पीडब्ल्यूडी ने बदले नियम; सडक़-भवन के हर टेंडर पर समिति की जिम्मेदारी तय
– गौरव चौहान
लोक निर्माण विभाग की सडक़ और भवन निर्माण परियोजनाओं के टेंडर में अब गलती करना संबंधित अधिकारियों को भारी पड़ सकता है। सरकार ने निविदा प्रक्रिया में होने वाली तकनीकी और वित्तीय गड़बडिय़ों पर लगाम कसने के लिए टेंडर जांच की पूरी प्रक्रिया में जवाबदेही तय कर दी है। अब किसी निविदा में खामी पाई गई तो सिर्फ ठेकेदार या संबंधित एजेंसी पर सवाल नहीं उठेंगे, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि जांच करने वाली समिति ने उस गड़बड़ी को आगे कैसे बढऩे दिया।पीडब्ल्यूडी ने तकनीकी समीक्षा से लेकर वित्तीय मूल्यांकन और राज्य स्तरीय निविदा निराकरण समिति तक प्रस्ताव पहुंचने के प्रत्येक चरण की जिम्मेदारी स्पष्ट कर दी है। जिस स्तर पर चूक होगी, उसी स्तर की समिति और उसमें शामिल अधिकारियों की भूमिका तय की जाएगी। इस संबंध में पीडब्ल्यूडी के उप सचिव एआर सिंह ने सभी प्रमुख अभियंताओं के साथ भवन विकास निगम और मध्यप्रदेश सडक़ विकास निगम के अधिकारियों को पत्र जारी किया है। विभाग ने हाल के दिनों में निर्माण कार्यों की निविदाओं की तकनीकी और वित्तीय समीक्षा के दौरान सामने आई कमियों को गंभीरता से लेते हुए भविष्य में ऐसी गड़बडिय़ां दोबारा न होने देने के निर्देश दिए हैं।*टेंडर सिर्फ कागजों की खानापूर्ति नहीं*विभाग की नई व्यवस्था को निर्माण कार्यों की टेंडर प्रक्रिया में प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब निविदा की फाइल पर हस्ताक्षर करना महज औपचारिकता नहीं होगी। संबंधित समिति को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके स्तर पर की गई जांच पूरी तरह सही और नियमों के अनुरूप है। यानी भविष्य में किसी सडक़ या भवन के टेंडर में तकनीकी पात्रता, दस्तावेज, निर्धारित शर्तों अथवा अन्य तकनीकी मापदंडों में गंभीर चूक सामने आती है तो सबसे पहले यह सवाल उठेगा कि तकनीकी समीक्षा समिति ने इसे जांच के दौरान क्यों नहीं पकड़ा। इसी तरह वित्तीय मूल्यांकन में गलती मिलने पर संबंधित मूल्यांकन अथवा निविदा निराकरण समिति की जिम्मेदारी तय की जाएगी।*पहले तकनीकी छंटनी, फिर खुलेगा वित्तीय प्रस्ताव*नई व्यवस्था का सबसे अहम पहलू यह है कि टेंडर प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा। पहले विभागीय तकनीकी समीक्षा समिति निविदा की जांच करेगी। समिति को निविदा में निर्धारित सभी शर्तों और तकनीकी मापदंडों का सूक्ष्म परीक्षण करना होगा। जो निविदा तकनीकी रूप से पात्र होगी, उसी को आगे वित्तीय मूल्यांकन के लिए भेजा जाएगा। इससे ऐसी स्थिति रोकने की कोशिश होगी जिसमें तकनीकी रूप से अयोग्य प्रस्ताव भी वित्तीय प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन जाए। तकनीकी जांच के दौरान कोई गलती या अनियमितता सामने आती है और समिति उसे नजरअंदाज कर देती है, तो संबंधित तकनीकी समीक्षा समिति की जवाबदेही तय की जाएगी।