- रत्नाकर त्रिपाठी

कागज की नाव के गीत का वीडियो चल रहा है। बोल हैं, हर जनम में हमारा मिलन। कॉलेज के वक्त दूरदर्शन के चित्रहार में ये गीत देखा था। अजीब-सा कमजोर फिल्मांकन। लेकिन गीत का दूसरा और आखिरी अंतरा आता है। यहां नायिका सारिका नायक राज किरण के सीने से लगकर, मैं तुम्हें देवता मान लूं, मन मेरा इक शिवाला रहे कह रही हैं। वो दृश्य मन के अंदर तक को कहीं दूर तक खींच ले गया। शायद उस शामियाने के बांस के समीप, जिससे टिकी हुईं जरीना वहाब सावन को आने दो के अंतिम गीत में अपने छलकते-झिझकते जज़्बात को मौन स्वीकृति प्रदान कर रही हैं। गाने के बोल हैं. तेरी तस्वीर को सीने से लगा रखा है और यदि आप इस गीत में खुद को पाते हैं तो संभवत: महसूस करें कि बहाव के उन एक्सप्रेशंस को सीने से लगा कर रखा जाना गलत नहीं होगा। बांस में रेशे भी होते हैं। तो क्या ये रेशा मुझे कर्म फिल्म की तरफ विद्या सिन्हा की उन खुली-लहराती जुल्फों की तरफ लिए जा रहा है, जिनसे वह राजेश खन्ना के चेहरे को ढंकते हुए, समय तू धीरे-धीरे चल गा रही हैं? क्योंकि प्रेम की अभिव्यक्ति के ये दृश्य अपने पूरे फिल्मांकन में संपूर्णता का तत्व न होने के बाद भी कुछ पल-छिन में चाहने का वालों का सुख-चैन बड़े सुखद तरीके अपने अधिकार के आँचल तले खींच लेते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे काला पत्थर के, बाहों में तेरी मस्ती के घेरे में परवीन बाबी अपनी जुल्फों के ठीक नीचे तैरती खुद की जादुई आंखों के भाव से आह्लादित कर गईं। मिलता-जुलता मामला यह भी कि ग़ुलामी के सुनाई देती है जिसकी धडक़न में अनीता राज इसलिए याद आती रहती हैं कि कभी-कभी शाम ऐसे ढलती है… वाले अंतरे के बीच मिथुन चक्रवर्ती को देखते हुए उनकी आँख के आंसू बेसाख्ता बाहर आ जाते हैं। फिर बाहर आ जाते हैं वो जज़्बात भी जो, आनंद आश्रम के सारा प्यार तुम्हारा मैंने बांध लिया है आँचल में वाली शर्मीला टैगोर के रूप में उभरते हैं। यादगार के उस गीत में मनोज कुमार अपनी छवि में जकड़े हुए दिखते हैं, लेकिन गीत की पहली पंक्ति में ही नूतन, साथी न समझ, कोई बात नहीं में जो एक्सप्रेशन दिखाती हैं, वो प्रेम-प्रस्ताव के आग्रह वाले अमृत में भिगो गुजरते हैं। इसीलिए ऐसा भी होता है कि वंश वाले आ के तेरी बाहों में गाने के घनघोर कमजोर पिक्चराइजेशन के बावजूद नायिका एकता अपने भावों से अहसास दिलाती हैं कि कुछ गंभीरता तो अभी शेष है। ये बात एक्सप्रेशन की उस छाप के बगैर अधूरी है, जहां, बरसात की एक रात में राखी अपने प्यार के सपने सच हुए को नेत्रहीन किरदार के जरिए उत्कृष्ट अभिनय का सर्वांग दिखा जाती हैं। सतही फिल्मांकन के बावजूद वाह-वाह कहना हो तो, काहे को बुलाया मुझे बालमा, प्यार के नाम से देखिए। उसमें पल्लू सिर पर रखकर केवल उस सीक्वेंस में तनूजा ने जो कर दिखाया, वो ही उस गीत को देखने लायक बनाता है। मेरे लिहाज से तनूजा यूं