- लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा: महिला आरक्षण और अधूरी हिस्सेदारी का प्रश्न, जनगणना और परिसीमन से परे, अब इच्छाशक्ति की परीक्षा
- प्रवीण कक्कड़

महिला आरक्षण किसी सरकार या विपक्ष की जीत-हार नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा है। इतिहास की तारीखें केवल कैलेंडर के पन्ने नहीं होतीं, वे समाज की आकांक्षाओं का आईना होती हैं। 17 अप्रैल 2026 को संसद के पटल पर महिला आरक्षण की नियमावली और परिसीमन की शर्तों को लेकर जो गहमागहमी और विधायी गतिरोध देखने को मिला, उसने एक बार फिर इस विमर्श को देश के केंद्र में ला खड़ा किया है कि आधी आबादी का हक अब केवल कागजी कानूनों की नहीं, बल्कि तुरंत और ठोस क्रियान्वयन की प्रतीक्षा में है। यह प्रश्न अब केवल जनगणना और परिसीमन की तकनीकी गणनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी राजनैतिक इच्छाशक्ति की वह परीक्षा है जो तय करेगी कि हम प्रतीकों से आगे बढक़र वास्तविक हक देने के लिए कितने तैयार हैं। हाल के वर्षों की घटनाएं हमें यह याद दिलाती हैं कि महिला आरक्षण का प्रश्न केवल एक विधेयक या कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस अधूरे संकल्प का प्रतीक है, जिसे देश की करोड़ों महिलाएं दशकों से अपने अधिकार के रूप में देख रही हैं।
सितंबर 2023 में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ का पारित होना निस्संदेह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी, लेकिन इसका वास्तविक क्रियान्वयन जनगणना और परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं से जुड़ जाना इस प्रश्न को और प्रासंगिक बना देता है—प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन परिणाम अभी भी प्रतीक्षा में है।
प्रतिनिधित्व का अंतराल और लोकतांत्रिक न्याय: भारत की लगभग 48-49 प्रतिशत आबादी महिलाएं हैं, लेकिन संसद में उनकी हिस्सेदारी अभी भी करीब 15 प्रतिशत के आसपास ही है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि लोकतंत्र में मौजूद एक गंभीर ‘प्रतिनिधित्व अंतराल’ है। जब आधी आबादी नीति-निर्माण में पर्याप्त रूप से उपस्थित नहीं होती, तो लोकतंत्र की आत्मा अधूरी रह जाती है। यह अंतर केवल संख्या का नहीं, बल्कि निर्णय-निर्माण में दृष्टिकोण की कमी का भी संकेत है।
आज का केंद्रीय सवाल यही है जब एक महिला गांव की चौपाल और पंचायत का कुशल संचालन कर सकती है, तो वह देश की संसद में नेतृत्व करने के लिए किसी भविष्य की गणना का इंतजार क्यों करे? भारतीय महिलाएं अब इस अधिकार को किसी राजनीतिक दल के ‘वादे’ के रूप में नहीं, बल्कि अपनी नेतृत्व क्षमता पर राष्ट्र के विश्वास के रूप में देखना चाहती हैं। स्थानीय निकायों से मिला नेतृत्व का पाठ: स्थानीय निकायों का अनुभव इस विश्वास को मजबूत करता है। 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के बाद आज देश में 14 लाख से अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि सक्रिय हैं, और कई राज्यों में यह भागीदारी 50 प्रतिशत तक है। इन संस्थाओं में महिलाओं की उपस्थिति ने शासन की प्राथमिकताओं को बदला है, पानी, स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे अधिक मजबूती से सामने आए हैं। हालांकि, इसी स्तर पर ‘प्रधान-पति’ जैसी प्रवृत्तियां भी देखने को मिली हैं, जो यह संकेत देती हैं कि केवल सीट देना पर्याप्त नहीं है, समाज को महिलाओं की स्वतंत्र निर्णय क्षमता को भी स्वीकार करना होगा। संसद और विधानसभाओं में आरक्षण का वास्तविक अर्थ तभी होगा जब यह प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक शक्ति में बदले।
