शहरों की अपेक्षा ज्यादा है। बीट सिस्टम, माइक्रो बीच सिस्टम, जनसंवाद जैसी अहम जिम्मेदारियां भी पुलिस को दी गई है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि आईएएस अफसर नहीं चाहते कि आईपीएस को उनके बराबर अधिकार मिलें। आईपीएस के पास पूरे अधिकार आ जाएंगे तो आईएएस अफसर की पूछ-परख कम हो जाएगी। उनका औचित्य कम हो जाएगा। आपसी टकरार के बाद भोपाल में पुलिस कमिश्नरेट लागू हुई। पुलिस कमिश्नरेट की पटकथा तो लिख दी, लेकिन पूरे अधिकार कब मिलेंगे? यह सवाल चार साल बाद अब भी बना हुआ है। आधे-अधूरे अधिकार के साथ भोपाल पुलिस कमिश्नेरट अपंग बना हुआ है।
दो इंस्पेक्टर मॉडल पर भी उठ रहे सवाल
राजधानी के कुछ थानों में दो निरीक्षकों की व्यवस्था शुरू की गई है। एक थाना प्रभारी के रूप में पुलिसिंग संभालता है, जबकि दूसरा कानून-व्यवस्था और जनसुनवाई की जिम्मेदारी निभाता है। लेकिन यह भी जिला बल से ही लिए जा रहे हैं। इसमें मुख्य इंस्पेक्टर (थाना प्रभारी) थाने की जिम्मेदारी निभाएगा और दूसरा इंस्पेक्टर लॉ एंड आर्डर देखेगा। लोगों की सुनवाई के लिए थाने में उपलब्ध रहेगा। लेकिन ऐसे में बल की कमी की पूर्ति नहीं होगी। सूत्रों की माने तो भोपाल में में पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम लागू करते समय पुलिस मुख्यालय में चर्चा हुई थी कि एसएएफ से एक इंस्पेक्टर लेकर उससे थाने का लॉ एंड आर्डर दिखवाया जा सकता है। ऐसे में मुख्य थाना प्रभारी (टीआई) थाने में लोगों की समस्या सुनने के लिए उपलब्ध रहेगा। एसएएफ से इंस्पेक्टर आने पर वित्तीय भार नहीं बढ़ेगा। बल की पूर्ति भी हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जबकि यदि ऐसा होता तो एसएएफ इंस्पेक्टर को लिखा-पढ़ी नहीं देखनी पड़ती। सिर्फ लॉ एंड आर्डर देखना होता। उन्हें थाने की पुलिसिंग की कोई लेना-देना नहीं होता। दूसरा मुख्य थाना प्रभारी को सिर्फ पुलिसिंग देखता है। उसके काम में किसी का हस्तक्षेप नहीं होता है।
भोपाल में अनुशासन के चलते इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी ने थाना ज्वाइन तो कर लिया, लेकिन थाने में द्वंद्व फैल गया। बड़े जतन के बाद भोपाल-इंदौर में पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था लागू हो पाई। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बल की वास्तविक कमी दूर नहीं होगी। यदि अलग से अतिरिक्त बल उपलब्ध नहीं कराया गया तो यह व्यवस्था केवल जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण बनकर रह जाएगी। राज्य सरकार उज्जैन, ग्वालियर और जबलपुर में भी पुलिस कमिश्नरेट लागू करने की इच्छा जता चुकी है। लेकिन जानकारों का कहना है कि पहले भोपाल और इंदौर में इस मॉडल को पूर्ण अधिकारों और पर्याप्त संसाधनों के साथ प्रभावी बनाया जाना चाहिए। यदि मौजूदा कमिश्नरेट सफल उदाहरण बनते हैं, तभी अन्य शहरों में इसका विस्तार बेहतर परिणाम दे सकेगा।
आम जनता पर भी पड़ रहा असर
पुलिस बल की कमी और सीमित अधिकारों का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है। मामलों के निस्तारण में देरी, अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की धीमी प्रक्रिया और प्रशासनिक निर्भरता के कारण लोगों को न्याय मिलने में अधिक समय लग रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कमिश्नरेट को पूर्ण अधिकार और पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो राजधानी में कानून-व्यवस्था और अपराध नियंत्रण की स्थिति और अधिक प्रभावी हो सकती है। चार साल बाद भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कमिश्नरेट व्यवस्था लागू हो चुकी है, तो उसे उसके अनुरूप अधिकार और संसाधन कब मिलेंगे।