भी अद्भुत अभिनेत्री रहीं, बस उन्हें ठीक अवसर नहीं मिले। हां, जिन शबाना आज़मी को अवसर मिले, उन्होंने भी तो अवतार के दिन-महीने, साल गुजरते जाएंगे में रोमांस का वो भाव घोला जो देखते ही बनता है। कर्म की तरह ही तनूजा और शबाना के इन गीतों की ध्यान देने लायक कॉमन बात यह कि इनमें राजेश खन्ना की सितारा इमेज को भुनाने पर ही अधिक ध्यान दिया गया। हालांकि हुआ ये कि ऐसी जगहों पर खन्ना टाइप्ड हो गए और इन अभिनेत्रियों ने ये जता दिया कि गीत की जान तो हम ही हैं। ऐसा तब भी होता है, जब प्यासा सावन के मेघा रे मेघा रे वाली मौशमी चटर्जी, …बाबुल का आंगन बिछड़ने लगा है वाली मात्र-एक पंक्ति में अभिनय को जीवित कर देती हैं। तब ही तो घनघोर रूप से औसत अभिनेत्री रही होने के बावजूद प्रिया राजवंश, जऱा-सी आहट होती है, तो दिल सोचता है के एकल अभिनय में भी भाव-विभोर कर दिखाती हैं। समय मिले तो कभी खुशबू में हेमा मालिनी को ओ मांझी रे, अपना किनारा वाले गीत के बीच देखिए। इसमें उनके हिस्से एक भी पंक्ति नहीं आई है, मगर इसी सीक्वेंस में जिस समय वह शाम का दीपक लगाने के बाद अपने आराध्य की प्रतिमा के समीप बैठकर अपनी सूनी निगाहों को जमीन पर बिखेरती हैं, तब कम से कम मुझे तो ये लगता है कि उस सूनेपन को अपने आंचल में समा लेने की ताकत केवल परमेश्वर के पास है।
शायद निर्देशन की कमजोरी होगी कि दस्तक के हम हैं मताए-कूचा-ओ बाजार की तरह में संजीव कुमार के चेहरे के भाव निराश करते हैं, मगर संतुलन तो है ना! वो तब से लेकर अंत तक दिखता है, जो उस गीत में कमल कपूर के सामने आने के बाद से उसके उपसंहार तक रेहाना सुल्तान अकल्पनीय तरीके से कर दिखाती हैं। उनके वो मुड़े हुए घुटने और जुल्फे-परेशान वाला अंदाज उस किरदार के भीतर की घुटन को जिस तरह सामने लाता है, वो नायाब है। फिर बर्बाद किस्म के फिल्मांकन को क्षण-भर के लिए नायाब कर देने का मेरे तई एक और उदाहरण है। हीरो के तू मेरा जानू है, तू मेरा दिलबर है में अधिकतर जगह मीनाक्षी शेषाद्री नृत्य के नाम पर व्यायाम करती-सी दिखती हैं। लेकिन एक मौके पर, …कि प्रेम ग्रंथ के पन्नों पर तू मेरा हीरो है कहते हुए जब वो पेड़ के पीछे से अपना चेहरा सामने लाती हैं, तब लगता है कि इस औसत फिल्मांकन को भी उन्होंने नई ऊर्जा से भर दिया है। ऐसे ही यतीम के आ के तुझ पर आज कर दूं मैं न्योछावर जिंदगी में फरहा नाज़ को देखिए। बीमार हालत में बैलगाड़ी में लेटे हुए सनी देओल के माथे पर हाथ फेरने सहित वो जब स्नेह के साथ अपनी चुनरी से उनके माथे का पसीना पोंछती हैं, तब कई बार ये दुविधा हो जाती है कि ये सिर्फ प्रेमिका का स्नेह है फिर उसमें मिला-घुला मातृत्व वाला भाव भी? इस गीत में तो फरहा ने यकीनन नाज करने लायक जान डाल दी है। ये सिलसिला यहीं नहीं थमता। क्योंकि यादों की ये लहर बरबस ही खींच ले जाती है सागर की तरफ जहां समंदर के किनारे डिंपल कपाडिय़ा अपनी