
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हिंदू धर्म को लेकर कई अहम टिप्पणियां की हैं। अदालत ने साफ कहा है कि हिंदू धर्म जीवन जीने की एक कला है- वे ऑफ लाइफ… हिंदू धर्म में अपनी आस्था साबित करने के लिए किसी को भी मंदिर जाना अनिवार्य नहीं है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अपनी आस्था के लिए केवल घर में एक दिया जलाया जाना भी काफी है। दरअसल, सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता के लिए चल रही सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों वाली संवैधानिक पीठ कर रही है। सीजेआई सूर्यकांत इस संवैधानिक पीठ के अध्यक्ष हैं। बुधवार को 15वें दिन की सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के अधिवक्ता डॉ. मोहन गोपाल ने धार्मिक समुदायों के अंदर सामाजिक न्याय की मांग पर सवाल उठाते हुए कहा कि हिंदू धर्म को धार्मिक श्रेणी में परिभाषित करने के बाद 1966 में माना गया कि हिंदू वह है जो दर्शन के मामले में वेदों को सर्वोच्च मानता है, लेकिन क्या आज हर हिंदू वेदों को सर्वोच्च मानता है।
