92 साल पुराने अंग्रेजी दौर के 7 कानून खत्म

  • विधानसभा से पारित निरसन विधेयक को राज्यपाल की मंजूरी के बाद सरकार ने जारी की अधिसूचना
  • मप्र में अब नहीं होगा इस्तेमाल
    गौरव चौहान

    मध्य प्रदेश में अंग्रेजी शासन के दौर से चले आ रहे सात पुराने कानून अब इतिहास का हिस्सा बन गए हैं। राज्य सरकार ने इन कानूनों को निरस्त करने की अधिसूचना जारी कर दी है। ये कानून उस दौर में बनाए गए थे, जब मध्य प्रदेश का अस्तित्व नहीं था और वर्तमान प्रदेश का बड़ा हिस्सा सेंट्रल प्रोविंसेज एंड बरार (सीपी एंड बरार) के नाम से जाना जाता था। इन कानूनों में कर्ज के बोझ से दबे लोगों को राहत देने, सूदखोरों से संरक्षण, अकाल राहत कोष, शिक्षा व्यवस्था, चिकित्सा और भूमि सर्वेक्षण जैसे विषय शामिल थे। इनमें सबसे पुराना कानून 1933 का है, जबकि अंतिम कानून 1947 में लागू हुआ था। यानी करीब नौ दशक से अधिक समय से चले आ रहे इन कानूनों को अब अप्रासंगिक मानते हुए समाप्त कर दिया गया है।
    अंग्रेजी शासन के दौरान सीपी एंड बरार में अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से बनाए गए इन कानूनों को 1 नवंबर 1956 को मध्य प्रदेश के गठन के बाद भी प्रदेश में लागू रखा गया था। समय के साथ कर्ज, जमीन, शिक्षा, चिकित्सा और राजस्व व्यवस्था से संबंधित कई नए केंद्रीय और राज्य कानून अस्तित्व में आए। इसके बावजूद पुराने कानून तकनीकी रूप से लागू बने हुए थे। केंद्र सरकार की ओर से पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को खत्म करने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने भी राज्य में लागू पुराने कानूनों की समीक्षा शुरू की। इसी प्रक्रिया में सामने आया कि सीपी एंड बरार के समय के सात कानून अब भी प्रदेश में प्रभावी हैं, जबकि वर्तमान परिस्थितियों में उनका व्यावहारिक उपयोग लगभग समाप्त हो चुका है।
    अदालतों में लंबित मामलों से भी जुड़ा था मामला
    राज्य सरकार की ओर से इन कानूनों की उपयोगिता का परीक्षण कराया गया। इसमें पाया गया कि कर्ज, भूमि विवाद, शिक्षा और अन्य संबंधित विषयों पर अब नए और व्यापक कानून लागू हैं। पुराने कानूनों के कई प्रावधान वर्तमान कानूनी व्यवस्था से अप्रासंगिक हो चुके हैं। विधि एवं विधायी कार्य विभाग की समीक्षा के बाद सरकार ने इन कानूनों को समाप्त करने का निर्णय लिया। सरकार का मानना था कि पुराने कानूनों के अस्तित्व के कारण कानूनी व्यवस्था में अनावश्यक जटिलता बनी हुई थी और कुछ मामलों में पुराने प्रावधानों के संदर्भ से विवाद लंबे समय तक न्यायालयों में लंबित रहे। गौरतलब है कि सातों कानूनों को समाप्त करने के लिए राज्य सरकार ने पिछले विधानसभा सत्र में निरसन विधेयक पेश किया था। विधानसभा से विधेयक पारित होने के बाद इसे राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा गया। 7 अगस्त को राज्यपाल ने निरसन विधेयक को मंजूरी दे दी। इसके बाद राज्य सरकार ने सातों कानूनों को औपचारिक रूप से समाप्त करने के लिए अधिसूचना जारी कर दी। अब इन कानूनों के आधार पर प्रदेश में किसी नए मामले में कार्रवाई नहीं की जा सकेगी। इनके स्थान पर संबंधित विषयों को नियंत्रित करने वाले वर्तमान कानून और नियम प्रभावी रहेंगे।
    कौन-कौन से कानून हुए खत्म
    डेट कंसिलिएशन एक्ट, 1933: सेंट्रल प्रोविंसेज एंड बरार के लिए वर्ष 1933 में लागू इस कानून का उद्देश्य कर्ज से जुड़े मामलों और विवादों का समाधान करना था। उस समय ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था में कर्ज का बोझ बड़ी समस्या था। कर्जदारों और लेनदारों के बीच विवादों के निपटारे के लिए इस कानून में व्यवस्था की गई थी।
    प्रोटेक्शन ऑफ डेटर्स एक्ट, 1937: यह कानून कर्जदारों को साहूकारों और कर्ज के दबाव से संरक्षण देने के उद्देश्य से बनाया गया था। इसके तहत कर्जदारों के हितों की रक्षा और कर्ज से जुड़े शोषण को रोकने के प्रावधान थे। बाद में कर्ज और वित्तीय लेनदेन से जुड़े आधुनिक कानूनों में अधिक प्रभावी प्रावधान आने के बाद इसकी उपयोगिता समाप्त हो गई।
    फेमाइन रिलीफ फंड एक्ट, 1937: 1937 में लागू यह कानून अकाल राहत कोष से संबंधित था। उस समय अकाल और खाद्यान्न संकट से प्रभावित क्षेत्रों में राहत पहुंचाने के लिए अलग व्यवस्था की जरूरत थी। सीपी एंड बरार तक सीमित इस कानून की जगह समय के साथ नई प्रशासनिक और आपदा राहत व्यवस्था विकसित हो गई।
    रिलीफ ऑफ इनडेटेडनेस एक्ट, 1939: कर्ज के भारी बोझ से दबे लोगों को राहत देने के उद्देश्य से 1939 में यह कानून लागू किया गया था। इसके तहत कर्जदारों के मकान और जमीन को सूदखोरों द्वारा मनमाने तरीके से कब्जे में लेने से सुरक्षा देने के प्रावधान थे। बाद में भूमि, कर्ज और ऋण वसूली से जुड़े नए कानून आने के बाद इस पुराने कानून की जरूरत नहीं रह गई।
    विद्या मंदिर एक्ट, 1940: वर्ष 1940 में लागू यह अधिनियम स्कूलों और विद्या मंदिर योजनाओं के संचालन से संबंधित था। स्वतंत्रता के बाद शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव हुए और नए कानून एवं नियम अस्तित्व में आए। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में इस कानून की उपयोगिता समाप्त होने के कारण इसे भी निरस्त कर दिया गया।
    एमपी रेगूलेशन ऑफ काउचिंग एक्ट, 1944: यह एक पुराना चिकित्सा संबंधी कानून था। इसका उद्देश्य अयोग्य व्यक्तियों द्वारा आंखों के मोतियाबिंद का उपचार किए जाने पर रोक लगाना था। बाद में चिकित्सा क्षेत्र में नए कानून और नियामक व्यवस्था विकसित होने के कारण इस अधिनियम की जरूरत समाप्त हो गई।
    लैंड सर्वे एक्ट, 1947: भूमि के सर्वेक्षण और उससे संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया के लिए वर्ष 1947 में यह कानून लागू किया गया था। स्वतंत्रता के बाद भूमि प्रबंधन, राजस्व प्रशासन और सर्वेक्षण की तकनीक में व्यापक बदलाव हुए। नए राजस्व एवं भूमि संबंधी कानूनों और व्यवस्थाओं के लागू होने के बाद इस पुराने अधिनियम को अप्रासंगिक माना गया।
    अंग्रेजी दौर की कानूनी विरासत का एक और अध्याय खत्म
    इन सात कानूनों के निरस्त होने के साथ मध्य प्रदेश में ब्रिटिश काल की कानूनी विरासत का एक और हिस्सा समाप्त हो गया है। सरकार का जोर अब ऐसे पुराने कानूनों को हटाने पर है, जिनकी जगह वर्तमान जरूरतों के अनुरूप नए कानून और प्रशासनिक व्यवस्थाएं प्रभावी हो चुकी हैं। इससे कानूनों की संख्या कम करने के साथ न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया को भी अधिक स्पष्ट बनाने की उम्मीद है।

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