
- डेयरी सेक्टर पर मप्र सरकार का बड़ा फोकस
मप्र सरकार किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में क्रांतिकारी काम कर रही है। इस दिशा में सरकार किसानों को दुग्ध उत्पादन से भी जोड़ रही है। इसलिए मप्र सरकार डेयरी सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए बड़ा अभियान शुरू करने जा रही है। सरकार ने 26 हजार गांवों को डेयरी नेटवर्क से जोडऩे और रोजाना 52 लाख किलो दूध संग्रह का लक्ष्य तय किया है।
विनोद कुमार उपाध्याय/ बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)। मप्र सरकार ने किसानों की आय बढ़ाने के लिए डेयरी सेक्टर के विस्तार पर बड़ा फोकस किया है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने राज्य में डेयरी गतिविधियों को सहकारिता मॉडल के जरिए तेजी से बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि डेयरी क्षेत्र किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत माध्यम बन सकता है, इसलिए सरकार इसे प्राथमिकता दे रही है। विगत दिनों मुख्यमंत्री ने मप्र स्टेट को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन की राज्य स्तरीय संचालन समिति की बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिए कि डेयरी विकास योजना के तहत प्रदेश के 26 हजार गांवों को जोड़ा जाए और प्रतिदिन 52 लाख किलोग्राम दूध संकलन का लक्ष्य हासिल किया जाए। मप्र सरकार ने डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए बड़ा कदम उठाया है। इस समय राज्य, राष्ट्रीय दुग्ध उत्पादन में करीब 9 फीसदी का योगदान देता है। राज्य सरकार की योजना इसे बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के मुताबिक दूध उत्पादन ग्रामीण आय बढ़ाने का एक कारगर जरिया है। इसी वजह से राज्य में गाय पालन व डेयरी व्यवसाय को प्रोत्साहित करने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। सीएम ने कहा कि डेयरी समितियों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाए और ग्रामीण स्तर पर अधिक से अधिक लोगों को इससे जोड़ा जाए। साथ ही दूध और दुग्ध उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए ब्रांडिंग मजबूत करने, नई पैकेजिंग डिजाइन तैयार करने और बाजार विस्तार पर काम करने के निर्देश भी दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि किसानों और युवाओं को डेयरी टेक्नोलॉजी की नई तकनीकों से परिचित कराया जाए। जिला स्तर पर आदर्श पशुपालकों का सम्मान, दूधारू पशुओं की प्रदर्शनी और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
अधिकारियों का कहना है कि नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड के सहयोग से वर्ष 2025-26 में 1752 नई दुग्ध सहकारी समितियों का गठन किया गया है, जबकि 701 बंद समितियों को दोबारा सक्रिय किया गया है। वर्तमान में प्रदेश में प्रतिदिन 9.67 लाख किलोग्राम दूध संकलन हो रहा है। इसके अलावा 153 नए बल्क मिल्क कूलर स्थापित किए गए हैं। अब दुग्ध संकलन के लिए मोबाइल ऐप की शुरुआत की जा रही है, जिससे पशुपालकों को दूध की मात्रा, गुणवत्ता और भुगतान की जानकारी तुरंत मिल सकेगी। प्रदेश में दुग्ध उत्पादन और सहकारिता आधारित संकलन-प्रसंस्करण को