- आबकारी विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, मप्र में फिट नहीं बैठता छत्तीसगढ़ मॉडल

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र में नई आबकारी नीति लागू होने के बाद करीब 96 प्रतिशत शराब दुकानों की नीलामी हो चुकी है। शेष 4 प्रतिशत दुकानों के लिए कई बार नीलामी की प्रक्रिया हुई है, लेकिन इनको कोई लेने को तैयार नहीं है। ऐसे में सरकार की मंशा है कि इन दुकानों का संचालन छत्तीसगढ़ मॉडल पर कराया जाए। इस बीच प्रदेश में शराब की बिक्री और आबकारी नीति को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच, छत्तीसगढ़ के शराब मॉडल को मप्र में लागू करना अव्यावहारिक माना गया है। आबकारी विभाग द्वारा की गई स्टडी के बाद यह रिपोर्ट सरकार को सौंपी जा रही है कि छत्तीसगढ़ मॉडल एमपी में फिट नहीं बैठता है।
मप्र में लगभग 96 प्रतिशत शराब दुकानों का पहले ही नीलामी के माध्यम से आवंटन हो चुका है। छत्तीसगढ़ मॉडल सरकारी दुकानों के संचालन पर आधारित है, जिसे लागू करने पर सरकार को अपने ही ठेकेदारों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती। छत्तीसगढ़ मॉडल को पूरी तरह लागू करने के लिए, जो अभी लागू नहीं है, नए सिरे से नीलामी की आवश्यकता होगी। मौजूदा स्थिति में इसे लागू करने से राजस्व और प्रबंधन में अव्यवस्था फैल सकती है। अगर सरकार इस मॉडल को अपनाती है, तो इसके लिए बड़े पैमाने पर मैनपावर, परिवहन और प्रॉपर्टी का अनुबंध करना होगा, जिसके लिए काफी समय चाहिए। दिलचस्प बात यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार भी अब सरकारी मॉडल से हटकर ठेका पद्धति को फिर से लागू करने की तैयारी में है, ताकि राजस्व और पारदर्शिता में सुधार किया जा सके।
वर्तमान व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं होगा
जानकारी के अनुसार, आबकारी विभाग भले ही प्रदेश की सभी 3553 शराब दुकानों की समय पर नीलामी न कर सका हो, मगर इसके बाद भी प्रदेश की वर्तमान व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं होगा। आबकारी नीति में बदलाव की आहट के बीच फिलहाल यह साफ हो गया है कि प्रदेश में छत्तीसगढ़ मॉडल के तहत सरकारी शराब दुकानें नहीं खुलेंगी। राज्य सरकार की आबकारी नीति के लिए गठित कैबिनेट कमेटी में एक मंत्री ने नीलाम ना होने वाली शराब दुकानें को छत्तीसगढ़ की तर्ज पर निगम-मंडल के जरिए चलाने की सलाह दी थी। मगर प्रदेश के आबकारी विभाग के अफसर छत्तीसगढ़ के मॉडल से संतुष्ट नहीं है और इसे प्रदेश के नजरिए से अनफिट बताकर नकार दिया है।
टीम ने किया छत्तीसगढ़ मॉडल का अध्ययन
कैबिनेट बैठक के बाद आबकारी की एक टीम छत्तीसगढ़ जाकर वहां की आबकारी नीति का अध्ययन भी कर आई है। इस टीम ने अपनी रिपोर्ट भी विभाग को सौंप दी है। विभाग के जिम्मेदारों का मानना है कि जो मॉडल छत्तीसगढ़ में चल रहा है, वह मध्यप्रदेश की भौगोलिक और व्यापारिक स्थिति के अनुकूल नहीं है और इसे लागू करने में कई तकनीकी और आर्थिक परेशानियां आएंगी। आबकारी विभाग के अधिकारियों ने का मानना है कि अगर छत्तीसगढ़ मॉडल को मध्य प्रदेश में लागू किया जाता है तो प्रदेश में एक हाइब्रिड मॉडल बन जाएगा। एमपी में अब लगभग 96 प्रतिशत दुकानों की नीलामी हो चुकी है और ठेकेदारों को दुकानें सौंपी जा चुकी हैं। अगर सरकार बची हुई दुकानों को छत्तीसगढ़ मॉडल पर चलाएगी तो अपने ही ठेकेदारों के सामने प्रतिद्वंद्वी बन जाएगी, जिन्होंने करोड़ों की बोली लगाकर वाइन शॉप खरीदी हैं। ऐसी स्थिति में सरकारी और निजी दुकानों के बीच खींचतान शुरू हो जाएगी, जिसका सीधा असर न केवल रेवेन्यू पर पड़ेगा बल्कि सरकार के खिलाफ ठेकेदार विरोध करते हुए कोर्ट तक जा सकते हैं। छत्तीसगढ़ मॉडल को खारिज करने के पीछे एक बड़ी वजह वहां का विवादास्पद इतिहास और बुनियादी ढांचे की कमी भी है।
विवादों में रहा है छत्तीसगढ़ मॉडल
पड़ोसी राज्य में सरकारी निगम-मंडल के जरिए शराब बेचने का एक बड़ा घोटाला भी सामने आया था, जिसमें राजनेताओं और नौकरशाहों की संलिप्तता पाई गई थी। प्रदेश सरकार ऐसे जोखिम से भी बचना चाहती है। इसके अलावा, यदि सरकार इस वित्त वर्ष में इस मॉडल को अपनाने का फैसला करती भी है, तो दुकानों के लिए जमीन, कर्मचारियों की नियुक्ति और शराब परिवहन के लिए ट्रांसपोर्टर्स के साथ अनुबंध करने में ही लंबा वक्त लग जाएगा। संभव है कि इस मॉडल को अपनाने में अक्टूबर आ जाए, इतने समय तक शेष बची शराब दुकानों को बगैर नीलामी के रखना भी घाटे का सौदा होगा। इस मामले को लेकर आबकारी विभाग का कोई भी अधिकारी खुलकर बात नहीं कर रहा है क्योंकि इस मामले में अंतिम फैसला सरकार को ही लेना है। सूत्रों के अनुसार आबकारी विभाग अपनी विस्तृत रिपोर्ट जल्द ही शासन को सौंपने की तैयारी में है। छत्तीसगढ़ मॉडल पर सहमति बनी नहीं है, ऐसे में सरकार अन्य विकल्पों पर भी विचार कर सकती है। अब तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों की आबकारी नीतियों का अध्ययन भी कराया जा सकता है क्योंकि इन दोनों राज्यों में शराब के कारोबार पर पूरी तरह से सरकार का कंट्रोल है। ऐसे में स्टडी रिपोर्ट के बाद इतना तय है कि फिलहाल मध्यप्रदेश में शराब दुकानें नीलामी और ई-टेंडर की हालिया परिपाटी से ही चलेंगी और विभाग के रेवेन्यू का खजाना निजी ठेकेदारों से ही भरा जाएगा। सरकारी तंत्र अभी इतनी बड़ी व्यावसायिक जिम्मेदारी उठाने के लिए खुद को पूरी तरह तैयार नहीं पा रहा है।
