
- सरकार का आखिरी कानूनी दांव: व्यापमं चयन परीक्षा को बनाया जाएगा मुख्य आधार
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्य प्रदेश के करीब 70 हजार सरकारी शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता से राहत दिलाने के लिए स्कूल शिक्षा विभाग एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। विभाग 2005 से 2009 के बीच भर्ती हुए शिक्षकों को टीईटी से छूट दिलाने के लिए नई याचिका दायर करेगा। इसके लिए विधि विभाग और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं से कानूनी राय ली जा चुकी है और अगले एक सप्ताह में याचिका दाखिल किए जाने की संभावना है। सरकार का मानना है कि इन शिक्षकों ने नियुक्ति से पहले तत्कालीन व्यापमं (अब कर्मचारी चयन मंडल) द्वारा आयोजित प्रतिस्पर्धी चयन परीक्षा उत्तीर्ण कर नौकरी हासिल की थी। ऐसे में उन्हें वर्षों की सेवा के बाद दोबारा पात्रता परीक्षा देने के लिए बाध्य करना न्यायसंगत नहीं है।
नई याचिका में राज्य सरकार यह तर्क रखेगी कि 2005 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों का चयन पारदर्शी एवं प्रतिस्पर्धी परीक्षा के माध्यम से हुआ था। इसलिए वे पहले ही अपनी शैक्षणिक और व्यावसायिक योग्यता साबित कर चुके हैं। सरकार का कहना है कि ऐसी स्थिति में टीईटी को अनिवार्य बनाना व्यावहारिक और न्यायोचित नहीं है। हालांकि विभागीय सूत्रों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के अब तक के फैसलों को देखते हुए राहत की संभावना सीमित है, फिर भी हजारों शिक्षकों के भविष्य को देखते हुए सरकार यह अंतिम कानूनी प्रयास करना चाहती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बढ़ी थी चुनौती
पूरा विवाद सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट के उस महत्वपूर्ण फैसले के बाद शुरू हुआ, जिसमें कहा गया था कि आरटीई अधिनियम, 2009 लागू होने से पहले नियुक्त ऐसे शिक्षक, जिनकी सेवा में पांच वर्ष से अधिक का समय शेष है, उन्हें टीईटी उत्तीर्ण करना होगा। इसी आदेश के पालन में लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई) ने जुलाई-अगस्त में टीईटी आयोजित करने की तैयारी शुरू कर दी है। विभागीय निर्देशों के अनुसार निर्धारित अवधि तक परीक्षा पास नहीं करने वाले शिक्षकों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति (वीआरएस) दिए जाने की प्रक्रिया भी अपनाई जा सकती है।
कोर्ट से मिली थी सीमित राहत
सरकार और शिक्षक संगठनों की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने नियमों में बदलाव तो नहीं किया, लेकिन कुछ राहत जरूर दी। टीईटी उत्तीर्ण करने की अंतिम तिथि 31 अगस्त 2027 से बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दी गई। इस अवधि तक आयोजित होने वाली प्रत्येक टीईटी परीक्षा में शिक्षकों को शामिल होने का अवसर मिलेगा। जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच वर्ष से कम का समय बचा है, उन्हें टीईटी से छूट दी गई है।
65 से अधिक याचिकाएं पहले ही हो चुकी हैं खारिज
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट अब तक राज्य सरकारों, शिक्षक संगठनों और व्यक्तिगत स्तर पर दायर 65 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कर चुका है। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा था कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत सभी कार्यरत शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता सुनिश्चित करना आवश्यक है। केवल नौकरी जाने की आशंका के आधार पर कानून में छूट नहीं दी जा सकती। अदालत ने यह भी कहा कि बिना निर्धारित योग्यता वाले शिक्षकों के सेवा में बने रहने का असर शिक्षा की गुणवत्ता और आने वाली पीढिय़ों पर पड़ सकता है। टीईटी विवाद अब राजनीतिक रंग भी ले चुका है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अरुण सुभाष चंद्र यादव ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। वहीं शिक्षक संगठनों का कहना है कि वर्षों की सेवा के बाद सेवा शर्तों में बदलाव कर शिक्षकों को परीक्षा देने के लिए बाध्य करना उचित नहीं है।