मजबूत करने के लिए राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही है। इसी दिशा में 8 अप्रैल 2025 को राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ अनुबंध किया गया था। इसका प्रमुख लक्ष्य प्रदेश में प्रतिदिन दुग्ध संकलन को 9.5 लाख किलोग्राम से बढ़ाकर 50 लाख किलोग्राम तक पहुंचाना है। पिछले एक वर्ष में दुग्ध संकलन में करीब साढ़े तीन लाख किलोग्राम की वृद्धि हुई है, जिससे यह आंकड़ा साढ़े 12 लाख किलोग्राम तक पहुंचा है। हालांकि, 50 लाख किलोग्राम के लक्ष्य तक पहुंचना अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
तकनीक से जुड़ेगा डेयरी सेक्टर
वर्ष 2025-26 में 1,752 नई दुग्ध सहकारी समितियों का गठन किया गया है, जबकि 701 निष्क्रिय समितियों को फिर से सक्रिय किया गया है। डेयरी विकास योजना के तहत 26 हजार गांवों को जोडक़र किसानों और युवाओं को नई तकनीकों से परिचित कराया जाएगा। इंदौर में 30 टन क्षमता का दुग्ध संयंत्र शुरू हो चुका है। शिवपुरी में 20 हजार लीटर क्षमता का प्लांट निर्माणाधीन है, जबकि ग्वालियर डेयरी के सुदृढ़ीकरण का कार्य जारी है। प्रदेश में प्रतिदिन पांच करोड़ लीटर से अधिक दूध उत्पादन होता है, लेकिन इसका सीमित हिस्सा ही सहकारी क्षेत्र तक पहुंच पा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बड़े वितरकों से संपर्क बढ़ाने और मार्केटिंग नेटवर्क मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि मिल्क प्रोडक्शन बढ़ाने पीपीपी मोड पर सरकार प्रोसेसिंग यूनिट्स की स्थापना को प्रोत्साहित करेगी। किसानों और प्रदेश के युवाओं को डेयरी टेक्नोलॉजी की नई तकनीकों से परिचित कराने की आवश्यकता है। प्रदेश में मिल्क प्रोडक्ट्स की बिक्री को बढ़ाने के लिए समय-सीमा तय करते हुए कार्ययोजना बनाई जाए। साथ ही नए प्रोसेसिंग यूनिट्स को बढ़ावा दिया जाए। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि दुग्ध उत्पादन से जुड़ी गतिविधियां किसानों की आय बढ़ाने में प्रभावी रूप से सहायक हैं। सरकार डेयरी गतिविधियों को विशेष रूप से प्रोत्साहित कर रही है। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड द्वारा प्रदेश के दुग्ध संघों को दिए जा रहे सहयोग से दुग्ध संकलन में वृद्धि हुई है और किसानों को भी दूध के बेहतर दाम मिल रहे हैं। सहकार के भाव से डेयरी गतिविधियों का विस्तार किया जा रहा है। दुग्ध समितियों में महिला सदस्यता को प्रोत्साहित किया जा रहा है। उन्होंने अफसरों को निर्देश दिए कि डेयरी सहकारी कवरेज के विस्तार और सुदृढ़ीकरण, नई डेयरी प्रसंस्करण, उत्पाद निर्माण और पशु चारा संयंत्र के आधुनिकीकरण, डेयरी वैल्यू चैन के डिजिटलाइजेशन, पारदर्शिता और मिल्क प्रोडक्ट्स की बिक्री को बढ़ाने के लिए समय-सीमा तय करते हुए कार्ययोजना बनाई जाए। डेयरी विकास योजना के अंतर्गत 26 हजार गांवों को जोडऩे, रोज दुग्ध संकलन 52 लाख किलोग्राम तक करने का लक्ष्य रखकर गतिविधियां संचालित की जाएं। मुख्यमंत्री यादव ने कहा कि राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के मिल्क सेक्टर में अनुभव का लाभ राजधानी से लेकर ग्राम स्तर तक सुनिश्चित किया जाए। दूध और दुग्ध उत्पादों के बिक्री में सुधार के लिए ब्राण्ड सुदृढ़ीकरण और नई पैकेजिंग डिजाइन कर उत्पादों की पहुंच का अधिक से अधिक विस्तार किया जाए। