
- मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार का नवाचार
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार के नवाचार के कारण मप्र के मंदिर क्षेत्रों में विकसित हो रहे ‘लोक’ आस्था और पर्यटन के नए आकर्षण बन गए हैं। इस कारण मप्र धार्मिक पर्यटन का केंद्र बन गया है।
गौरव चौहान/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)। कभी देश के मानचित्र पर केवल ऐतिहासिक और प्राकृतिक पर्यटन के लिए पहचाना जाने वाला मप्र आज तेजी से धार्मिक पर्यटन की नई राजधानी के रूप में उभर रहा है। भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन से लेकर मां शारदा की तपोभूमि मैहर, भगवान श्रीराम से जुड़ी चित्रकूट की धरती, ओंकारेश्वर के ज्योतिर्लिंग और सांची से अमरकंटक तक प्रदेश का धार्मिक परिदृश्य बदल रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार ने धार्मिक पर्यटन को केवल आस्था तक सीमित न रखते हुए इसे आर्थिक विकास, सांस्कृतिक संरक्षण और रोजगार सृजन से जोडऩे का व्यापक अभियान शुरू किया है। प्रदेश सरकार का सबसे बड़ा नवाचार मंदिरों और धार्मिक स्थलों के आसपास विकसित किए जा रहे ‘लोक’ हैं। इन लोकों में केवल धार्मिक संरचनाएं ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत, स्थानीय कला, लोक परंपराएं, आधुनिक सुविधाएं और पर्यटकों के लिए आकर्षक अनुभवों का समावेश किया जा रहा है। यही कारण है कि मप्र में धार्मिक पर्यटन की तस्वीर तेजी से बदल रही है और देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है।
मप्र में धार्मिक पर्यटन का वर्तमान दौर केवल मंदिरों के सौंदर्यीकरण का अभियान नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण, आर्थिक विकास और आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण का व्यापक प्रयास है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार ने धार्मिक स्थलों को आधुनिक सुविधाओं, सांस्कृतिक प्रस्तुति और पर्यटन अवसंरचना से जोडक़र एक नई दिशा देने का प्रयास किया है। महाकाल लोक की सफलता ने जिस मॉडल की शुरुआत की, वह अब प्रदेश के विभिन्न तीर्थ क्षेत्रों तक पहुंच रहा है। मंदिरों के आसपास विकसित हो रहे लोक श्रद्धालुओं को केवल दर्शन का अवसर नहीं दे रहे, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति, इतिहास और अध्यात्म की गहराई से परिचित करा रहे हैं। यदि वर्तमान गति से योजनाएं आगे बढ़ती रहीं, तो आने वाले वर्षों में मप्र न केवल देश का प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र बनेगा, बल्कि विश्व स्तर पर भी अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करने में सफल होगा। धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक गौरव और आधुनिक विकास का यह संगम ही मप्र को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का आधार बन रहा है। मप्र केवल हिंदू धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं है। राज्य सरकार बौद्ध, जैन और अन्य धार्मिक स्थलों के विकास पर भी समान रूप से ध्यान दे रही है। सांची, सतधारा, सोनारी और अन्य बौद्ध स्थलों के विकास के लिए विशेष योजनाएं संचालित की जा रही हैं। बौद्ध देशों से आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार भी किया जा रहा है। इससे धार्मिक पर्यटन का दायरा और व्यापक हुआ है।
महाकाल लोक ने दिखाई नई दिशा
मप्र में धार्मिक पर्यटन की नई कहानी की शुरुआत उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर में विकसित महाकाल लोक से मानी जाती है। महाकाल लोक बनने के बाद उज्जैन केवल एक तीर्थस्थल नहीं रहा, बल्कि एक वैश्विक धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित हुआ है। भव्य प्रवेश द्वार, विशाल प्रतिमाएं, शिवपुराण आधारित कलाकृतियां, आधुनिक प्रकाश व्यवस्था और सांस्कृतिक प्रस्तुति ने महाकाल लोक को देश के सबसे चर्चित धार्मिक पर्यटन स्थलों में शामिल कर दिया। इसका प्रभाव यह हुआ कि उज्जैन आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई। महाकाल लोक की सफलता ने यह साबित किया कि यदि धार्मिक स्थलों का विकास आधुनिक दृष्टिकोण से किया जाए तो वे न केवल आस्था के केंद्र बन सकते हैं बल्कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी नई गति दे सकते हैं। महाकाल लोक की सफलता के बाद राज्य सरकार ने विभिन्न धार्मिक स्थलों पर इसी अवधारणा को विस्तार देने का निर्णय लिया। इसके तहत कई मंदिर क्षेत्रों और तीर्थस्थलों के आसपास नए लोक विकसित किए जा रहे हैं। सरकार का उद्देश्य केवल मंदिरों का सौंदर्यीकरण करना नहीं है, बल्कि पूरे धार्मिक क्षेत्र को एक समग्र अनुभव के रूप में विकसित करना है। इनमें धार्मिक कथाओं पर आधारित शिल्प, सांस्कृतिक केंद्र, दर्शनीय मार्ग, आध्यात्मिक उद्यान, डिजिटल प्रदर्शनियां और स्थानीय संस्कृति की झलक देने वाले केंद्र विकसित किए जा रहे हैं। इन लोकों के माध्यम से श्रद्धालुओं को केवल दर्शन ही नहीं, बल्कि उस धार्मिक स्थल से जुड़ी पूरी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक यात्रा का अनुभव कराया जा रहा है।
नर्मदा नदी के बीच स्थित ओंकारेश्वर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है। यहां सरकार ने धार्मिक पर्यटन को नई ऊंचाई देने के लिए अनेक परियोजनाएं शुरू की हैं। विशेष रूप से आदि शंकराचार्य की 108 फीट ऊंची प्रतिमा ‘एकात्म धाम’ और उससे जुड़ा आध्यात्मिक परिसर विश्वभर के श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहा है। यहां वेदांत दर्शन, भारतीय ज्ञान परंपरा और सनातन संस्कृति को आधुनिक तकनीक के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा है। सरकार की योजना है कि ओंकारेश्वर को केवल ज्योतिर्लिंग तीर्थ के रूप में नहीं बल्कि भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक अध्ययन के अंतरराष्ट्रीय केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। भगवान श्रीराम के वनवास से जुड़ा चित्रकूट धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। मप्र सरकार चित्रकूट को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर प्रमुख स्थान दिलाने के लिए विशेष योजनाओं पर काम कर रही है। रामायण काल से जुड़े स्थलों का विकास, नदी तटों का सौंदर्यीकरण, धार्मिक मार्गों का निर्माण और श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। सरकार चित्रकूट को रामायण सर्किट का महत्वपूर्ण केंद्र बनाने की दिशा में काम कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चित्रकूट का समग्र विकास होता है तो यह अयोध्या के बाद रामभक्तों का सबसे बड़ा आकर्षण बन सकता है। विंध्य क्षेत्र स्थित मां शारदा देवी का प्रसिद्ध मंदिर हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। राज्य सरकार यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं का विस्तार कर रही है। रोपवे व्यवस्था का आधुनिकीकरण, सडक़ संपर्क, पार्किंग, आवासीय सुविधाएं और मंदिर क्षेत्र का सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। भविष्य में यहां सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की भी योजना है। सरकार चाहती है कि मैहर केवल नवरात्रि का केंद्र न रहे बल्कि पूरे वर्ष धार्मिक पर्यटन का प्रमुख गंतव्य बने। नर्मदा, सोन और जोहिला नदियों की उद्गम स्थली अमरकंटक को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है। यहां धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ प्रकृति और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम देखने को मिलता है। सरकार अमरकंटक में तीर्थ यात्रियों के लिए सुविधाएं बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता दे रही है। घाटों का विकास, धार्मिक स्थलों का संरक्षण और पर्यटक सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। अमरकंटक को ‘स्पिरिचुअल इको-टूरिज्म’ मॉडल के रूप में विकसित करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
नई पहचान की ओर बढ़ता मप्र
धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में मप्र ने जिस प्रकार हिंदू आस्था केंद्रों के विकास के साथ-साथ बौद्ध धरोहरों को भी महत्व दिया है, वह उसकी समावेशी पर्यटन नीति को दर्शाता है। सांची से लेकर सतधारा और सोनारी तक बौद्ध स्थलों के विकास के प्रयास प्रदेश को अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर और अधिक मजबूत स्थिति प्रदान कर रहे हैं। आने वाले वर्षों में यदि इन योजनाओं को गति मिलती है तो मप्र न केवल देश का प्रमुख धार्मिक पर्यटन राज्य बनेगा, बल्कि विश्व बौद्ध समुदाय के लिए भी एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गंतव्य के रूप में अपनी पहचान को और मजबूत करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि बौद्ध पर्यटन केवल धार्मिक पर्यटन नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक कूटनीति का भी एक प्रभावी माध्यम है। बौद्ध देशों के साथ भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने में ऐसे स्थलों की महत्वपूर्ण भूमिका है। मप्र के बौद्ध स्थल भारत की उस विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसने शांति, करुणा और मानवता का संदेश पूरी दुनिया को दिया। यही कारण है कि इन स्थलों का विकास केवल पर्यटन परियोजना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद और वैश्विक संपर्क का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। डिजिटल गाइड, मल्टीमीडिया प्रस्तुति, स्वच्छता व्यवस्था, विश्राम स्थल, पार्किंग और बेहतर मार्गदर्शन प्रणाली जैसी सुविधाओं को विकसित किया जा रहा है, ताकि पर्यटकों का अनुभव अधिक समृद्ध और सुविधाजनक बन सके। मप्र अपनी समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए देश-दुनिया में जाना जाता है। जहां एक ओर उज्जैन, ओंकारेश्वर, चित्रकूट और अमरकंटक जैसे हिंदू आस्था केंद्र लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं, वहीं दूसरी ओर बौद्ध धर्म से जुड़े अनेक ऐतिहासिक स्थल भी प्रदेश को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार धार्मिक पर्यटन के विकास को समग्र दृष्टिकोण से आगे बढ़ा रही है। इसी रणनीति के तहत बौद्ध पर्यटन को भी विशेष प्राथमिकता दी जा रही है। मप्र में स्थित सांची, सतधारा, सोनारी, अंधेर और अन्य बौद्ध धरोहरें न केवल भारत की सांस्कृतिक संपदा का हिस्सा हैं, बल्कि विश्व बौद्ध समुदाय के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। सरकार इन स्थलों को बेहतर सुविधाओं, आधुनिक पर्यटन अधोसंरचना और अंतरराष्ट्रीय प्रचार-प्रसार के माध्यम से वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर और अधिक प्रभावी ढंग से स्थापित करने का प्रयास कर रही है। बौद्ध पर्यटन की चर्चा सांची के बिना अधूरी है। रायसेन जिले में स्थित सांची का महान स्तूप भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में बौद्ध स्थापत्य कला और आध्यात्मिक विरासत का अद्वितीय उदाहरण माना जाता है। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित यह स्थल आज भी बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए आस्था और प्रेरणा का केंद्र है। सांची को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है। यहां देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक और शोधार्थी पहुंचते हैं। राज्य सरकार सांची में पर्यटन सुविधाओं को और बेहतर बनाने, व्याख्या केंद्रों को आधुनिक स्वरूप देने तथा पर्यटकों के लिए डिजिटल सूचना तंत्र विकसित करने पर काम कर रही है। इसके साथ ही सांची को अंतरराष्ट्रीय बौद्ध पर्यटन सर्किट का प्रमुख केंद्र बनाने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं।