समानता बनाम न्याय: एक जरूरी स्पष्टता: महिला आरक्षण को लेकर एक आम भ्रम यह है कि यह ‘समानता’ का नहीं, बल्कि ‘विशेषाधिकार’ का विषय है। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। यह मुद्दा समानता से अधिक न्याय का है। भारतीय समाज की संरचना में महिलाओं के सामने मौजूद सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बाधाएं, चाहे वह आर्थिक निर्भरता हो, पारिवारिक जिम्मेदारियां हों या राजनीतिक नेटवर्क की कमी—उन्हें समान अवसर से वंचित करती हैं।
ऐसे में आरक्षण कोई अतिरिक्त लाभ नहीं, बल्कि उस असंतुलन को संतुलित करने का संवैधानिक माध्यम है। यह ‘कोटा’ नहीं, बल्कि ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ तैयार करने का प्रयास है।
वैश्विक संदर्भ और भारत की स्थिति: वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो कई देशों- जैसे रवांडा, नॉर्वे और फ्रांस ने महिला प्रतिनिधित्व को 30 से 50 प्रतिशत तक पहुंचाकर शासन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार किया है। भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, इस मामले में अभी भी पीछे है। यह अंतर केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि विकास की प्राथमिकताओं और दृष्टिकोण का भी है। यदि भारत को वास्तव में ‘विकसित राष्ट्र’ बनने की दिशा में आगे बढऩा है, तो उसे अपनी आधी आबादी को नीति-निर्माण में समान भागीदारी देनी ही होगी। संवेदनशील नीति-निर्माण और सामाजिक प्रभाव: महिलाओं की भागीदारी का सबसे बड़ा प्रभाव नीति-निर्माण में दिखाई देता है। जब निर्णय लेने वाली मेज पर महिलाएं होती हैं, तो नीतियां अधिक संवेदनशील और समावेशी बनती हैं। महिला सुरक्षा, मातृत्व स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और सामाजिक कल्याण जैसे विषयों को प्राथमिकता मिलती है। यह केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए सकारात्मक परिवर्तन लाता है क्योंकि एक महिला का निर्णय अक्सर परिवार, समाज और आने वाली पीढिय़ों तक प्रभाव डालता है।
राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक परिवर्तन: यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि महिला आरक्षण को केवल संसद तक सीमित न रखा जाए। राजनीतिक दलों के भीतर भी महिलाओं को नेतृत्व के अवसर देने होंगे। यदि दलों की आंतरिक संरचना पुरुष-प्रधान बनी रहेगी, तो आरक्षण का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। सरकार और विपक्ष दोनों की साझा जिम्मेदारी है कि वे इसे केवल एक विधायी उपलब्धि के रूप में न देखें, बल्कि इसे एक व्यापक सामाजिक परिवर्तन के रूप में आगे बढ़ाएं। यह मुद्दा किसी एक विचारधारा का नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय समाज के भविष्य का है।
अब प्रतीक्षा नहीं, परिणाम चाहिए: आज की भारतीय महिला ने अंतरिक्ष से लेकर सेना, विज्ञान से लेकर उद्यमिता तक हर क्षेत्र में अपनी क्षमता सिद्ध की है। वह अब केवल ‘वोटर’ नहीं, बल्कि ‘लीडर’ के रूप में अपनी पहचान चाहती है। यह मांग किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने अधिकार के पक्ष में है। अंतत:, यह सवाल अब ‘कब’ का नहीं, बल्कि ‘क्यों अभी तक नहीं’ का हो चुका है। महिला आरक्षण अब किसी सरकार की उपलब्धि या विपक्ष का एजेंडा नहीं है; यह भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की अनिवार्य शर्त है। समय आ गया है कि हम तकनीकी प्रक्रियाओं से आगे बढक़र परिणाम की ओर बढ़ें। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत उसकी समावेशिता में होती है—और भारत का लोकतंत्र तब ही पूर्ण होगा, जब उसकी आधी आबादी केवल दर्शक नहीं, बल्कि निर्णय-निर्माता बनेगी।
आधी आबादी को पूरा अधिकार देना अब विकल्प नहीं, लोकतंत्र की अनिवार्यता है।
(लेखक पूर्व पुलिस अधिकारी हैं)
