
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश में न्यायिक बुनियादी ढांचे की बदहाल स्थिति और बजटीय उपेक्षा को लेकर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर कड़ी नाराजगी जताई है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने कहा कि इंदौर और भोपाल को छोड़ दिया जाए तो प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में अदालतों के बुनियादी ढांचे की स्थिति बेहद चिंताजनक है। खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि कई जिलों में न्यायाधीशों के आधे पद तक खाली हैं। यदि नए न्यायाधीशों की नियुक्ति कर भी दी जाए तो उनके बैठने और न्यायिक कार्य करने के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध नहीं है। अदालत ने इसे न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर स्थिति माना। हाईकोर्ट ने सरकार से मिले आंकड़ों का हवाला देते हुए न्यायिक बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च को लेकर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि सरकार को एक केस से कम से कम 500 रुपए कोर्ट फीस प्राप्त होती है, जबकि न्यायिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर प्रति केस औसतन सिर्फ 87 रुपए खर्च किए जा रहे हैं। खंडपीठ ने इस अंतर पर सवाल उठाते हुए कहा कि जनता से न्याय व्यवस्था के लिए ली जाने वाली कोर्ट फीस का पर्याप्त हिस्सा अदालतों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में लगाया जाना चाहिए। कोर्ट के मुताबिक न्यायिक इंफ्रास्ट्रक्चर का संकट मुकदमों की बढ़ती लंबित संख्या की प्रमुख वजहों में से एक है।
अनूपपुर में फरवरी 2021 से अटका कोर्ट भवन
मामला अनूपपुर की अदालत से जुड़ी याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। अनूपपुर के अधिवक्ता बासुदेव चटर्जी ने याचिका के माध्यम से बताया कि जिले में नई कोर्ट बिल्डिंग का निर्माण फरवरी 2021 से अटका हुआ है। फिलहाल अदालत किराए के भवन में संचालित हो रही है। कोर्ट ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए कि जनता से प्राप्त होने वाली कोर्ट फीस का पैसा न्याय व्यवस्था के बुनियादी ढांचे पर खर्च किया जाए। अदालत ने संकेत दिया कि न्यायिक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए हर बार अलग से बजट मांगने की स्थिति नहीं बननी चाहिए।
सरकार से मांगा बजट आवंटन का पूरा ब्योरा
सुनवाई के दौरान कोर्ट मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता केसी घिल्डियाल और अधिवक्ता अंशुमान सिंह की ओर से भी सुझाव दिए गए। खंडपीठ ने इन सुझावों को रिकॉर्ड में लेते हुए सरकार से न्यायिक बुनियादी ढांचे के लिए किए गए बजट आवंटन और खर्च का विस्तृत ब्योरा मांगा है। अदालत यह देखना चाहती है कि न्यायिक ढांचे के लिए उपलब्ध बजट का किस तरह इस्तेमाल किया जा रहा है और अदालतों की वास्तविक जरूरतों की तुलना में आवंटन कितना पर्याप्त है।
कोर्ट फीस के इस्तेमाल पर उठेगा बड़ा सवाल
हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद अब राज्य में कोर्ट फीस से प्राप्त राजस्व और न्यायिक बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च के बीच अंतर पर बहस तेज हो सकती है। अदालत ने जिस अनुपात का उल्लेख किया है—500 रुपए कोर्ट फीस के मुकाबले 87 रुपए इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च—वह न्याय व्यवस्था के वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। खंडपीठ का निर्देश है कि न्याय के लिए जनता से लिया जाने वाला शुल्क न्यायिक व्यवस्था को सक्षम बनाने में भी दिखाई देना चाहिए। यदि अदालतों के पास पर्याप्त भवन, कोर्ट रूम और कार्यस्थल ही नहीं होंगे तो न्यायिक क्षमता बढ़ाने के प्रयास भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगे। अनूपपुर की लंबित कोर्ट बिल्डिंग से शुरू हुआ यह मामला अब प्रदेश की पूरी न्यायिक आधारभूत संरचना और उसके लिए बजट आवंटन के व्यापक प्रश्न तक पहुंच गया है। आने वाली सुनवाई में सरकार की ओर से पेश किए जाने वाले बजट और खर्च के आंकड़ों से यह स्पष्ट होगा कि प्रदेश में न्यायिक इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर वास्तविक स्थिति कितनी गंभीर है।
न्यायपालिका सरकारी विभाग नहीं
सुनवाई के दौरान वित्त सचिव मनीष रस्तोगी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत के समक्ष उपस्थित हुए। इस दौरान अधिकारियों की ओर से न्यायपालिका के लिए विभाग शब्द का इस्तेमाल किए जाने पर खंडपीठ ने आपत्ति जताई। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका संविधान का स्वतंत्र स्तंभ है और इसे किसी सरकारी विभाग के रूप में नहीं देखा जा सकता। कोर्ट की इस टिप्पणी को न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसके प्रशासनिक ढांचे को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया कि न्यायिक संस्थानों की जरूरतों को सामान्य सरकारी विभागों की तरह देखने के बजाय संविधान में न्यायपालिका की स्वतंत्र स्थिति के अनुरूप प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
