कुर्सियां भर गईं, संसाधनों का अकाल

संसाधनों का अकाल
  • विकास प्राधिकरणों के पास न दफ्तर, न बजट; राजनीतिक नियुक्तियों तक सिमटी भूमिका

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। प्रदेश के विशेष क्षेत्रों के सुनियोजित विकास के लिए गठित विकास प्राधिकरण संसाधनों के अभाव में अपनी भूमिका निभाने में असमर्थ नजर आ रहे हैं। राज्य सरकार ने हाल ही में विभिन्न विकास प्राधिकरणों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियां तो कर दी हैं, लेकिन इनमें से कई प्राधिकरण ऐसे हैं जिनके पास न अपना भवन है, न पर्याप्त कर्मचारी और न ही संचालन के लिए आवश्यक बजट। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या ये संस्थाएं विकास के बजाय केवल राजनीतिक नियुक्तियों का मंच बनकर रह गई हैं।
मप्र में वर्तमान में करीब 15 विकास प्राधिकरण कार्यरत हैं, जिनका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों और शहरों का योजनाबद्ध विकास करना है। इनमें से 11 प्राधिकरणों में नई नियुक्तियां हो चुकी हैं, लेकिन अधिकांश संस्थाओं के पास बुनियादी प्रशासनिक ढांचा तक उपलब्ध नहीं है। कई प्राधिकरणों में नियमित अमला नहीं होने से नियुक्त पदाधिकारियों के बावजूद कामकाज शुरू नहीं हो पा रहा है। स्व-वित्तपोषित संस्थान होने के कारण इन प्राधिकरणों को दीर्घकाल में स्वयं संसाधन जुटाने होते हैं, लेकिन शुरुआती चरण में सरकारी सहयोग आवश्यक माना जाता है। चित्रकूट विकास प्राधिकरण को सरकार द्वारा बजट उपलब्ध कराए जाने के बाद वहां विकास कार्यों की शुरुआत हो चुकी है, जबकि अन्य प्राधिकरण अभी भी संसाधनों की प्रतीक्षा में हैं।
11 प्राधिकरणों में हुई हैं नियुक्तियां
अभी तक 11 प्राधिकरणों में राजनीतिक नियुक्तियां की गई हैं। इनमें  विंध्य विकास प्राधिकरण  का अध्यक्ष पंचूलाल प्रजापति को बनाया गया है। वहीं उज्जैन विकास प्राधिकरण  का अध्यक्ष रविंद्र सोलंकी,विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण, ग्वालियर  का अध्यक्ष अशोक शर्मा, ग्वालियर विकास प्राधिकरण  का अध्यक्ष मधुसूदन भदौरिया, अमरकंटक विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष राजेंद्र भारती, ग्वालियर व्यापार मेला प्राधिकरण  का अध्यक्ष अशोक जादौन, रतलाम विकास प्राधिकरण  का अध्यक्ष मनोहर पोरवाल, मध्यप्रदेश तीर्थ स्थान एवं मेला प्राधिकरण  का अध्यक्ष विनोद गोटिया , राज्य स्तरीय सहरिया विकास प्राधिकरण  का अध्यक्ष गुड्डी आदिवासी और जबलपुर विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष संदीप जैन को बनाया गया है।
विकास का उद्देश्य तभी पूरा होगा जब मिलेंगे संसाधन
प्रदेश के विकास प्राधिकरणों को स्थानीय विकास की महत्वपूर्ण इकाई माना जाता है। लेकिन यदि इन संस्थाओं को पर्याप्त बजट, कार्यालय और मानव संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए तो नई नियुक्तियां केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगी। विकास की वास्तविक तस्वीर तभी बदलेगी, जब प्राधिकरणों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के साथ-साथ प्रशासनिक और वित्तीय मजबूती भी मिले। विंध्य विकास प्राधिकरण, रीवा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने आर्थिक एवं सांख्यिकी संचालनालय को पत्र लिखकर संसाधनों की कमी से अवगत कराया है। पत्र के अनुसार प्राधिकरण का पुराना कार्यालय जिस शासकीय आवास में संचालित हो रहा था, उसे आईटी पार्क निर्माण के लिए हटाया जा चुका है। वर्तमान में कार्यालय के दस्तावेज संयुक्त संचालक योजना एवं सांख्यिकी कार्यालय में रखे गए हैं। सीईओ ने बताया है कि अध्यक्ष और उपाध्यक्षों की नियुक्ति के बाद भी उनके बैठने के लिए समुचित कार्यालय उपलब्ध नहीं है। प्राधिकरण में कोई भी शासकीय सेवक प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ नहीं है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में कार्यालय व्यय और पदाधिकारियों की सुविधाओं के लिए कोई आवंटन नहीं मिला था, जबकि 2026-27 में भी बजट उपलब्ध नहीं कराया गया है। हालांकि हाल ही में कार्यालय संचालन के लिए एक शासकीय आवास आवंटित किया गया है, लेकिन वित्तीय संसाधनों के अभाव में कोई नई परियोजना शुरू नहीं हो सकी है।
रतलाम विकास प्राधिकरण का खाता सीज
रतलाम विकास प्राधिकरण की स्थिति भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। आयकर विभाग की लगभग छह करोड़ रुपए की देनदारी के चलते उसका बैंक खाता सीज कर दिया गया है। इसके कारण पिछले चार महीनों से कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल पाया है। प्राधिकरण का कार्यालय फिलहाल नगर निगम भवन से संचालित हो रहा है। यहां भी आवश्यक संख्या में अधिकारी-कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं और अब तक कोई विशेष बजट नहीं मिला है। प्राधिकरण अध्यक्ष मनोहर पोरवाल का कहना है कि आयकर विभाग में अपील की जा चुकी है और खाते जल्द खुलने की उम्मीद है, जिसके बाद विकास कार्यों को गति दी जाएगी।
सिंगरौली में परियोजनाएं हैं, लेकिन स्टाफ की कमी
सिंगरौली विकास प्राधिकरण अपेक्षाकृत पुराना और आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में माना जाता है। यहां लगभग 120 करोड़ रुपए की परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। पूर्व अध्यक्ष दिलीप शाह के कार्यकाल में आयोजित संपत्ति मेले से प्राधिकरण ने 12 से 13 करोड़ रुपए की आय अर्जित की थी। इसके बावजूद यहां भी मानव संसाधन की कमी बनी हुई है। वर्तमान में प्राधिकरण के पास केवल चार नियमित अधिकारी-कर्मचारी हैं, जबकि लगभग इतने ही कर्मचारी प्रतिनियुक्ति पर सेवाएं दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्याप्त अमले के बिना बड़ी परियोजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण रहेगा।

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