खनिज संपदा बनेगी विकास का इंजन

खनिज संपदा
  • मप्र को आर्थिक रूप से संपन्न बनाने का प्लान

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मप्र को आर्थिक रूप से संपन्न बनाने के मिशन पर काम कर रहे हैं। इसके लिए प्रदेश की खनिज संपदा को माध्यम बनाया गया है। इस कारण आज मप्र में खनिज क्षेत्र अब केवल राजस्व का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह औद्योगिक निवेश, आधारभूत संरचना विकास, ऊर्जा सुरक्षा और रोजगार सृजन का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की नीतियों के कारण आज खनिज संपदा से आर्थिक मजबूती की नई इबारत लिखी जा रही है।

विनोद कुमार उपाध्याय/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)।
मप्र आज जिस प्रकार खनिज संपदा के सुनियोजित उपयोग की दिशा में आगे बढ़ रहा है, उससे स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र राज्य की अर्थव्यवस्था का प्रमुख इंजन बनने वाला है। रिकॉर्ड राजस्व, देश में सर्वाधिक खनिज नीलामी, बंद खदानों का पुनर्जीवन, पेट्रोलियम और गैस की खोज तथा नए खनिज भंडारों की पहचान प्रदेश को नई आर्थिक ऊंचाइयों तक ले जा सकती है। हालांकि इसके साथ पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय समुदायों के हितों की सुरक्षा और सतत विकास के सिद्धांतों का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। यदि खनिज संपदा का दोहन संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है, तो मप्र न केवल खनिज उत्पादन में बल्कि समग्र आर्थिक विकास में भी देश के अग्रणी राज्यों में अपनी पहचान और मजबूत कर सकता है। रत्नगर्भा मप्र की धरती में छिपे ये संसाधन अब केवल भूगर्भीय संपदा नहीं, बल्कि भविष्य की समृद्धि, निवेश, रोजगार और विकास की नई कहानी लिखने की क्षमता रखते हैं। रत्नगर्भा मप्र की धरती में छिपे संसाधन अब धीरे-धीरे बाहर आ रहे हैं और इनके साथ ही प्रदेश के विकास की नई कहानी भी लिखी जा रही है। बंद खदानों के पुनर्जीवन, नई खोजों, पेट्रोलियम संभावनाओं और रिकॉर्ड नीलामी ने संकेत दे दिए हैं कि आने वाले वर्षों में राज्य की आर्थिक वृद्धि में खनिज क्षेत्र की भूमिका और मजबूत होगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मप्र अपनी खनिज संपदा को आर्थिक विकास के प्रभावी साधन में बदलने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। तांबा, मैंगनीज, हीरा, चूना पत्थर, कोयला और नव-खोजे गए सोने के भंडार प्रदेश की आर्थिक शक्ति को नई मजबूती प्रदान कर रहे हैं। पारदर्शी नीतियां, ई-नीलामी व्यवस्था, निवेश प्रोत्साहन, औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन जैसे कदमों ने खनिज क्षेत्र को प्रदेश की प्रगति का इंजन बना दिया है। यही कारण है कि आज मप्र न केवल प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध राज्य है, बल्कि उन संसाधनों को विकास और समृद्धि में बदलने वाला एक सफल मॉडल भी बनकर उभर रहा है।
मप्र को प्रकृति ने खनिज संपदा का अनमोल खजाना दिया है। विंध्य और सतपुड़ा की पर्वत श्रृंखलाओं से लेकर बुंदेलखंड और महाकौशल क्षेत्र तक फैली धरती के गर्भ में छिपे खनिज संसाधन आज प्रदेश की आर्थिक प्रगति के मजबूत आधार बनते जा रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा अपनाई गई पारदर्शी, निवेशक-अनुकूल और विकासोन्मुखी नीतियों का परिणाम है कि मप्र देश के प्रमुख मिनरल स्टेट के रूप में अपनी पहचान और मजबूत कर रहा है। प्रदेश की खनिज संपदा केवल प्राकृतिक संसाधनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन, राजस्व वृद्धि और क्षेत्रीय संतुलित विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है। तांबा, मैंगनीज, चूना पत्थर, कोयला, रॉक फास्फेट, हीरा और हाल ही में मिले सोने के विशाल भंडार मप्र की आर्थिक शक्ति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की