सांची के आसपास स्थित सतधारा और सोनारी भी बौद्ध इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल हैं। यहां मौजूद प्राचीन स्तूप और अवशेष बौद्ध धर्म के प्रसार की गौरवशाली कहानी बताते हैं। लंबे समय तक ये स्थल मुख्यधारा के पर्यटन से अपेक्षाकृत दूर रहे, लेकिन अब सरकार इनके विकास पर विशेष ध्यान दे रही है। इन स्थलों तक पहुंचने के लिए बेहतर सडक़ संपर्क, पर्यटक सुविधाएं, सूचना संकेतक और संरक्षण कार्यों को प्राथमिकता दी जा रही है। उद्देश्य यह है कि सांची आने वाले पर्यटक आसपास के अन्य बौद्ध स्थलों का भी भ्रमण करें और पूरे क्षेत्र को एक समग्र बौद्ध पर्यटन परिपथ के रूप में विकसित किया जा सके। बौद्ध धर्म का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं है। श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार, जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, भूटान, मंगोलिया और अन्य अनेक देशों में करोड़ों लोग बौद्ध धर्म का पालन करते हैं। ऐसे में मप्र सरकार इन देशों के पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए विशेष रणनीति पर काम कर रही है।
श्रद्धा में निवेश
मप्र सरकार धार्मिक पर्यटन और मंदिर विकास को नई ऊंचाई देने के लिए एक अनोखा वित्तीय मॉडल तैयार कर रही है। पहली बार राज्य में टेंपल बॉन्?ड्स जारी करने की योजना बनाई गई है। उज्जैन और मालवा क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों के विकास के लिए करीब 200 करोड़ रुपये बाजार से जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। यह राशि उज्जैन के मंदिरों के आधुनिकीकरण, संरक्षण और बेहतर सुविधाओं पर खर्च होगी। सिंहस्थ 2028 को ध्यान में रखकर सरकार धार्मिक इंफ्रास्ट्रक्चर को विश्व स्तर का बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। महाकाल लोक के सफल मॉडल के बाद अब पूरे उज्जैन शहर को श्रद्धालुओं के लिए और आकर्षक बनाने की तैयारी है। इस योजना से सरकारी खजाने पर बोझ कम होगा और आम निवेशक भी धार्मिक कार्य में हिस्सेदार बन सकेंगे। यह सिर्फ एक फंडिंग योजना नहीं है। बल्कि भक्ति और विकास को जोडऩे का नया प्रयास है। उज्जैन में महाकाल लोक बनने के बाद श्रद्धालुओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। सिंहस्?थ 2028 में करोड़ों श्रद्धालु आने वाले हैं। इन्हें बेहतर सुविधाएं देने के लिए सरकार ने 1100 करोड़ रुपये के व्यापक मंदिर विकास कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की है। टेंपल बॉन्ड्स के जरिए जुटाए गए 200 करोड़ रुपये इस बड़े विजन का महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे। अधिकारियों का कहना है कि इससे न सिर्फ मंदिर संरक्षित रहेंगे। बल्कि सांस्कृतिक विरासत को आधुनिकता के साथ जोड़ा जा सकेगा। यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। टेंपल बॉन्ड्स एक प्रकार के निवेश साधन होंगे। इनका ढांचा इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड्स जैसा होगा। निवेशक निश्चित अवधि के लिए पैसा लगाएंगे और तय ब्याज दर पर लाभ कमाएंगे। सरकार का उद्देश्य आम नागरिकों। धार्मिक ट्रस्टों और संस्थाओं को मंदिर विकास में भागीदार बनाना है। जुलाई के अंत तक इन बॉन्ड्स को लॉन्च करने की तैयारी चल रही है। कुल परियोजना लागत लगभग 1100 करोड़ रुपये रखी गई है। इसमें 200 करोड़ रुपये टेंपल बॉन्?ड्स से, 275 करोड़ रुपये अर्बन चैलेंज फंड से और 625 करोड़ रुपये बैंक फाइनेंसिंग से जुटाए जाएंगे। यह फंडिंग मॉडल राज्य में पहली बार लागू हो रहा है। इससे सरकारी संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होगा। योजना में उज्जैन के प्रमुख मंदिर शामिल हैं। काल भैरव मंदिर, मंगलनाथ मंदिर, सांदीपनि आश्रम, नवग्रह मंदिर, 84 महादेव मंदिर समूह, गढक़ालिका मंदिर, सिद्धवट, भुखी माता और बगलामुखी मंदिर, अंगारेश्वर महादेव मंदिर समेत आसपास के कई धार्मिक केंद्रों का विकास किया जाएगा। राशि का उपयोग पार्किंग, पेयजल व्यवस्था, तीर्थयात्री सुविधा केंद्र, सडक़ संपर्क, प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा तंत्र, भीड़ प्रबंधन और आपदा प्रबंधन पर होगा। मंदिरों की पुरातात्विक पहचान बरकरार रखते हुए आधुनिक सुविधाएं विकसित की जाएंगी। इससे श्रद्धालुओं का अनुभव बेहतर बनेगा।