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने दुग्ध उत्पादन में वद्धि और विभिन्न दुग्ध उत्पादों के निर्माण के लिए किसानों को नवाचार करने के लिए प्रेरित किया जाए। उन्होंने कहा कि किसानों तथा प्रदेश के युवाओं को डेयरी टेक्नोलॉजी की नई तकनीकों से परिचित कराने की भी आवश्यकता है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि आदर्श पशुपालकों को सम्मानित करने, दूधारू पशुओं की प्रदर्शनी आयोजित करने और डेयरी के संबंध में सूचना सम्प्रेषण के लिए जिला स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाए। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड द्वारा एमपी स्टेट को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन और दुग्ध संघों का कार्यअनुबंध करने के बाद वर्ष 2025-26 में 1752 नई दुग्ध सहकारी समितियों का गठन किया गया तथा 701 निष्क्रिय दुग्ध समितियों को क्रियाशील किया गया। प्रदेश में प्रतिदिन 9 लाख 67 हजार किग्रा दुग्ध एकत्र किया जा रहा है, साथ ही 153 नवीन बल्क मिल्क कूलर की स्थापना की गई है। दूध और दूध उत्पादों का क्रेडिट पर विक्रय बन्द कर दिया गया है। प्रदेश में दुग्ध संकलन मोबाइल एप से प्रारंभ किया जा रहा है, जिसके माध्यम से दुग्ध प्रदायकों को दूध की मात्रा, गुणवत्ता और मूल्य की जानकारी तत्काल प्राप्त हो सकेगी। क्षेत्र संचालन तथा विपणन कार्य में लगे मैदानी अमले की मॉनिटरिंग के लिए फील्ड फोर्स मॉनिटरिंग ऐप आरंभ किया गया है। प्रदेश में दूध की गुणवत्ता में सुधार, उत्पादन में हानि को कम करने और एक समान उत्पादन के लिए मानक संचालन प्रक्रिया लागू की गई है। इंदौर में स्थापित 30 मीट्रिक टन क्षमता का दुग्ध चूर्ण संयंत्र आरंभ किया जा चुका है। शिवपुरी में 20 हजार लीटर क्षमता के डेयरी संयंत्र और ग्वालियर डेयरी संयंत्र के सुदृढ़ीकरण का कार्य प्रगति पर है। पशु आहार संयंत्रों की क्षमता का अधिकतम उपयोग करने के लिए विशेष व्यवस्था लागू की गई है। पीपीपी मोड पर भी प्रसंस्करण संयंत्रों की स्थापना को प्रोत्साहित किया जाएगा।
आदर्श पशु ग्राम से बदलेगी गांवों की तस्वीर
प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम की तरह मप्र में आदर्श पशु ग्राम बनाए जाएंगे। किसान कल्याण वर्ष के चलते प्रदेश में दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने के लिए यह प्रयोग किया जा रहा है। गांव में गो-भैंस वंशीय पशुओं के नस्ल सुधार, सौ प्रतिशत टीकाकरण, पशुओं का खान-पान आदर्श रखने सहित अन्य मापदंडों का पालन करने पर कलेक्टर आदर्श ग्राम घोषित करेंगे। इससे पशुपालकों के बीच प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। बता दें कि देश के कुल दुग्ध उत्पादन में मप्र की भागीदारी अभी नौ प्रतिशत है, जिसे बढ़ाकर 20 प्रतिशत करन का लक्ष्य मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रखा है। इसी कड़ी में उत्पादन बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं। इसमें एक आदर्श पशु ग्राम योजना भी है। विभाग के प्रमुख सचिव उमाकांत उमराव ने बताया कि सभी कलेक्टर ऐसे गांव चिह्नित