क्षमता रखते हैं। मप्र देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल है जहां खनिज संसाधनों की विविधता और प्रचुरता दोनों मौजूद हैं। राज्य तांबा, मैंगनीज और हीरा उत्पादन में देश में अग्रणी स्थान रखता है। इसके अलावा चूना पत्थर, कोयला और रॉक फास्फेट के विशाल भंडार भी यहां उपलब्ध हैं। बालाघाट जिले की मलाजखंड कॉपर खदान देश की सबसे बड़ी तांबा खदानों में से एक मानी जाती है। यह खदान न केवल देश की तांबा आवश्यकता को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, बल्कि हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी उपलब्ध कराती है। इसी प्रकार मैंगनीज के उत्पादन में भी मप्र अग्रणी राज्यों में शामिल है, जो इस्पात उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण खनिज है। राज्य हीरा उत्पादन के लिए भी विशेष पहचान रखता है। पन्ना जिले की हीरा खदानें देश और दुनिया में प्रसिद्ध हैं। यहां से निकले अनेक हीरे अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचे हैं और प्रदेश की पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया है।

सोने और हीरे के नए भंडार बढ़ाएंगे आर्थिक शक्ति
खनिज क्षेत्र में हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में जबलपुर और कटनी क्षेत्रों में सोने के विशाल भंडारों की खोज को माना जा रहा है। प्रारंभिक सर्वेक्षणों और वैज्ञानिक अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि इन क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में स्वर्ण भंडार मौजूद हैं। यदि इनका व्यावसायिक दोहन प्रारंभ होता है तो यह प्रदेश की अर्थव्यवस्था में अरबों रुपये का योगदान कर सकता है। इसी प्रकार पन्ना और छतरपुर क्षेत्र में प्रमाणित हीरा भंडारों ने भी नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। सरकार इन क्षेत्रों में वैज्ञानिक खनन और निवेश आकर्षित करने के लिए विशेष प्रयास कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में हीरा और सोना उत्पादन प्रदेश की आर्थिक संरचना को और अधिक मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने खनिज क्षेत्र को प्रदेश की आर्थिक प्रगति का प्रमुख आधार बनाने के उद्देश्य से अनेक महत्वपूर्ण पहल की हैं। उनकी सरकार ने खनन क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाने, निवेशकों को प्रोत्साहित करने और राजस्व संग्रह को मजबूत करने के लिए कई सुधार लागू किए हैं। खनिज ब्लॉकों की ई-नीलामी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक बनाया गया है। इससे न केवल सरकार को बेहतर राजस्व प्राप्त हो रहा है, बल्कि निवेशकों का विश्वास भी बढ़ा है। नई खनन नीतियों में प्रक्रियाओं को सरल बनाकर उद्योगों को प्रोत्साहन देने का प्रयास किया गया है। मुख्यमंत्री का स्पष्ट मानना है कि प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय विकास को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। इसी कारण खनन गतिविधियों के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास कार्यक्रमों पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। मप्र देश के सबसे बड़े चूना पत्थर उत्पादक राज्यों में शामिल है। चूना पत्थर सीमेंट उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है और इसकी प्रचुर उपलब्धता ने प्रदेश को सीमेंट उत्पादन का बड़ा केंद्र बना दिया है। राज्य के विभिन्न जिलों में स्थापित सीमेंट संयंत्र हजारों लोगों को रोजगार प्रदान कर रहे हैं। साथ ही इन उद्योगों के कारण परिवहन, लॉजिस्टिक्स, निर्माण और सेवा क्षेत्रों में भी व्यापक आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं। प्रदेश में सीमेंट उद्योग के विस्तार से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में भी आर्थिक विकास की नई संभावनाएं पैदा हुई