धार्मिक स्थलों को बनाया जाएगा और भव्य
मप्र सरकार धार्मिक पर्यटन को नई पहचान देने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। हाल ही में वैष्णो देवी यात्रा पर गए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य के धार्मिक और पर्यटन स्थलों को लेकर कहा कि मप्र में मौजूद धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों को और अधिक आकर्षक, भव्य और व्यवस्थित बनाया जाना चाहिए ताकि देश-विदेश से अधिक से अधिक श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंच सकें। मुख्यमंत्री का मानना है कि धार्मिक पर्यटन न केवल संस्कृति और परंपराओं को मजबूत करेगा, बल्कि रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा देगा। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि राज्य के प्रमुख धार्मिक स्थलों के विकास के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार की जाए। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े स्थानों की पहचान कर उनके संरक्षण और विकास पर विशेष ध्यान दिया जाए। साथ ही, गीता जयंती पर गीता महोत्सव और मानस जयंती जैसे आयोजनों को बड़े स्तर पर मनाने की योजना भी तैयार की जाए। डॉ. यादव ने कहा कि भारतीय संस्कृति, दर्शन और आध्यात्मिक मूल्यों को आम लोगों तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। धार्मिक पर्यटन के माध्यम से इन मूल्यों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जा सकता है। बैठक में मुख्यमंत्री ने राजधानी भोपाल में भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के नाम पर भव्य प्रवेश द्वार बनाने के निर्देश दिए। इसके अलावा राजा भोज और राजा विक्रमादित्य के नाम पर भी प्रवेश द्वार विकसित करने की योजना पर काम करने को कहा गया है। राज्य की सीमाओं पर भी आकर्षक प्रवेश द्वार बनाए जाएंगे ताकि मप्र में आने वाले पर्यटकों को राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत की पहली झलक मिल सके। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ प्रदेश की सकारात्मक पहचान भी मजबूत होगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि उज्जैन, मैहर, इंदौर और चित्रकूट जैसे धार्मिक स्थलों पर पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हालांकि, राज्य में कई अन्य महत्वपूर्ण धार्मिक और पर्यटन स्थल भी हैं, जिनकी पहचान अभी व्यापक स्तर पर नहीं बन पाई है। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अधिकारियों को इन स्थलों की बेहतर ब्रांडिंग और प्रचार-प्रसार करने के निर्देश दिए। उनका मानना है कि सही प्रचार के माध्यम से छोटे और कम प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों को भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई जा सकती है। राज्य सरकार पर्यटन सुविधाओं को आधुनिक बनाने की दिशा में भी काम कर रही है। मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रदेश में सात स्थानों पर रोपवे परियोजनाएं प्रस्तावित हैं, जो धार्मिक और पर्यटन स्थलों तक पहुंच को आसान बनाएंगी। इसके अलावा आठ स्थानों पर लाइट एंड साउंड शो विकसित किए जा रहे हैं, जबकि पांच संग्रहालयों का निर्माण कार्य जारी है। पांच नए संग्रहालयों की भी योजना बनाई गई है। मुख्यमंत्री ने सभी निर्माण कार्यों में उच्च गुणवत्ता बनाए रखने पर विशेष जोर दिया। डॉ. मोहन यादव ने कहा कि संग्रहालय केवल इतिहास और संस्कृति तक सीमित नहीं रहने चाहिए। यहां एक जिला-एक उत्पाद योजना के तहत स्थानीय उत्पादों का भी प्रचार किया जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि संग्रहालयों में ऐसी जानकारी उपलब्ध कराई जाए, जिससे पर्यटकों को स्थानीय हस्तशिल्प, पारंपरिक उत्पादों, धार्मिक स्थलों और पर्यटन स्थलों के बारे में भी जानकारी मिल सके। इसके लिए पुस्तकों और अन्य सूचना सामग्री का उपयोग किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने ओंकारेश्वर स्थित ममलेश्वर मंदिर के