
- एक साल से अध्यक्ष और सदस्य नहीं, विकास कार्य, नई नियुक्तियां और नए कोर्स अटके
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश के 40 जिलों के करीब 473 शासकीय महाविद्यालयों में जनभागीदारी समिति के अध्यक्ष और सदस्यों के पद पिछले एक वर्ष से रिक्त पड़े हैं। राजनीतिक नियुक्तियां नहीं होने के कारण अधिकांश कॉलेजों में समितियों का गठन ही नहीं हो सका है। इसका सीधा असर कॉलेजों के विकास कार्यों, वित्तीय निर्णयों, नए पाठ्यक्रमों, अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति और अन्य प्रशासनिक कार्यों पर पड़ रहा है। वर्तमान में समितियों के उपाध्यक्ष के रूप में संबंधित जिले के कलेक्टर या उनके नामित प्रतिनिधि जिम्मेदारी निभा रहे हैं। लेकिन समयाभाव के कारण नियमित बैठकें नहीं हो पा रही हैं, जिससे जनभागीदारी समिति के माध्यम से लिए जाने वाले महत्वपूर्ण निर्णय लंबित हैं।
प्रदेश में शासकीय महाविद्यालयों के विकास और स्थानीय भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वर्ष 1997 में जनभागीदारी समिति की व्यवस्था शुरू की गई थी। समिति में सामान्य परिषद, प्रबंध समिति और वित्त समिति जैसी तीन प्रमुख इकाइयां होती हैं। समिति के अध्यक्ष का मनोनयन शासन द्वारा किया जाता है, जबकि उपाध्यक्ष कलेक्टर और सचिव संबंधित महाविद्यालय के प्राचार्य होते हैं। एक समिति में औसतन 20 सदस्य शामिल किए जाते हैं।
कोरोना के बाद नहीं हुई नियुक्तियां
उच्च शिक्षा विभाग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, कोरोना काल के बाद से राजनीतिक कारणों के चलते अधिकांश कॉलेजों में जनभागीदारी समिति के अध्यक्षों की नियुक्ति नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप समितियां निष्क्रिय हो गई हैं और कॉलेजों का संचालन केवल प्राचार्य एवं कलेक्टर स्तर पर उपलब्ध सीमित अधिकारों के आधार पर किया जा रहा है।
विकास कार्य और नए प्रस्ताव अटके
जनभागीदारी समिति के अभाव में कॉलेजों में कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव लंबित हैं। इनमें नए भवनों का निर्माण, प्रयोगशालाओं और उपकरणों की खरीद, अतिथि शिक्षकों एवं कर्मचारियों की नियुक्ति, स्व-वित्तपोषित पाठ्यक्रमों की फीस निर्धारण तथा नए कोर्स शुरू करने जैसे निर्णय शामिल हैं। भोपाल के भेल शासकीय महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. संजय जैन ने बताया कि समिति के अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त होने के बाद से कॉलेज कलेक्टर के मार्गदर्शन में संचालित हो रहा है। उन्होंने कहा कि कई विकास कार्यों और वित्तीय मामलों में समिति की स्वीकृति आवश्यक होती है, इसलिए अनेक निर्णय लंबित हैं। वहीं शासकीय महाविद्यालय इटारसी के प्राध्यापक डॉ. संजय आर्य का कहना है कि समिति के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति नहीं होने से नए पाठ्यक्रम शुरू करने, आवश्यक कर्मचारियों की नियुक्ति और अन्य विकास योजनाओं पर निर्णय नहीं हो पा रहे हैं। कई प्रस्ताव लंबे समय से स्वीकृति का इंतजार कर रहे हैं।