हैं। अनेक क्षेत्रों में सडक़, बिजली और अन्य आधारभूत सुविधाओं का विकास हुआ है, जिससे स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया है। लौह अयस्क और मैंगनीज जैसे खनिजों की उपलब्धता ने प्रदेश में स्टील उद्योग के विकास को भी गति दी है। स्टील उत्पादन देश की औद्योगिक प्रगति का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है और मप्र इस क्षेत्र में तेजी से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। खनिज संसाधनों की उपलब्धता के कारण राज्य में नए औद्योगिक निवेश आकर्षित हो रहे हैं। इससे उत्पादन क्षमता बढ़ रही है और रोजगार के अवसरों का विस्तार हो रहा है। औद्योगिक गलियारों और लॉजिस्टिक सुविधाओं के विकास ने भी इस प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाया है। खनिज क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के लिए राज्य सरकार ने ई-नीलामी प्रणाली को प्रभावी ढंग से लागू किया है। पहले जहां खनिज पट्टों के आवंटन में विभिन्न प्रकार की चुनौतियां सामने आती थीं, वहीं अब ऑनलाइन और प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया के कारण अधिकतम राजस्व प्राप्त हो रहा है। खनिज ब्लॉकों की नीलामी में देश और विदेश की बड़ी कंपनियां भाग ले रही हैं। इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और सरकार को बेहतर वित्तीय लाभ मिला है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में खनिज क्षेत्र से प्राप्त राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। राजस्व में हुई यह बढ़ोतरी राज्य सरकार को शिक्षा, स्वास्थ्य, सडक़, सिंचाई और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर अधिक निवेश करने की क्षमता प्रदान कर रही है।

निवेशकों की पहली पसंद बन रहा मप्र
खनिज संसाधनों की उपलब्धता और सरकार की सकारात्मक नीतियों के कारण मप्र निवेशकों की पहली पसंद बनता जा रहा है। विभिन्न निवेश सम्मेलनों और उद्योग आयोजनों में प्रदेश को हजारों करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। राज्य सरकार ने निवेशकों को बेहतर आधारभूत सुविधाएं, त्वरित अनुमतियां और अनुकूल औद्योगिक वातावरण उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसके परिणामस्वरूप देश की अनेक बड़ी कंपनियां खनन और खनिज आधारित उद्योगों में निवेश के लिए आगे आ रही हैं। निवेश बढऩे से न केवल औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि हो रही है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो रहे हैं। इससे युवाओं को अपने ही क्षेत्र में रोजगार मिलने की संभावना बढ़ी है। खनिज क्षेत्र प्रदेश में रोजगार सृजन का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। खदानों में प्रत्यक्ष रोजगार के अलावा परिवहन, मशीनरी, सुरक्षा, निर्माण, होटल, व्यापार और अन्य सेवा क्षेत्रों में भी लाखों लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार खनन आधारित उद्योगों के विस्तार से आने वाले वर्षों में रोजगार के अवसरों में और अधिक वृद्धि होगी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाले पलायन को रोकने में भी मदद मिलेगी। स्थानीय युवाओं को कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से प्रशिक्षित कर खनन और औद्योगिक गतिविधियों में भागीदारी के लिए तैयार किया जा रहा है। इससे रोजगार की गुणवत्ता और आय स्तर दोनों में सुधार हो रहा है। खनिज संपदा का लाभ केवल उद्योगों और सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे क्षेत्रीय विकास को भी नई गति मिली है। जिन क्षेत्रों में खनन गतिविधियां संचालित हो रही हैं वहां सडक़, बिजली, पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हुआ है। जिला खनिज प्रतिष्ठान (डीएमएफ) के माध्यम से खनन प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और आधारभूत संरचना विकास के लिए विशेष परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं। इससे स्थानीय समुदायों को प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है। सरकार का प्रयास है कि खनिज संपदा से प्राप्त राजस्व का उपयोग स्थानीय विकास और जनकल्याण के लिए अधिकतम किया जाए।