कर रहे हैं। इसमें सबसे अधिक जोर नस्ल सुधार और दुधारू पशुओं के खान-पान पर है। अधिकारियों का मानना है कि नए दुधारू पशु खरीद कर दुग्ध उत्पादन बढ़ाना महंगा है। पशुपालक इसके लिए आसानी से तैयार नहीं होंगे। इस कारण नस्ल सुधार और खान-पान के माध्यम से दुग्ध उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। दुग्ध उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) से अनुबंध किया है। बता दें कि मप्र अभी दुग्ध उत्पादन में देश में तीसरे नंबर पर है। प्रतिदिन लगभग साढ़े 12 लाख लीटर दुग्ध का उत्पादन हो रहा है। उत्पादन बढ़ाने के लिए गोरस एप भी पशुपालन विभाग ने बनाया है। इसमें नस्ल, आयु आदि जानकारी डालने पर पता चल जाता है कि दुधारू पशु को क्या और कितनी मात्रा में खिलाना चाहिए। इसी तरह से आदर्श ग्राम से सभी दुधारू पशुओं का बीमारियों से बचाव के लिए टीकाकरण भी किया जाएगा। इसका कारण यह कि संक्रमण से दुग्ध उत्पादन प्रभावित होता है।
गोरस एप में मिल रहीं सुविधाएं
पशुपालन एवं डेयरी विभाग ने गोरस मोबाइल एप विकसित किया है। इसके माध्यम से दुग्ध उत्पादकों को दूध की मात्रा, गुणवत्ता और भुगतान की जानकारी रियल टाइम में मिल सकेगी। साथ ही फील्ड फोर्स मॉनिटरिंग एप से मैदानी कर्मचारियों की निगरानी भी की जाएगी। यह पूरी तरह से हिंदी मोबाइल एप है, जिसे गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है। इंटरनेट सुविधा नहीं होने पर भी एप काम करता है। एप गाय, भैंस के लिए संतुलित आहार के बारे में सुझाव देगा। चारे का संयोजन चुन सकते हैं, कम से कम लागत में अधिकतम दूध उत्पादन मिलता है। एप में 28 से अधिक स्थानीय चारों की विस्तृत जानकारी दी गई है। मौसम और गर्भावस्था के अनुसार भी आहार का सुझाव यह एप देता है। गिर, साहीवाल, थारपारकर, मुर्रा, भदावरी एवं संकर नस्लों के लिए अलग-अलग मार्गदर्शन दिया गया है। पशुपालकों को संभावित आर्थिक लाभ और नस्ल सुधार के बारे में जानकारी मिलती है। मप्र में दुग्ध उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए राहत भरी पहल होने जा रही है। प्रदेश के करीब 7 हजार दुग्ध संग्रहण केंद्रों पर जल्द ही अत्याधुनिक ऑटोमेटिक मिल्क कलेक्शन मशीनें स्थापित की जाएंगी। इन मशीनों के जरिए दूध के वजन और गुणवत्ता की तुरंत जांच हो सकेगी, जिससे मिलावट और गड़बड़ी पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। नई व्यवस्था लागू होने के बाद किसानों को उनके दूध का सही मूल्य मिलेगा, वहीं उपभोक्ताओं तक बेहतर गुणवत्ता वाला दूध पहुंचाने का दावा किया जा रहा है। अभी कई स्थानों पर दूध की जांच और वजन की प्रक्रिया मैन्युअल होने के कारण विवाद और शिकायतें सामने आती रही हैं। नई मशीनों में दूध का वजन करने और उसकी गुणवत्ता जांचने की सुविधा एक साथ होगी। दूध संग्रहण केंद्र पर किसान जैसे ही दूध लेकर पहुंचेगा, मशीन तुरंत वजन दर्ज करेगी। हालांकि फैट समेत अन्य जांच पहले की तरह होगी। इस पूरी प्रक्रिया का डेटा ऑनलाइन दर्ज होगा और किसान मोबाइल एप के जरिए अपने दूध की जानकारी देख सकेगा। संग्रहण केंद्रों के संचालक और दुग्ध संघ के अधिकारी भी रियल टाइम डेटा मॉनिटर कर सकेंगे। वर्तमान व्यवस्था में कई केंद्रों पर दूध की गुणवत्ता