मोहब्बत को लेकर डूबते-उभरते अहसास के बीच उन हालात के डार्क कॉम्प्लेक्शन को खुद की सफ़ेद पोशाक के वैपरीत्य के साथ सम्मोहक तरीके से दिखा रही हैं। सागर किनारे, दिल ये पुकारे के इस अलग हिस्से में गीत शुरू होने के साथ ही डिंपल अपनी भाव-भंगिमा से जो दर्द परोसती हैं, वो…और क्या और बोलूं, कि बस देखते ही बनता है। क्या ये वैसा ही नहीं है, जैसा दुल्हन वही जो पीया मन भाये के लिए सफेद साड़ी पहनकर रामेश्वरी ले तो आए हो हमें सपनों के गांव में के माध्यम से रंगीन भावनाओं से भर देती हैं? अगर रंजीता ठीक इसी तरह, अँखियों के झरोखे से गाने में सम्मोहित कर देती हैं तो यहीं इससे मिलते-जुलते अंदाज की पुरजोर प्रतिनिधि हैं, हेलेन। मेरी बात पर यकीन न हो तो कभी, चा चा चा का गाना, वो हम न थे, वो तुम ने थे को देख लीजिए।
एक तरफ से गीत गाते नायक के औसत भावों को हेलेन ने लाचार भाव से पलंग पर बैठे हुए ही रेडियो को प्रेम सहित जीवंत अभिनय वाले संस्कार के वो आकार दिए कि महान गीतकार नीरज जी की इस रचना का मर्म श्वांस लेने लगा।
मेरा लिखा ये सब-कुछ नहीं है। वो बहुत-कुछ शायद और किसी के समझने और लिखने के लिए शेष रहेगा, जो संभवत: ये व्याख्या करें कि श्री 420 की नर्गिस के मैं न रहूंगी, तुम न रहोगे, फिर भी रहेंगी निशानियां वाले मासूम चेहरे की व्याख्या के लिए और कितने पुराण लिखने पड़ जाएंगे। नग्मा-ओ-शेर की सौगात किसे पेश करूँ वाली मीना कुमारी जी की उस शोखी को फिर से समझाने के लिए शायद कला की देवी मां सरस्वती जी को ही धरा पर आना होगा। ताकि वो ये भी बता सकें कि, जब-जब फूल खिले तुझे याद किया हमने के बोल को नलिनी जयवंत ने किस तरह जीवंत बना दिया था। इधर, जिस देश में गंगा बहती है के क्लाइमैक्स को याद कीजिए। आ अब लौट चलें में नायिका पद्मिनी के हिस्से मात्र एक पंक्ति, आ जा रे…आ जा आई है। फिर भी उनके चेहरे के वो भाव ऐसे बन पड़े गोया कि कोई अपना, किसी बहुत अपने को शिद्दत से पुकार रहा है। ये फिल्मांकन तो मुझे नागमति विरह वर्णन के इर्द-गिर्द लाकर खड़ा कर देता है। फिर जब बात कुछ क्षण के खट्टे-मीठे विरह वाली हो तो देखिए कौन आया मेरे मन के द्वारे वाली शोभा खोटे को। क्योंकि अपने से काफी दूर गाए जा रहे इस गीत को खोटे इठलाते-शर्माते वाले भावों से देखने वाले की आँखों से भी आगे उसके दिल के समीप तक ले आती हैं। फिर सायरा बानू का वो अँधेरे में डूबता चेहरा भी तो अनंत स्मृति के उजाले के समीप लाता है, जब, कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे के अंतिम अंतरे में वो अपने सौंदर्य के साथ एक अंधेरे में डूबने का कमाल कर दिखाती हैं। क्या ऐसा ही कुछ नंदा ने तब नहीं कर दिखाया, जब तीन देवियां में ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए में वो कैमरे को बताती जाती हैं कि मनमोहक छेडख़ानी के जवाब में अभिनय की प्रभावी मूक अभिव्यक्ति किसे कहते हैं?