भविष्य की अपार संभावनाएं
मप्र की खनिज संपदा अभी पूरी तरह से खोजी और उपयोग में नहीं लाई गई है। भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों से लगातार नए खनिज भंडारों की जानकारी सामने आ रही है। सोना, हीरा, दुर्लभ खनिज और अन्य संसाधनों की खोज से भविष्य में प्रदेश की आर्थिक क्षमता और बढऩे की संभावना है। राज्य सरकार आधुनिक तकनीकों, वैज्ञानिक खनन और सतत विकास के सिद्धांतों को अपनाकर खनिज क्षेत्र को नई दिशा देने का प्रयास कर रही है। यदि वर्तमान गति बनी रहती है तो आने वाले वर्षों में मप्र देश की खनिज अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत केंद्र बन सकता है। खनन क्षेत्र में पारदर्शिता, ई-नीलामी की आधुनिक व्यवस्था, नई खनिज नीतियां और खनिज ब्लॉकों के व्यवस्थित प्रबंधन ने प्रदेश सरकार की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की है। हालात यह हैं कि पांच वर्ष पहले जहां खनिज राजस्व पांच हजार करोड़ रुपये के आसपास था, वहीं अब यह आंकड़ा 11 हजार करोड़ रुपये को पार कर चुका है। सरकार का मानना है कि बंद पड़ी खदानों को पुनर्जीवित करने, नए खनिज क्षेत्रों की खोज और पेट्रोलियम-प्राकृतिक गैस के संभावित भंडारों के दोहन से प्रदेश की अर्थव्यवस्था को और अधिक गति मिलेगी।
मप्र प्राकृतिक संसाधनों के मामले में देश के सबसे समृद्ध राज्यों में गिना जाता है। यह भारत का एकमात्र राज्य है जहां वर्तमान में हीरे का व्यावसायिक उत्पादन होता है। पन्ना जिले की मझगवां खदान देश की एकमात्र सक्रिय हीरा खदान है। यही कारण है कि मप्र का नाम देश के खनिज मानचित्र पर विशेष महत्व रखता है। इसके अलावा मैंगनीज और तांबा अयस्क उत्पादन में भी राज्य देश में अग्रणी है। बालाघाट क्षेत्र को तांबा और मैंगनीज उत्पादन का प्रमुख केंद्र माना जाता है। प्रदेश में कोयला, चूना पत्थर, बॉक्साइट और रॉक फॉस्फेट के विशाल भंडार मौजूद हैं। सीमेंट उद्योग के लिए आवश्यक चूना पत्थर की उपलब्धता ने प्रदेश को देश के प्रमुख सीमेंट उत्पादक राज्यों में शामिल कर दिया है। हाल के वर्षों में जबलपुर और कटनी क्षेत्रों में स्वर्ण भंडारों की संभावनाओं ने भी भू-वैज्ञानिकों और निवेशकों का ध्यान आकर्षित किया है। यदि इन क्षेत्रों में व्यावसायिक स्तर पर खनन संभव हुआ तो प्रदेश की खनिज अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल सकती है।

रिकॉर्ड राजस्व ने बदली तस्वीर
खनिज संपदा का लाभ प्रदेश सरकार के राजस्व में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में सरकार ने खनिज रॉयल्टी के माध्यम से 11 हजार करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व अर्जित किया है। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पांच वर्ष पहले यह आंकड़ा लगभग आधा था। राजस्व के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2020-21 में प्रदेश को 5185 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे। इसके बाद वर्ष 2021-22 में 7122 करोड़, 2022-23 में 8218 करोड़, 2023-24 में 10065 करोड़ और 2024-25 में 10290 करोड़ रुपये का राजस्व मिला। अब 2025-26 में यह आंकड़ा 11 हजार करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। खनिज विभाग के अधिकारियों का कहना है कि राजस्व वृद्धि का सबसे बड़ा कारण पारदर्शी ई-नीलामी व्यवस्था और खनन क्षेत्र में किए गए प्रशासनिक सुधार हैं। खनिज ब्लॉकों की समयबद्ध नीलामी, डिजिटल निगरानी और अवैध खनन पर नियंत्रण ने राजस्व संग्रहण में उल्लेखनीय सुधार किया है।