जांच मैन्युअल तरीके से होती है। ऐसे में वजन और फैट की गणना को लेकर कई बार किसानों की शिकायतें सामने आती हैं। कुछ स्थानों पर गलत एंट्री और रिकॉर्ड में गड़बड़ी की शिकायतें भी मिलती रही हैं। नई मशीनों के आने से पारदर्शिता बढ़ेगी और भुगतान प्रक्रिया भी अधिक भरोसेमंद होगी। वहीं, दुग्ध उत्पादकों का कहना है कि कई बार भैंस के दूध को गाय का दूध बताकर कम कीमत देने जैसी शिकायतें सामने आती हैं। नई तकनीक लागू होने से इस तरह की समस्याओं पर अंकुश लगेगा और किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिल सकेगा। मप्र सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के एसीएस उमाकांत उमराव ने बताया कि दो से तीन महीने में यह मशीनें केंद्रों पर लग जाएगी। इससे दुग्ध की गुणवत्ता सुधरने के साथ ही किसानों और पशुपालकों को लाभ होगा।
गोबर से भी होगी किसानों की कमाई
मप्र में पशुपालन और डेयरी से जुड़े लाखों परिवारों के लिए अच्छी खबर है। राज्य सरकार ने डेयरी सेक्टर को मजबूत करने और पशुपालकों की कमाई बढ़ाने के लिए नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड के साथ बड़ा समझौता किया है। इस पहल का सबसे ज्यादा फायदा सांची दुग्ध संघ और उससे जुड़े पशुपालकों को मिलेगा। सरकार का मकसद साफ है कि दूध उत्पादन बढ़ाना, पशुओं की नस्ल सुधारना, दूध की गुणवत्ता बेहतर करना और किसानों की आय के नए रास्ते खोलना। आसान भाषा में कहें तो अब पशुपालन को सिर्फ पारंपरिक तरीके से नहीं, बल्कि तकनीक और आधुनिक सुविधाओं के सहारे आगे बढ़ाया जाएगा। मप्र सरकार ने डेयरी सेक्टर को नई दिशा देने के लिए 7 अहम बिंदुओं पर काम शुरू किया है। सबसे ज्यादा ध्यान प्रति पशु दूध उत्पादन बढ़ाने पर रहेगा। कम दूध देने वाले पशुओं के लिए नस्ल सुधार कार्यक्रम चलाया जाएगा, ताकि उनकी क्षमता बढ़ सके। इसके साथ ही दूध की गुणवत्ता जांच के लिए नई मशीनें और आधुनिक व्यवस्था लाई जाएगी। सरकार चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा पशुपालक सहकारी समितियों से जुड़ें, ताकि दूध खरीद की प्रक्रिया मजबूत हो और सही दाम मिल सके। इसके अलावा बेहतर चारा और फीड उपलब्ध कराने के लिए नए प्लांट लगाने की तैयारी भी की जा रही है। इस योजना के तहत पशुपालकों को आर्टिफिशियल इनसेमिनेशन, एम्ब्रियो ट्रांसफर और सैक्स सॉर्टेड सीमन जैसी आधुनिक तकनीकों का लाभ मिलेगा। इनसे अच्छी नस्ल के बछड़े और ज्यादा दूध देने वाले पशु तैयार होंगे। सरकार की योजना है कि ये सेवाएं गांव स्तर तक पहुंचें और पशुपालकों को घर के पास ही सुविधा मिल जाए। इससे छोटे किसानों और पशुपालकों को भी आधुनिक डेयरी तकनीक का फायदा आसानी से मिल सकेगा। इसका सीधा असर दूध उत्पादन बढऩे और आय मजबूत होने पर दिखेगा। पशुपालन को लाभकारी बनाने के लिए सरकार गांवों में पशु स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत करने पर भी काम कर रही है। पशु चिकित्सकों की उपलब्धता बढ़ाई जाएगी, ताकि इलाज, टीकाकरण और नियमित जांच समय पर हो सके। इसके साथ ही दूध बेचने के बाद भुगतान प्रक्रिया को डिजिटल और तेज बनाया जाएगा। नई व्यवस्था में पैसा सीधे पशुपालकों के खाते में पहुंचेगा, जिससे देरी और पारदर्शिता की समस्या कम होगी। यह