पंचायतों में रिश्तेदारी तंत्र पर सरकार की सख्ती

पंचायतों में रिश्तेदारी तंत्र
  • पैतृक गांव और ससुराल में नहीं होगी सचिवों की तैनाती

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। ग्राम पंचायतों में वर्षों से चली आ रही रिश्तेदारी, प्रभाव और स्थानीय दबाव की राजनीति पर अंकुश लगाने के लिए पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने बड़ा फैसला लिया है। अब कोई भी पंचायत सचिव अपने पैतृक गांव, ससुराल या ऐसी ग्राम पंचायत में पदस्थ नहीं किया जाएगा, जहां उसके करीबी रिश्तेदार सरपंच, उपसरपंच या पंच के रूप में निर्वाचित हों। सरकार का मानना है कि इससे पंचायतों में पारदर्शिता बढ़ेगी और स्थानीय स्तर पर होने वाली अनियमितताओं पर रोक लगेगी।
प्रदेश में तबादला प्रक्रिया के बीच जारी नए निर्देशों में जिला पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को स्पष्ट कहा गया है कि सचिवों की पदस्थापना करते समय हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) की स्थिति से बचा जाए। पंचायत विभाग का मानना है कि जब सचिव और जनप्रतिनिधि पारिवारिक या सामाजिक रूप से जुड़े होते हैं तो वित्तीय निर्णयों और विकास कार्यों में निष्पक्षता प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है।
पुराने अनुभवों से निकला नया फैसला
दरअसल, त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद 1994 से 1996 के बीच बड़ी संख्या में पंचायत कर्मियों की नियुक्तियां ग्राम सभाओं की अनुशंसा पर हुई थीं। बाद में इन्हें पंचायत सचिव का दर्जा दिया गया। उस दौर में कई स्थानों पर सरपंचों, पंचों और प्रभावशाली ग्रामीणों के रिश्तेदार सचिव बन गए। समय के साथ सरकार को ऐसी शिकायतें मिलने लगीं कि पंचायत प्रतिनिधि और सचिव मिलकर वित्तीय और प्रशासनिक निर्णयों में गड़बडिय़ां कर रहे हैं। विभागीय जांचों में कई मामलों में मिलीभगत की पुष्टि होने के बाद सरकार ने तबादला नीति में व्यापक बदलाव करने का निर्णय लिया है। नए नियम उसी प्रक्रिया का हिस्सा माने जा रहे हैं।
10 साल से जमे सचिव होंगे प्राथमिकता पर स्थानांतरित
नए निर्देशों के अनुसार जो पंचायत सचिव एक ही ग्राम पंचायत में 10 वर्ष या उससे अधिक समय से पदस्थ हैं, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर अन्य पंचायतों में स्थानांतरित किया जाएगा। यदि ऐसे कर्मचारियों की संख्या अधिक हुई तो सबसे लंबे समय से एक ही स्थान पर कार्यरत सचिवों को पहले हटाया जाएगा। सरकार का तर्क है कि लंबे समय तक एक ही पंचायत में रहने से स्थानीय नेटवर्क और प्रभाव इतना मजबूत हो जाता है कि प्रशासनिक निष्पक्षता प्रभावित होने लगती है।
जांच वाले मामलों में मंत्री की मंजूरी जरूरी
भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता, गंभीर शिकायतों या लोकायुक्त एवं आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) की जांच का सामना कर रहे पंचायत सचिवों के तबादले पर भी नियंत्रण रखा गया है। ऐसे मामलों में विभागीय मंत्री की अनुमति के बाद ही स्थानांतरण किया जा सकेगा, ताकि जांच प्रभावित न हो। ग्रामीण प्रशासन से जुड़े जानकारों का मानना है कि यह फैसला केवल तबादला नीति का बदलाव नहीं है, बल्कि पंचायतों में वर्षों से चले आ रहे रिश्तेदारी आधारित प्रभाव तंत्र को तोडऩे की कोशिश है। यदि नियमों का सख्ती से पालन हुआ तो पंचायतों में वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही बढऩे की संभावना है। हालांकि इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जिला स्तर पर इन निर्देशों का पालन कितनी गंभीरता से कराया जाता है।
महिला सचिवों को मिलेगी विशेष सुविधा
वहीं आदेश में अंतरजिला संविलियन (ट्रांसफर) को केवल स्वैच्छिक आधार पर अनुमति दी गई है। महिला सचिवों को विशेष सुविधा मिलेगी। इसमें विवाहित, विधवा एवं तलाकशुदा महिला ग्राम पंचायत सचिव अपने पति, ससुराल या माता-पिता के निवास वाले जिले में संविलियन के लिए आवेदन कर सकेंगी। अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त सचिव, यदि उनकी नियुक्ति वाले जिले के अलावा किसी अन्य जिले से संबंध रखते हैं, तो वे भी अपने मूल जिले में संविलियन के लिए आवेदन कर सकेंगे। इच्छुक सचिव को वर्तमान पदस्थापना जिले के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को आवेदन देना होगा। आवेदन के साथ संबंधित जिले में रिक्त पद की उपलब्धता का सत्यापन किया जाएगा। रिक्त पद उपलब्ध होने पर प्रस्ताव पंचायत राज संचालनालय भोपाल भेजा जाएगा। प्रशासनिक स्वीकृति के बाद संविलियन आदेश जारी किए जाएंगे। संविलियन के बाद सचिव का नाम वरिष्ठता सूची में सबसे नीचे रखा जाएगा। अंतरजिला संविलियन का लाभ केवल एक बार ही दिया जाएगा।

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