*वित्तीय गड़बड़ी पर भी समिति से जवाब*तकनीकी जांच के बाद वित्तीय मूल्यांकन की बारी आएगी। इसके लिए संबंधित मूल्यांकन एवं निविदा निराकरण समितियां जिम्मेदार होंगी। वित्तीय प्रस्तावों, दरों और उनसे जुड़े तर्कों की जांच की जाएगी। यदि बाद में वित्तीय मूल्यांकन में कोई त्रुटि सामने आती है तो यह नहीं माना जाएगा कि गलती सिर्फ प्रक्रिया की थी। संबंधित समिति की भूमिका और उसकी जांच प्रक्रिया की भी पड़ताल होगी। इस व्यवस्था से वित्तीय निर्णय लेने वाले अधिकारियों पर भी जवाबदेही का दबाव बढ़ेगा।*राज्य स्तरीय समिति के सामने अधूरी फाइल नहीं जाएगी*सरकार ने सबसे ऊपर एक और सुरक्षा कवच लगाया है। राज्य स्तरीय निविदा निराकरण समिति के समक्ष प्रस्ताव भेजने से पहले विभागाध्यक्ष स्तर पर गठित परीक्षण समिति उसकी जांच करेगी। यह समिति खासतौर पर वित्तीय मूल्यांकन और उससे जुड़े वित्तीय तर्कों की शुद्धता सुनिश्चित करेगी। यानी नीचे के स्तर पर हुई जांच के बाद भी प्रस्ताव को सीधे राज्य स्तरीय समिति तक नहीं पहुंचाया जा सकेगा। यदि प्रस्ताव में वित्तीय या तकनीकी कमी है तो उसे शुरुआती स्तर पर ही रोका जाएगा।*वर्षों से उठते रहे हैं टेंडर प्रक्रिया पर सवाल*पीडब्ल्यूडी की सडक़ और भवन परियोजनाओं में हजारों करोड़ रुपये के निर्माण कार्य होते हैं। ऐसे में निविदा प्रक्रिया में छोटी सी तकनीकी या वित्तीय चूक का असर सिर्फ एक फाइल तक सीमित नहीं रहता। इससे सरकारी खर्च, परियोजना की लागत, निर्माण की गुणवत्ता और काम पूरा होने की समयसीमा तक प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि सरकार अब टेंडर प्रक्रिया में ‘किसकी जिम्मेदारी’ का जवाब पहले से तय करना चाहती है। नई व्यवस्था का राजनीतिक संदेश भी साफ है। सरकार लगातार सडक़, पुल, भवन और बुनियादी ढांचे के निर्माण में बड़े निवेश और तेज विकास का दावा कर रही है। ऐसे में इन परियोजनाओं के टेंडर पारदर्शी और नियमों के मुताबिक हों, यह प्रशासनिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण हो गया है।*अब गड़बड़ी पकड़ी गई तो फाइल भी बोलेगी*नई व्यवस्था का सबसे बड़ा असर यह हो सकता है कि किसी टेंडर में गड़बड़ी सामने आने के बाद जिम्मेदारी तय करना आसान होगा। फाइल किस समिति के पास गई, किसने तकनीकी परीक्षण किया, किसने वित्तीय मूल्यांकन किया और किस स्तर पर प्रस्ताव को आगे बढ़ाया गया—इन सभी चरणों की भूमिका देखी जा सकेगी। इससे सामूहिक जिम्मेदारी के पीछे व्यक्तिगत जवाबदेही छिपाने की गुंजाइश कम होगी। नियम सख्त करने के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती उनके प्रभावी क्रियान्वयन की होगी। यदि किसी टेंडर में गलती मिलने के बाद संबंधित समिति के अधिकारियों की वास्तविक जवाबदेही तय होती है तो यह व्यवस्था निचले स्तर तक मजबूत संदेश देगी। लेकिन यदि जांच में खामी सामने आने के बावजूद जिम्मेदारी तय नहीं हुई तो नई व्यवस्था भी महज एक और प्रशासनिक आदेश बनकर रह सकती है। फिलहाल पीडब्ल्यूडी ने टेंडर प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि टेंडर की फाइल आगे बढ़ाना केवल प्रक्रिया नहीं, जिम्मेदारी भी है। सडक़ और भवन के काम में गड़बड़ी मिली तो अब फाइल के साथ समिति भी कटघरे में होगी।
