डमी दुकानों को लाइसेंस कैसे मिले?

लाइसेंस
  • कफ सिरप रैकेट की जांच में औषधि विभाग संदेह के घेरे में
  • एसटीएफ की कार्रवाई में डेढ़ करोड़ का माल जब्त,  11 आरोपी गिरफ्तार

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। कोडीन युक्त कफ सिरप की अवैध बिक्री और वितरण के खिलाफ मध्यप्रदेश विशेष कार्य बल (एसटीएफ) की कार्रवाई ने न केवल एक बड़े नशा कारोबार का खुलासा किया है, बल्कि खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में सामने आया है कि जिन दवा दुकानों के लाइसेंस पर करोड़ों रुपये के कफ सिरप की सप्लाई हो रही थी, वे वास्तव में डमी प्रतिष्ठान थीं और वहां नियमित दवा कारोबार का कोई अस्तित्व नहीं था। एसटीएफ द्वारा भोपाल और आसपास के क्षेत्रों में की गई कार्रवाई में करीब डेढ़ करोड़ रुपये मूल्य के दो प्रकार के कोडीन युक्त कफ सिरप बरामद किए गए थे। जांच में पता चला कि इन दवाओं का भंडारण घरों और अन्य निजी स्थानों पर किया जा रहा था तथा लेबल बदलकर ग्रामीण क्षेत्रों में खपाया जा रहा था।
जांच एजेंसी के अनुसार मंडीदीप स्थित विंग्स लाइफ रेमिडिज के नाम से जारी दवा लाइसेंस का उपयोग इस अवैध कारोबार में किया जा रहा था। लाइसेंस बालकिशन के नाम पर था, जो दवा कंपनी का प्रतिनिधि बताया गया है। एसटीएफ का दावा है कि दुकान केवल कागजों में संचालित हो रही थी, जबकि वास्तविक गतिविधियां कहीं और से संचालित की जा रही थीं। दिल्ली से मंगाए गए कफ सिरप के लेबल बदलकर उन्हें नए नाम से बाजार में भेजा जाता था। इसी तरह मिसरोद क्षेत्र में अर्जुन ट्रेडर्स नामक प्रतिष्ठान भी जांच के दायरे में आया है। इसके संचालक राहुल उर्फ अर्जुन मालवीय को एसटीएफ ने बैतूल से गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया कि दोनों प्रतिष्ठानों में दवाओं का वास्तविक स्टॉक नहीं था, लेकिन उनके लाइसेंस का उपयोग बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित दवाओं की खरीद और वितरण के लिए किया जा रहा था।
क्या बिना जांच दिए गए लाइसेंस
यहीं से खाद्य एवं औषधि विभाग की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। नियमों के अनुसार किसी भी दवा दुकान का लाइसेंस जारी करने से पहले औषधि निरीक्षक द्वारा स्थल निरीक्षण किया जाता है। दुकान में आवश्यक बुनियादी सुविधाओं, भंडारण व्यवस्था और नियमानुसार संचालन की पुष्टि के बाद ही लाइसेंस जारी किया जाता है। ऐसे में यदि संबंधित प्रतिष्ठान वास्तव में डमी थे और वहां दवा कारोबार नहीं हो रहा था, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि निरीक्षण के दौरान यह स्थिति क्यों नहीं पकड़ी गई। या बिना निरीक्षण ही दवा दुकान को लाइसेंस दे दिए गए। एसटीएफ अब तक इस मामले में 11 आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है। मुख्य आरोपियों में सीहोर निवासी आकाश भाटी और परवलिया सडक़ निवासी अकील खान शामिल हैं। वहीं निखिल उर्फ नितिन साहू और सलमान उर्फ बाबू भाई अभी भी फरार हैं। दोनों पर 30-30 हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया है।
एसटीएफ का फोकस नेटवर्क को ध्वस्त करने पर
एसटीएफ अधिकारियों का कहना है कि उनका फोकस फिलहाल अवैध सप्लाई नेटवर्क को ध्वस्त करने और इसमें शामिल आरोपियों को गिरफ्तार करने पर है। एसटीएफ के पुलिस अधीक्षक राजेश सिंह भदौरिया ने स्पष्ट किया कि फिलहाल औषधि निरीक्षकों की भूमिका की जांच उनकी एजेंसी के दायरे में नहीं है। दूसरी ओर खाद्य एवं औषधि विभाग भी इस मामले में रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई दे रहा है। विभाग के प्रभारी अधिकारी कन्हैया लाल ने स्वीकार किया कि संबंधित दुकानों का अस्तित्व था, लेकिन वहां माल नहीं मिलने के संबंध में उन्होंने विस्तृत टिप्पणी करने से बचते हुए कहा कि तथ्यात्मक स्थिति आमने-सामने चर्चा के दौरान स्पष्ट की जा सकती है। फिलहाल यह मामला केवल अवैध कफ सिरप कारोबार तक सीमित नहीं रह गया है। जांच आगे बढऩे के साथ यह सवाल और महत्वपूर्ण होता जा रहा है कि आखिर ऐसी डमी दुकानों को लाइसेंस कैसे मिले और वर्षों तक उनका संचालन अधिकारियों की नजरों से कैसे ओझल रहा। यदि इस पहलू की निष्पक्ष जांच होती है तो दवा लाइसेंसिंग और निगरानी व्यवस्था में मौजूद खामियां भी सामने आ सकती हैं।

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