मप्र चुनाव 2028: कांग्रेस ने 70 कमजोर सीटों पर किया फोकस

  • बीजेपी ने भी चिन्हित कीं 35 कठिन सीटें, अभी से शुरू हुई चुनावी तैयारी…
  • गौरव चौहान
मप्र चुनाव 2028

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2028 में अभी करीब दो साल का समय है, लेकिन प्रदेश की सियासत में चुनावी बिसात अभी से बिछने लगी है। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में बड़ी हार झेल चुकी कांग्रेस ने इस बार उन विधानसभा क्षेत्रों पर सबसे पहले फोकस करने की रणनीति बनाई है, जहां उसका प्रदर्शन लंबे समय से कमजोर रहा है। पार्टी संगठन ने ऐसी करीब 70 सीटों की पहचान की है, जहां कांग्रेस कभी नहीं जीती या बहुत कम मौकों पर जीत हासिल कर सकी है। दूसरी तरफ बीजेपी भी ऐसी करीब 35 विधानसभा सीटों पर अलग रणनीति तैयार कर रही है, जहां पार्टी का प्रदर्शन ऐतिहासिक रूप से कमजोर रहा है। यानी 2028 की लड़ाई में दोनों दल अपनी मजबूत सीटों से ज्यादा अब विरोधी दल के पुराने गढ़ में सेंध लगाने की तैयारी कर रहे हैं।
वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश की 230 सीटों में बीजेपी ने 163 सीटें, जबकि कांग्रेस ने केवल 66 सीटें जीती थीं। चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़े भी यही संख्या दर्ज करते हैं। इसी परिणाम के बाद कांग्रेस संगठन ने कमजोर विधानसभा क्षेत्रों की अलग पहचान कर वहां लंबी अवधि की तैयारी शुरू करने का फैसला किया है। पार्टी का फोकस केवल उम्मीदवार घोषित करने या चुनाव के आखिरी महीनों में प्रचार करने के बजाय बूथ और मतदाता स्तर पर पहले से संगठन खड़ा करने पर है।
गोविंदपुरा कांग्रेस के लिए सबसे मुश्किल सीटों में
भोपाल की गोविंदपुरा विधानसभा सीट कांग्रेस के लिए सबसे मुश्किल सीटों के उदाहरणों में शामिल है। इस सीट पर बीजेपी का कब्जा 1980 से लगातार बना हुआ है। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर 1980 से 2013 तक लगातार यहां से चुनाव जीतते रहे। 2018 और 2023 में उनकी बहू कृष्णा गौर ने बीजेपी का यह गढ़ बरकरार रखा। 2023 में कृष्णा गौर ने यहां एक लाख से ज्यादा मतों के बड़े अंतर से जीत हासिल की थी।
इंदौर-2 पर 1993 से बीजेपी का कब्जा
इंदौर की विधानसभा सीट नंबर-2 भी बीजेपी के सबसे मजबूत गढ़ों में से एक है। यह सीट 1993 से लगातार बीजेपी के पास है। पहले कैलाश विजयवर्गीय और बाद में रमेश मेंदोला ने यहां पार्टी का वर्चस्व कायम रखा। 2008 से रमेश मेंदोला लगातार इस सीट से विधायक चुने जा रहे हैं। यही वजह है कि कांग्रेस की कमजोर सीटों की रणनीति में इंदौर के पुराने बीजेपी गढ़ खास महत्व रखते हैं।
घर-घर पहुंचेंगे कांग्रेस कार्यकर्ता
प्रदेश कांग्रेस संगठन के मुताबिक चिह्नित 70 विधानसभा क्षेत्रों में सबसे पहले मतदाता सूची के घर-घर सत्यापन का अभियान चलाया जाएगा। कार्यकर्ता अपने क्षेत्र में मतदाताओं के नाम, मतदान केंद्र और संपर्क संबंधी संगठनात्मक जानकारी जुटाएंगे। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि किन बूथों पर पार्टी लगातार कमजोर रहती है और किन क्षेत्रों में नए या स्थानांतरित मतदाताओं से संपर्क बढ़ाने की जरूरत है। पार्टी संगठन ने इस अभियान को करीब छह महीने तक चलाने की तैयारी की है। हालांकि मतदाता सूची में किसी नाम को जोडऩा, हटाना या संशोधित करना केवल निर्वाचन आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही हो सकता है। राजनीतिक दल अपने स्तर पर मतदाताओं से संपर्क और सूची का मिलान कर सकते हैं।
रहली में 1985 से नहीं हारे गोपाल भार्गव
सागर जिले की रहली विधानसभा सीट भी कांग्रेस के लिए लंबे समय से बड़ी चुनौती है। बीजेपी के गोपाल भार्गव 1985 से लगातार इस सीट से जीतते आ रहे हैं। 2023 में उन्होंने नौवीं बार लगातार रहली से जीत दर्ज की। इस तरह रहली प्रदेश की उन सीटों में शामिल है, जहां कांग्रेस को केवल चुनावी अभियान नहीं बल्कि संगठनात्मक स्तर पर लंबी रणनीति की जरूरत होगी।
19 को राहुल का इंदौर कार्यक्रम
इस बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का 19 सितंबर को इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम प्रस्तावित है। पहले यह कार्यक्रम 12 सितंबर को होना था, लेकिन नेहरू स्टेडियम की अनुमति नहीं मिलने के बाद इसे एक सप्ताह आगे बढ़ाया गया। कार्यक्रम में राहुल गांधी विद्यार्थियों और युवाओं से शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं और भविष्य से जुड़े मुद्दों पर संवाद करेंगे। हालांकि 7 सितंबर तक कार्यक्रम स्थल को लेकर अंतिम स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी। कांग्रेस की ओर से अलग-अलग स्थानों पर चर्चा हुई है और बड़ी संख्या में छात्रों के रजिस्ट्रेशन का दावा किया गया है। इसलिए फिलहाल 19 सितंबर की तारीख को प्रस्तावित कार्यक्रम के रूप में ही लिखना ज्यादा सुरक्षित है।
राहुल के दौरे के बाद कमजोर सीटों पर बढ़ेगा फोकस
कांग्रेस की रणनीति राहुल गांधी के युवा संवाद के बाद संगठनात्मक अभियान को और तेज करने की है। कमजोर सीटों पर बूथवार मतदाता स्थिति, सामाजिक समीकरण, पुराने चुनाव परिणाम और स्थानीय नेतृत्व की ताकत का आकलन किया जाएगा। पार्टी यह भी जानने की कोशिश करेगी कि पिछले चुनावों में किन बूथों पर लगातार हार हुई और इसके पीछे उम्मीदवार, संगठन, स्थानीय मुद्दे या सामाजिक समीकरण में से कौन-सा कारण प्रमुख रहा।
बीजेपी भी 35 कठिन सीटों के लिए बना रही माइक्रो प्लान
कांग्रेस ही नहीं, बीजेपी ने भी अपने कमजोर क्षेत्रों पर अलग नजर रखी है। पार्टी स्तर पर ऐसी करीब 35 सीटों की पहचान की गई है, जहां जनसंघ-बीजेपी के दौर से पार्टी बहुत कम बार जीती है या जहां कांग्रेस का मजबूत आधार रहा है।

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