प्रदेश के 16 जिले सूखे या कम वर्षा की चपेट में आने की आशंका

  • पहले पेयजल, फिर सिंचाई, सबसे आखिर में बिजली उत्पादन
  • गौरव चौहान
जिले सूखे

प्रदेश में इस वर्ष कमजोर मानसून की आशंका ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। भारतीय मौसम विभाग द्वारा अल नीनो प्रभाव के चलते सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताए जाने के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने बड़े बांधों के जल प्रबंधन को लेकर व्यापक रणनीति तैयार कर ली है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले महीनों में प्रदेश के प्रमुख जलाशयों से पानी का उपयोग तय प्राथमिकताओं के अनुसार ही होगा। सबसे पहले पेयजल, उसके बाद सिंचाई और अंत में जलविद्युत उत्पादन को प्राथमिकता दी जाएगी।
सरकार का मानना है कि यदि मानसून कमजोर रहता है तो उपलब्ध जल संसाधनों का वैज्ञानिक और नियंत्रित उपयोग ही प्रदेश को संभावित जल संकट से बचा सकता है। इसी उद्देश्य से जल संसाधन विभाग को सभी बड़े बांधों के संचालन में तय प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन करने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार की रणनीति का केंद्र प्रदेश के प्रमुख बहुउद्देश्यीय बांध हैं। इनमें इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर, बाणसागर और गांधीसागर सहित अन्य बड़े जलाशय शामिल हैं। इन बांधों से पानी छोडऩे या रोकने का निर्णय अब किसी तत्कालीन दबाव या मांग के आधार पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक मानकों और पूर्व निर्धारित जल प्रबंधन योजना के अनुसार लिया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार जलाशयों में उपलब्ध पानी का उपयोग इस तरह किया जाएगा कि वर्षभर पेयजल उपलब्ध रहे और खेती के लिए भी आवश्यक मात्रा में पानी सुरक्षित रखा जा सके।
पेयजल रहेगा सर्वोच्च प्राथमिकता
सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी परिस्थिति में शहरों, कस्बों और गांवों की पेयजल आपूर्ति प्रभावित नहीं होने दी जाएगी। जलाशयों में उपलब्ध पानी का सबसे बड़ा हिस्सा पेयजल के लिए सुरक्षित रखा जाएगा। इसके बाद सिंचाई परियोजनाओं के माध्यम से किसानों को फसलों के लिए पानी उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि खरीफ और रबी दोनों मौसम में उत्पादन प्रभावित न हो। जलविद्युत परियोजनाओं के लिए पानी का उपयोग तभी किया जाएगा, जब पेयजल और सिंचाई की आवश्यकताएं पूरी हो जाएंगी।
रूल कर्व का होगा सख्ती से पालन
सरकार ने सभी बड़े बांधों में रूल कर्व लागू करने के निर्देश दिए हैं। रूल कर्व एक वैज्ञानिक प्रणाली है, जिसके तहत पूरे वर्ष के दौरान प्रत्येक महीने बांध में कितना पानी रखा जाएगा और कितना छोड़ा जाएगा, इसका पूर्व निर्धारित मानक तय रहता है। बारिश शुरू होने से पहले जलाशयों में पर्याप्त खाली स्थान रखा जाता है ताकि नई वर्षा का पानी सुरक्षित संग्रहित किया जा सके। वहीं मानसून समाप्त होने के बाद इतना पानी संरक्षित रखा जाता है जिससे गर्मियों तक पेयजल और सिंचाई की जरूरत पूरी होती रहे। जल संसाधन विभाग का कहना है कि यदि रूल कर्व का पालन नहीं किया गया तो अत्यधिक वर्षा की स्थिति में अचानक पानी छोडऩा पड़ सकता है, जिससे निचले क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ जाएगा। दूसरी ओर आवश्यकता से पहले अधिक पानी छोडऩे पर गर्मियों में जल संकट उत्पन्न हो सकता है।
जल प्रबंधन से मिलेंगे कई बड़े लाभ
सरकार का मानना है कि नई व्यवस्था लागू होने से जल उपयोग अधिक व्यवस्थित होगा। इससे गर्मियों में पेयजल संकट की संभावना कम होगी और किसानों को सिंचाई के लिए बेहतर योजना के तहत पानी मिल सकेगा। इसके अलावा अचानक बड़े पैमाने पर पानी छोडऩे की घटनाओं में कमी आएगी, जिससे बाढ़ का जोखिम घटेगा। यदि वर्षा सामान्य से कम भी रहती है तो उपलब्ध पानी का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।
अभी नहीं बढ़ा जलस्तर
प्रदेश में अब तक अपेक्षित वर्षा नहीं होने के कारण अधिकांश बड़े बांधों का जलस्तर अधिकतम क्षमता से काफी नीचे बना हुआ है। हालांकि पिछले वर्ष अच्छी बारिश होने के कारण जलाशयों में अभी भी पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध है। जल संसाधन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि लगातार अच्छी बारिश होने के बाद ही जलाशयों के जलस्तर में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन कमजोर मानसून की आशंका को देखते हुए सतर्कता बरती जा रही है।
16 जिले सबसे अधिक संवेदनशील
कम वर्षा और संभावित सूखे के खतरे को देखते हुए प्रदेश के 16 जिलों को अति संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। इनमें बड़वानी, अलीराजपुर, दमोह, अनूपपुर, भिंड, ग्वालियर, नीमच, उज्जैन, अशोकनगर, सागर, रायसेन, नरसिंहपुर, नर्मदापुरम, मंडला, डिंडोरी और खरगोन शामिल हैं। इन जिलों के लिए विशेष आकस्मिक योजना तैयार की गई है, जिसके तहत पेयजल, सिंचाई, पशुपालन और कृषि गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जाएगी। आवश्यकता पडऩे पर वैकल्पिक जल व्यवस्था और राहत उपाय तत्काल लागू किए जाएंगे।
अल नीनो ने बढ़ाई चुनौती
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार अल नीनो प्रभाव के कारण इस वर्ष मानसून की सक्रियता प्रभावित हो सकती है। इसका असर विशेष रूप से मध्य भारत के राज्यों पर पडऩे की संभावना है। इसी कारण राज्य सरकार पहले से ही जल संरक्षण और जल प्रबंधन को लेकर एहतियाती कदम उठा रही है, ताकि संभावित संकट की स्थिति में जनता और किसानों को कम से कम परेशानी का सामना करना पड़े।

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