स्मिता पाटिल जी का अभिनय तो मेरी रग-रग में उबाल ला देता है। फिल्म सहित उसके गीतों में उनके अभिनय की अलग से बात करो, तो समझ नहीं आता कि, किसे याद रखें, किसे भूल जाएं? चुनांचे बेहद सतही फिल्म आखिर क्यों? का ही उदाहरण देना चाहूंगा, जहां, एक अँधेरा लाख सितारे गीत में उन्होंने अपनी उठती-झुकती पलकों से एक बार फिर सशक्त तरीके से ये जता दिया कि अभिनय का उरूजे-फिक़्रो-फन किसे कहते हैं। फिर दीप्ति नवल भी तो हैं, एक बार फिर के मन कहे मैं झूमूं में विडंबनाओं से मुक्ति के अहसास को जीवंत करती हुईं।
यही सिलसिला मुझे गाइड तक मुझे खींचकर ले जाता है, जहाँ वहीदा रहमान दिन ढल जाए के अंतरे के बीच सीढिय़ों पर बैठकर देव आनंद के जज्बात और खुद के बीच वाले अंतद्र्वंद को साकार रूप दे रही हैं। क्या ये वैसा ही नहीं है, जैसा आशा पारेख ने किस तरह दो बदन के अंत में लो आ गई उनकी याद में जज़्बाती कर दिया था?
इस गीत के आखिर में आशा पारेख की निगाहें ठहर गई हैं। और मैं….. जऱा आगे ऐसी स्मृतियों के उस इंटरवल पर खड़ा हुआ हूं, जहां मधुबाला मुझे पीछे ले जाकर ये याद दिला रही हैं कि काला पानी का अच्छा जी मैं हारी वाला नशा तब तक अधूरा है, जब तक उसमें उनकी मस्ती का तडक़ा न लगा दिया जाए। मगर, ये क्या…! गीता बाली के उल्लेख के बगैर ये जिक्र क्या पूरा हो सकता है? जाल में देव आनंद गिटार बजा रहे हैं, ये रात ये चांदनी फिर कहां… जवाब में गीता चांदनी रातें, प्यार की बातें खो गईं जाने कहाँ… की पंक्ति में वो अभिनय घोलती हैं कि मन के सितार झंकृत हो उठते हैं।
इन और इन जैसी असंख्य नायिकाओं को प्रणाम कि आपने ऐसे मौके पर अपनी सशक्त उपस्थिति का यूं ही प्रमाण दे दिया, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो। बाकी जो हुआ, उसे जैसा मैंने समझा, शायद कोई और भी समझ सके। क्योंकि उन एक-एक पल में इन सभी ने जिस अभिनय को जिया, वो मेरे भीतर के सिनेमा-प्रेम का दीपक प्रज्वलित करता रहेगा। ये शायद किसी के लिए मेरे कोरे जज़्बात हैं, लेकिन ये मेरी कोर-कोर में निहित थे, हैं और रहेंगे। कमोबेश वैसे ही, जैसे शमा-परवाना में सुरैया एक दासी से अपने मेहबूब के लिए शायरी के रूप में पैगाम कह रही हैं। उस जगह कम से कम मैं तो आज भी उनका दास बनकर पूरे गर्व के साथ बैठा हुआ हूँ। क्योंकि ऐसे वाले इन जज़्बात के बहते पसीने से नम हुई जमीन से ही खुलती है वो सुरंग, जो पल-भर के अभिनय में जीवन-भर के सुख का भाव घोलने वाली मानव सभ्यता तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करती है। हाँ, ये सुरंग बेहद सकरी है। उसे जज़्बात की नितांत महीन दीवानगी के बूते ही पार किया जा सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