मप्र खनिज ब्लॉकों की नीलामी में भी देश का अग्रणी राज्य बन चुका है। वर्ष 2025 में देशभर में कुल 141 खनिज ब्लॉकों की नीलामी हुई, जिनमें से 32 ब्लॉक अकेले मप्र में नीलाम किए गए। यह किसी भी राज्य द्वारा की गई सर्वाधिक नीलामी है। इन नीलामियों से राज्य को भविष्य में लगभग 1.68 लाख करोड़ रुपये से अधिक राजस्व प्राप्त होने की संभावना जताई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि खनिज नीलामी की यह प्रक्रिया न केवल सरकार की आय बढ़ाएगी, बल्कि खनिज आधारित उद्योगों के लिए कच्चे माल की उपलब्धता भी सुनिश्चित करेगी।

बंद पड़ी खदानों को फिर मिलेगी जिंदगी
प्रदेश सरकार अब उन खदानों पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है जो विभिन्न कारणों से वर्षों से बंद पड़ी हैं। सरकार का मानना है कि इन खदानों में अब भी पर्याप्त खनिज भंडार मौजूद हो सकते हैं, जिनका दोहन कर राजस्व और रोजगार दोनों बढ़ाए जा सकते हैं। मप्र स्टेट माइनिंग डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने छह जिलों में स्थित सात बंद खनिज ब्लॉकों को चिन्हित किया है, जहां दोबारा खनन शुरू करने की तैयारी चल रही है। इनमें बॉक्साइट, मैंगनीज और चूना पत्थर की खदानें शामिल हैं। इन ब्लॉकों में सबसे पहले वैज्ञानिक तरीके से सर्वेक्षण और ड्रिलिंग कराई जाएगी। इसके बाद खनिज भंडार का आकलन किया जाएगा और फिर इन खदानों को नीलामी के माध्यम से निजी निवेशकों को उपलब्ध कराया जाएगा। कॉरपोरेशन द्वारा चिन्हित सात खनिज ब्लॉकों में कुल 20 बोरहोल्स किए जाएंगे तथा लगभग 660 मीटर तक ड्रिलिंग की जाएगी। ड्रिलिंग के दौरान 462 नमूने एकत्रित कर प्रयोगशालाओं में भेजे जाएंगे, जहां उनकी गुणवत्ता और मात्रा का परीक्षण होगा। जिन खदानों को सर्वेक्षण के लिए चुना गया है उनमें रीवा जिले की गायत्री मिनरल्स बॉक्साइट खदान, सतना की डीके जैन बॉक्साइट खदान, कटनी की केसी बगाडिया लाइमस्टोन खदान, बालाघाट की सीतापथोर मैंगनीज खदान, दमोह की पीएस हजारी लाइमस्टोन खदान तथा नीमच जिले की सीसीआईएल-1 और सीसीआईएल-2 लाइमस्टोन खदानें शामिल हैं। अधिकारियों के अनुसार ऐसे अन्य ब्लॉकों की भी पहचान की जा रही है जहां खनन पट्टे समाप्त हो चुके हैं या लंबे समय से उत्पादन बंद है।
खनिज उत्पादन बढऩे का सीधा लाभ उद्योगों को मिलेगा। चूना पत्थर की उपलब्धता से सीमेंट उद्योग को मजबूती मिलेगी, जबकि बॉक्साइट और लौह अयस्क जैसे खनिज धातु आधारित उद्योगों के विस्तार में सहायक होंगे। खनन गतिविधियों के विस्तार से परिवहन, मशीनरी, निर्माण, सुरक्षा और सेवा क्षेत्र में भी रोजगार के अवसर पैदा होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि खनन क्षेत्र में होने वाला प्रत्येक बड़ा निवेश स्थानीय अर्थव्यवस्था को कई स्तरों पर प्रभावित करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में सडक़, बिजली और संचार जैसी आधारभूत सुविधाओं का विकास भी खनन परियोजनाओं के साथ जुड़ा होता है। इस कारण दूरस्थ क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियां बढऩे लगती हैं। सरकार राजस्व बढ़ाने के साथ-साथ अवैध खनन पर भी सख्त कार्रवाई कर रही है। बैतूल जिले के ग्राम अंबाड़ा में हाल ही में खनिज, राजस्व और पुलिस विभाग की संयुक्त टीम ने बड़ी कार्रवाई की। निरीक्षण के दौरान निजी भूमि पर बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन और परिवहन का मामला सामने आया। प्रशासन ने एक क्रशर संचालक पर दो करोड़ 12 लाख 31 हजार रुपये का जुर्माना प्रस्तावित किया, जबकि दूसरे संचालक के खिलाफ अलग से कार्रवाई की तैयारी की गई। टीम ने अवैध परिवहन में उपयोग किए जा रहे एक डंपर को भी जब्त किया। अधिकारियों का कहना है कि ऐसी कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी ताकि सरकार को राजस्व हानि न हो और वैध खनन को बढ़ावा मिल सके।

प्राकृतिक गैस की खोज से नई उम्मीद
खनिजों के अलावा मप्र की धरती में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के भंडार होने की भी प्रबल संभावना है। केन्द्र सरकार और हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय की रिपोर्टों के अनुसार राज्य के कई हिस्सों में हाइड्रोकार्बन संसाधन मौजूद हो सकते हैं। विंध्य क्षेत्र, सतपुड़ा क्षेत्र, साउथ रीवा बेसिन, दमोह और नर्मदा घाटी को पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस की खोज के लिए संभावित क्षेत्र माना गया है। वर्ष 2017 की हाइड्रोकार्बन रिसोर्स असेसमेंट स्टडी में मप्र में 5 लाख 55 हजार 254 मिलियन टन हाइड्रोकार्बन संसाधन होने की संभावना व्यक्त की गई थी। इसी आधार पर राज्य में आठ नए ब्लॉकों में अन्वेषण की तैयारी की जा रही है। इन ब्लॉकों का कुल क्षेत्रफल 17 हजार 628 वर्ग किलोमीटर से अधिक है। मप्र के शहडोल जिले में कोल बेड मीथेन (सीबीएम) परियोजना पहले से संचालित है। यहां रिलायंस समूह की इकाई द्वारा लगभग 300 गैस कुओं का संचालन किया जा रहा है। सुहागपुर क्षेत्र से गैस उत्पादन के साथ उत्तर प्रदेश के फूलपुर तक 302 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन भी संचालित है। वर्तमान में यहां प्रतिदिन लगभग 0.64 एमएससीएमडी गैस उत्पादन हो रहा है। भविष्य में उत्पादन बढ़ाने के लिए हजारों करोड़ रुपये के अतिरिक्त निवेश की संभावना जताई गई है। शहडोल और उमरिया जिलों में तेल एवं गैस की खोज के लिए ओएनजीसी को लाइसेंस दिए जा चुके हैं। वहीं बैतूल, छिंदवाड़ा और नर्मदापुरम क्षेत्रों में भी निजी कंपनियों को अन्वेषण की अनुमति दी गई है। अगले दो दशकों में इन परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये के निवेश की संभावना है। यदि इन क्षेत्रों में वाणिज्यिक स्तर पर तेल या गैस भंडार मिलते हैं तो मप्र देश के ऊर्जा मानचित्र पर भी महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सकता है। छतरपुर जिले का बक्सवाहा क्षेत्र पहले ही अपने उच्च गुणवत्ता वाले हीरा भंडारों के कारण चर्चा में रहा है। अब इसी क्षेत्र में रॉक फॉस्फेट के विशाल भंडार मिलने से इसकी रणनीतिक महत्ता और बढ़ गई है। भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षणों में सूरजपुरा, पल्दा, सगौरिया और गरदौनियां क्षेत्र में लगभग 1070 हेक्टेयर में फैले विशाल फॉस्फोराइट भंडारों की पहचान की गई है। अब तक 57 लाख मीट्रिक टन रॉक फॉस्फेट भंडार मिलने की पुष्टि हो चुकी है। फॉस्फोराइट उर्वरक उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण खनिज है। डीएपी खाद सहित कई प्रकार के उर्वरकों के निर्माण में इसका उपयोग किया जाता है। भारत लंबे समय से फॉस्फेट आधारित कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर रहा है। ऐसे में यह खोज रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रॉक फॉस्फेट का स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ता है तो उर्वरक उद्योग को सस्ता कच्चा माल उपलब्ध होगा। इसका लाभ अंतत: किसानों तक पहुंच सकता है। कृषि क्षेत्र के अलावा फॉस्फोराइट का उपयोग पशु आहार, डिटर्जेंट, रसायन, प्लास्टिक, सिरेमिक और अन्य औद्योगिक उत्पादों में भी किया जाता है। इसलिए इसके खनन से अनेक प्रकार के उद्योग विकसित हो सकते हैं। बक्सवाहा क्षेत्र में हीरा और फॉस्फेट दोनों खनिजों की उपलब्धता बुंदेलखंड क्षेत्र के आर्थिक विकास की नई धुरी बन सकती है। यह क्षेत्र लंबे समय से जल संकट और सीमित औद्योगिक अवसरों के कारण पिछड़ा माना जाता रहा है। खनिज आधारित उद्योगों की स्थापना से स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा, सडक़ और अन्य आधारभूत सुविधाओं का विकास होगा तथा क्षेत्र में निवेश आकर्षित होगा। इससे पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को नया आधार मिल सकता है।

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