विकास कार्यों को उज्जैन की तर्ज पर पूरा करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि यह मंदिर धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और यहां आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार के मंत्रियों को मप्र के धार्मिक और पर्यटन स्थलों का दौरा कराया जाए ताकि राज्य की परियोजनाओं और उपलब्धियों की जानकारी राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचे। मुख्यमंत्री का मानना है कि धार्मिक पर्यटन केवल आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने निवेश आकर्षित करने के लिए रोड शो आयोजित करने और बड़े शहरों में कन्वेंशन सेंटर विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही, धार्मिक पर्यटन से जुड़े होटल, परिवहन, हस्तशिल्प, स्थानीय व्यापार और सेवा क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। सरकार का लक्ष्य है कि धार्मिक पर्यटन को विकास और रोजगार का मजबूत आधार बनाया जाए।
रोजगार और अर्थव्यवस्था को मिल रहा लाभ
धार्मिक पर्यटन के बढ़ते दायरे का सबसे बड़ा लाभ स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिल रहा है। जिन क्षेत्रों में धार्मिक परियोजनाएं विकसित हुई हैं वहां होटल, रेस्टोरेंट, परिवहन, हस्तशिल्प और स्थानीय व्यापार को नई ऊर्जा मिली है। उज्जैन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। महाकाल लोक के बाद होटल उद्योग, टैक्सी सेवाओं, छोटे व्यापारियों और स्थानीय रोजगार में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। इसी मॉडल को अन्य धार्मिक स्थलों पर भी लागू करने की तैयारी है। विशेषज्ञों के अनुसार धार्मिक पर्यटन में निवेश का प्रत्यक्ष लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचता है, क्योंकि इसमें सेवा क्षेत्र की बड़ी भूमिका होती है। लोक परियोजनाओं की एक बड़ी विशेषता यह है कि इनमें स्थानीय कलाकारों और शिल्पकारों को भी अवसर दिया जा रहा है। मूर्तिकला, चित्रकला, लोक संगीत, लोक नृत्य और पारंपरिक हस्तशिल्प को इन परियोजनाओं से जोड़ा गया है। इससे जहां सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण हो रहा है, वहीं कलाकारों के लिए नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं। सरकार धार्मिक पर्यटन को सांस्कृतिक पुनर्जागरण के माध्यम के रूप में भी देख रही है। पहले कई धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं को आवास, परिवहन, पार्किंग और स्वच्छता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। अब सरकार इन चुनौतियों को दूर करने के लिए आधुनिक सुविधाओं पर विशेष ध्यान दे रही है। स्मार्ट पार्किंग, डिजिटल सूचना केंद्र, ऑनलाइन दर्शन व्यवस्था, बेहतर सडक़ संपर्क, स्वच्छ शौचालय, पेयजल सुविधाएं और दिव्यांगजन अनुकूल व्यवस्थाएं विकसित की जा रही हैं। इससे श्रद्धालुओं का अनुभव अधिक सुविधाजनक और सकारात्मक बन रहा है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार धार्मिक पर्यटन को केवल निर्माण कार्यों तक सीमित नहीं रख रही है। इसके लिए एक समग्र रणनीति तैयार की गई है जिसमें बुनियादी ढांचा, सांस्कृतिक संरक्षण, निवेश, ब्रांडिंग और स्थानीय भागीदारी सभी को शामिल किया गया है। राज्य सरकार का लक्ष्य है कि मप्र को देश का सबसे प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन राज्य बनाया जाए। इसके लिए विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित किया जा रहा है और धार्मिक स्थलों को पर्यटन सर्किटों से जोड़ा जा रहा है। धार्मिक पर्यटन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए निजी निवेशक भी रुचि दिखा रहे हैं। होटल, रिसॉर्ट, वेडिंग डेस्टिनेशन, सांस्कृतिक केंद्र और पर्यटन सेवाओं में निवेश बढ़ रहा है। इससे प्रदेश में पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलने की संभावना है। सरकार भी सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत नई परियोजनाओं को प्रोत्साहित कर रही है।
