- मंत्री दर्जा ना मिलने से असमंजस में निगम-मंडलों, आयोगों के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष

गौरव चौहान
मप्र में निगम-मंडलों, आयोगों और प्राधिकरणों में लंबे इंतजार के बाद की गई नियुक्तियों ने भाजपा संगठन के भीतर राजनीतिक संतुलन तो साध दिया है, लेकिन अब मंत्री दर्जे को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बनाए गए नेताओं के बीच यह सवाल सबसे बड़ा बना हुआ है कि उन्हें केवल पद और जिम्मेदारी तक सीमित रखा जाएगा या फिर कैबिनेट एवं राज्य मंत्री स्तर की सुविधाएं और अधिकार भी मिलेंगे।
प्रदेश सरकार ने संगठन के साथ समन्वय बनाकर क्षेत्रीय, सामाजिक और वरिष्ठता के आधार पर अब तक करीब 60 नियुक्तियां की हैं। इनमें 10 प्राधिकरण, 8 निगम, 5 आयोग, 4 बोर्ड, 3 समितियां तथा अन्य संस्थानों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियां शामिल हैं। भाजपा ने इन नियुक्तियों के जरिए वरिष्ठ नेताओं के साथ युवा और सक्रिय कार्यकर्ताओं को भी साधने का प्रयास किया है। हालांकि नियुक्तियों के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि इस बार मंत्री दर्जा मिलने के बावजूद सुविधाओं और संसाधनों में कटौती हो सकती है।
इस बार सीमित सुविधाएं
पार्टी सूत्रों का कहना है कि सरकार अशासकीय नियुक्तियों वाले अध्यक्ष और उपाध्यक्षों को कैबिनेट मंत्री एवं राज्यमंत्री का दर्जा देने पर विचार कर रही है, लेकिन उनसे जुड़ी कई पारंपरिक सुविधाओं को सीमित किया जा सकता है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर चर्चाएं चल रही हैं। कुछ लोग इसे वीआईपी संस्कृति कम करने की कोशिश मान रहे हैं, जबकि कई नेताओं का मानना है कि सरकार खर्चों में कटौती का संदेश देना चाहती है। हालांकि अभी तक सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं हुआ है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक निगम-मंडलों की नियुक्तियां केवल प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं होती, बल्कि संगठन में लंबे समय से सक्रिय कार्यकर्ताओं को सम्मान और जिम्मेदारी देने का माध्यम भी मानी जाती हैं। ऐसे में मंत्री दर्जा इन पदों की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण तत्व माना जाता है। दिसंबर 2021 में जब निगम-मंडलों में नियुक्तियां हुई थी, तब अधिकांश पदाधिकारियों को तत्काल कैबिनेट और राज्यमंत्री का दर्जा प्रदान कर दिया गया था। इसके बाद उन्हें सरकारी वाहन, बंगला, स्टाफ और प्रोटोकॉल जैसी सुविधाएं भी मिली थीं। इस बार अब तक ऐसी घोषणा नहीं होने से नई नियुक्तियों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। मंत्री दर्जा मिलने के बाद अध्यक्ष और उपाध्यक्षों को वेतन, उपचार भत्ता और कार्यालय खर्च के लिए निश्चित राशि मिलती है। इसके अलावा सरकारी वाहन और चालक, हर महीने पेट्रोल-डीजल की तय सीमा, सरकारी आवास, कार्यालय स्टाफ, सुरक्षा गार्ड तथा सरकारी यात्राओं के लिए टीए-डीए जैसी सुविधाएं भी प्रदान की जाती हैं। कई मामलों में परिवार को भी उच्चस्तरीय चिकित्सा सुविधाओं का लाभ मिलता है। यही कारण है कि नए पदाधिकारी अब सरकार के अगले फैसले पर नजर बनाए हुए हैं।
अधिकांश पूर्व पदाधिकारियों को इस बार मौका नहीं
नई सूची की एक और विशेषता यह है कि 2021 में निगम-मंडलों में स्थान पाने वाले अधिकांश नेताओं को इस बार दोबारा मौका नहीं मिला। केवल दो-तीन नाम ही नई सूची में दोहराए गए हैं। कई नेताओं को संगठन में नई जिम्मेदारियां मिल चुकी हैं, जबकि कुछ नेता विधायक और मंत्री बन गए हैं। पूर्व सूची में शामिल शैलेन्द्र बरुआ अब भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। जितेंद्र लिटोरिया को कार्यालय व्यवस्था प्रभारी बनाया गया है, जबकि आशुतोष तिवारी प्रदेश प्रकोष्ठ प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। जयपाल चावड़ा किसान मोर्चा के अध्यक्ष हैं। मंजू दादू और रमेश खटीक विधायक बन चुके हैं, जबकि एंदल सिंह कंसाना मंत्री पद तक पहुंच चुके हैं। वहीं पिछली सूची के कई प्रमुख चेहरे इस बार बाहर हो गए हैं। इनमें इमरती देवी, गिर्राज दण्डोतिया, रणवीर जाटव, मुन्नालाल गोयल, रघुराज कंसाना, जसवंत जाटव, प्रहलाद भारती, नरेन्द्र बिरथरे और राजकुमार कुशवाहा जैसे नाम शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक नियुक्तियों का सिलसिला अभी समाप्त नहीं हुआ है। आने वाले समय में विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की कार्यपरिषद, जनभागीदारी समितियों तथा प्रदेश के 16 नगर निगमों में वरिष्ठ पार्षदों की नियुक्तियां भी की जा सकती हैं। इसके अलावा विभिन्न विभागों और सरकारी संस्थानों में भी पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां देने की तैयारी चल रही है।
