- प्रयोग सफल रहा तो मध्यप्रदेश के 54903 गांवों में पराली से मिलेगी रसोई गैस

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने पराली और अन्य कृषि अपशिष्ट के बेहतर प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। यह पहल खेतों में फसल कटने के बाद पराली प्रबंधन से संबंधित है। प्रदूषण का कारण और जलाने से मिट्टी के उर्वरक तत्व नष्ट करने वाली पराली से बायोगैस बनाई जाएगी। अन्य फसल अवशेष भी ऊर्जा का स्रोत बनेंगे। विश्वविद्यालय ने कृषि अपशिष्ट से बायोगैस तैयार करने इंदौर स्थित कृषि महाविद्यालय के परिसर में प्लांट निर्माण शुरू कर दिया है। इसके बाद ग्वालियर स्थित कृषि विवि परिसर में प्लांट बनना शुरू होगा। गैस बनाने के लिए 70 फीसदी फसल अवशेष एवं 30 फीसदी गोबर का इस्तेमाल होगा। कृषि विश्वविद्यालय द्वारा हेवूल एनर्जी प्रा. लि. के साथ मिलकर बनाए जा रहे प्लांट के लिए शुरुआत में फसल अवशेष की उपलब्धता विश्वविद्यालय के पास रिसर्च और कृषि गतिविधियों के लिए मौजूद 300 बीघा जमीन से पूरी की जाएगी। परियोजना सफल होने पर प्रदेश के 4 करोड़ 29 लाख 41 हजार 210 खसरों में मौजूद खेती योग्य 231.29 लाख हेक्टेयर भूमि सहित 87 लाख हेक्टेयर वन भूमि और 9.60 लाख हेक्टेयर पड़त भूमि के फसल सहित अन्य अवशेष का उपयोग बायोगैस बनाने में किया जा सकेगा।
गांवों तक पहुंचेगी तकनीक: इस परियोजना के जरिए विश्वविद्यालय ऐसी तकनीक विकसित करने के प्रयास में है, जिससे किसानों को सीधा फायदा पहुंच सके। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो छोटी बायोगैस यूनिट किसानों को उपलब्ध कराई जाएंगीं। इससे 165.70 प्रतिशत की फसल सघनता वाले प्रदेश के 54903 गांवों में बायोगैस के लिए प्रति हेक्टेयर 50 हजार किलो पराली मिल सकती है। इससे खेतों में पराली जलाने की समस्या पर प्रभावी तरीके से रोक लगाने में मदद मिल सकती है।
समस्या से निजात दिलाने में रहेगी अहम
– पराली जलाने की समस्या से निजात मिले सकेगी। वायु प्रदूषण कम होगा।
– गोबर गैस प्लांट की तुलना में कृषि अपशिष्ट आधारित तकनीक बेहतर साबित होगी।
– पारंपरिक बायोगैस प्लांट की अपेक्षा इस संयंत्र के लिए कृषि अवशेष प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहेंगे।
– बायोगैस से बचने वाले अवशेष खेतों के लिए उपयोगी जैविक खाद के रूप में कारगर रहेगा।
– विश्वविद्यालय परिसर में बनने वाली गैस का उपयोग छात्रों के लिए भोजन पकाने में किया जाएगा।
– पराली को खेत में जलाने से मिट्टी की ऊपरी परत पर मौजूद जीवाणु नष्ट नहीं होंगे।
यह है पराली जलाने से नुकसान
एक टन पराली जलाने पर 5.5 किग्रा नाइट्रोजन, 2.3 किग्रा फास्फोरस, 25 किग्रा पोटेशियम, 1.2 किलोग्राम सल्फर सहित अन्य तत्व खेत से नष्ट हो जाते हैं।
इनका कहना है: कृषि विवि से संबद्ध इंदौर कृषि विद्यालय में अपशिष्ट से बायोगैस बनाने का प्लांट पूर्णता की ओर है। जल्दी ही कंपनी विश्वविद्यालय में भी काम शुरू कर देगी। इस प्रयोग की सफलता के बाद खेतों में पराली जलाने की जरूरत कम होगी, कृषि अपशिष्ट का उपयोग ऊर्जा उत्पादन में हो सकेगा और बायोगैस बनने के बाद प्राप्त अवशेष को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा।
– प्रो. अरविंद शुक्ला, कुलपति राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय
