- इको-सेंसिटिव जोन घोषित न होने से संरक्षण व्यवस्था कमजोर, अवैध खनन-निर्माण से वन्यजीवों पर बढ़ा खतरा
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश के अधिकांश अभयारण्यों की सीमाओं का अंतिम निर्धारण और अधिसूचना दशकों बाद भी लंबित है। इसका सीधा असर वन्यजीव संरक्षण पर पड़ रहा है। अंतिम अधिसूचना नहीं होने के कारण कई अभयारण्यों के आसपास अवैध निर्माण और खनन गतिविधियां जारी हैं, जबकि ये क्षेत्र अब तक इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) का दर्जा भी हासिल नहीं कर पाए हैं। जानकारी के अनुसार प्रदेश के 26 अभयारण्यों में से 22 की अंतिम अधिसूचना अब तक जारी नहीं हो सकी है। इनमें कुछ अभयारण्यों के मामले 40 से 48 वर्ष पुराने हैं। बताया गया है कि चंबल क्षेत्र में आने वाले घाटीगांव और केन घडिय़ाल सेंचुरी का अंतिम नोटिफिकेशन 1981 से लंबित है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य को 1982 से अब तक इंतजार करना पड़ रहा है। हैरानी वाली बात तो ये है कि इन सभी अभयारण्यों की अंतिम सूचना वन विभाग के रिकार्ड से नदारत है।
जानकारी के अनुसार जब किसी वन्य क्षेत्र को अभयारण्य के तौर पर चिन्हित किया जाता है, तो उसके लिए प्रारंभिक अधिसूचना जारी की जाती है। इसके बाद अभयारण्यों की सीमाओं का निर्धारण किया जाता है, जिसमें संबंधित जिला प्रशासन, राजस्व विभाग और वन विभाग की अहम भूमिका होती है। इनके द्वारा सीमा चिन्हित कर अभयारण्यों की अंतिम अधिसूचना जारी की जारी है। इसके उपरांत अधिसूचित क्षेत्र में पूरी तरह से खनन या निर्माण जैसे कार्य प्रतिबंधित हो जाते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि सीमा निर्धारण और अंतिम नोटिफिकेशन में देरी के कारण संरक्षित क्षेत्रों की वास्तविक सीमाएं स्पष्ट नहीं हो पातीं, जिसका फायदा अवैध गतिविधियों में लगे लोगों को मिलता है। मप्र के अधिकांश अभयारण्यों के आसपास अवैध निर्माण और खनन किया जा रहा है, जिससे ये क्षेत्र जहां इको-सेंसिटिव जोन नहीं बन पा रहे हैं, तो वहीं वन्यजीवों के जीवन पर भी खतरा मडरा रहा है। इसकी मूल वजह अभयारण्यों की सीमाओं का निर्धारण करने अंतिम अधिसूचना जारी नहीं होना है। सूत्रों का कहना है कि इस मामले में वन महकमा सहित राजस्व जैसे दूसरे विभाग वर्षों से निष्क्रिय हैं।
केवल चार अभयारण्य पूरी तरह अधिसूचित
प्रदेश में फिलहाल केवल चार अभयारण्य पूरी तरह अधिसूचित श्रेणी में हैं। इनमें पेंच मोगली अभयारण्य (सिवनी), रालामंडल अभयारण्य (इंदौर), खिवनी अभयारण्य (देवास) और वीरांगना दुर्गावती अभयारण्य (दमोह) शामिल हैं। सिवनी के पेंच मोगली अभयारण्य की प्रथम अधिसूचना वर्ष 1977 में जारी की गई थी, जबकि अंतिम अधिसूचना 1996 में कर दी गई। इंदौर के रालामंडल अभयारण्य को वर्ष 1989 में प्राथमिक तौर पर अधिसूचित किया गया था, जबकि 1998 में अंतिम नोटिफिकेशन कर दिया गया था। देवास के खिवनी अभयारण्य की प्रारंभिक अधिसूचना 1982 में, तो अंतिम अधिसूचना 2006 में जारी कर दी गई थी। इसी तरह दमोह जिले में आने वाले वीरांगना दुर्गावती सेंचुरी 1997 में पूरी तरह से नोटिफाइट कर दिया गया। ऐसे में सवाल उठता है कि चार दशक बाद भी अंतिम अधिसूचना क्यों नहीं हो सकी? क्या विभागीय समन्वय की कमी वन्यजीव संरक्षण में सबसे बड़ी बाधा बन गई है?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी पूरा पालन नहीं
सुप्रीम कोर्ट संरक्षित वन क्षेत्रों के आसपास इको-सेंसिटिव जोन बनाए जाने की आवश्यकता पर स्पष्ट निर्देश दे चुका है। इसके बावजूद मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में अभयारण्य अंतिम अधिसूचना के अभाव में इस व्यवस्था से बाहर हैं। इससे पर्यावरणीय सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण दोनों प्रभावित हो रहे हैं। जानकारी के अनुसार घाटीगांव अभयारण्य, केन घडिय़ाल अभयारण्य और राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य जैसे महत्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्रों की अंतिम अधिसूचना 1981-82 से लंबित है। बताया जाता है कि कई मामलों में अंतिम अधिसूचना संबंधी रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं हैं।
तीन विभागों के बीच तालमेल की कमी
सूत्रों के मुताबिक अभयारण्यों की सीमाएं तय करने की प्रक्रिया में जिला प्रशासन, राजस्व विभाग और वन विभाग की संयुक्त भूमिका होती है। लेकिन इन विभागों के बीच समन्वय की कमी के चलते कई अभयारण्यों का सीमा निर्धारण वर्षों से अधूरा पड़ा है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े एक्टिविस्ट अजय दुबे ने इस संबंध में मुख्य सचिव अनुराग जैन को शिकायत सौंपते हुए कहा है कि कई अभयारण्य तीन से चार दशक पहले संरक्षित घोषित हो चुके हैं, लेकिन आज तक उनका अंतिम नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ।
