
पटना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह को वैध ठहराने के लिए आवश्यक धार्मिक रस्मों का पालन साबित करना अनिवार्य है। न्यायाधीश बिबेक चौधरी और न्यायाधीश राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने दुर्गावती देवी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए सिवान फैमिली कोर्ट के फैसले पर अपनी मुहर लगाई। हाईकोर्ट ने साक्ष्यों और गवाहों के बयानों की समीक्षा के बाद अपने आदेश में दोहराया कि जब तक हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह संपन्न होने का ठोस प्रमाण न हो, तब तक किसी भी व्यक्ति को किसी अन्य का कानूनी जीवनसाथी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता महिला अपने दूसरे विवाह की सही तारीख, स्थान या उसमें निभाई गई धार्मिक रस्मों का कोई स्पष्ट विवरण पेश नहीं कर सकीं। गवाहों के बयानों में भी काफी विरोधाभास था और कोई भी गवाह यह साबित नहीं कर सका कि सप्तपदी या सिंदूरदान जैसी रस्में पूरी की गई थीं। यहां तक कि शादी कराने वाले पुरोहित के नाम को लेकर भी गवाहों में मतभेद था।