कदम छोटे पशुपालकों के लिए काफी राहत भरा साबित हो सकता है। सरकार अब पशुपालकों की कमाई सिर्फ दूध तक सीमित नहीं रखना चाहती। इसलिए गोबर से बायोगैस और जैविक खाद बनाने की योजना पर भी जोर दिया जा रहा है। इससे किसानों को अतिरिक्त आय का नया जरिया मिलेगा और गांवों में ऊर्जा की जरूरत भी पूरी हो सकेगी। इस पूरे समझौते का सबसे बड़ा फायदा सांची दुग्ध संघ को मिलेगा। एनडीडीबी के सहयोग से इसकी खरीद, गुणवत्ता और संचालन व्यवस्था मजबूत होगी। इससे ज्यादा गांव और ज्यादा पशुपालक इससे जुड़ पाएंगे। गांवों की गलियों में सुबह का नजारा अब बदल चुका है। पहले जहां कुछ घरों से ही दूध की बाल्टियों की खनक सुनाई देती थी, अब हर तरफ नई उम्मीदों की आहट महसूस होती है। प्रदेश में डेयरी का काम अब सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि युवा और किसानों के लिए कमाई का बड़ा जरिया बन गया है। डेयरी प्लस योजना ने गांवों में रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई लहर पैदा कर दी है। इस योजना ने कई परिवारों को वह सहारा दिया है, जो उन्हें अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा करने के लिए जरूरी था। डेयरी प्लस योजना का सबसे बड़ा उद्देश्य ग्रामीण युवाओं और छोटे किसानों को स्थायी आमदनी का अवसर देना है। खेती का काम मौसम पर निर्भर होता है, लेकिन डेयरी ऐसा व्यवसाय है जिसे सालभर चलाया जा सकता है। सरकार का मानना है कि अगर हर गांव में छोटे स्तर पर भी डेयरी यूनिट खड़ी हो जाए, तो गांव में रोजगार खुद-ब-खुद बढऩे लगेगा। इस योजना के तहत पशुपालकों को गाय-भैंस खरीदने, शेड बनाने, चारा व्यवस्था और डेयरी संचालन के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। कई परिवार जो पहले आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे, वे अब दूध और डेयरी उत्पादों से स्थायी आमदनी हासिल कर रहे हैं। मप्र पशुपालन विभाग के अनुसार, इस योजना की खासियत इसका बड़ा अनुदान है, जिससे आर्थिक बोझ काफी कम हो जाता है। सामान्य और पिछड़ा वर्ग के पशुपालकों को 50 फीसदी तक अनुदान दिया जाता है, जबकि अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के पशुपालकों को 75 प्रतिशत तक सहायता प्रदान की जाती है। शेष राशि लाभार्थी खुद जमा करता है। यही वजह है कि जो लोग पहले डेयरी शुरू करने से डरते थे, अब आसानी से यह कदम उठा रहे हैं। अनुदान मिलने से शुरुआती लागत आधी से भी कम रह जाती है। पशुपालकों का कहना है कि इतना बड़ा सहारा मिलने से डेयरी का काम काफी आसान और लाभदायक हो गया है। कई परिवारों में तो दो पशु से शुरू हुआ काम आज बढक़र छोटे डेयरी यूनिट तक पहुंच गया है।
गांवों में बढ़ रहा डेयरी का दायरा
गांवों में डेयरी का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। दूध की बिक्री के साथ-साथ दही, घी और मावा जैसे उत्पादों से भी अच्छी कमाई हो रही है। मप्र पशुपालन विभाग बताता है कि गोबर से बन रही जैविक खाद गांवों में नई कमाई का माध्यम बन गई है। कई पशुपालक गोबर गैस प्लांट लगाकर अपने घरों में गैस का उपयोग कर रहे हैं, जिससे खर्च कम होता है और आमदनी बढ़ती है। पहले जहां सिर्फ दूध पर निर्भरता रहती थी, अब डेयरी एक बहुआयामी गतिविधि बन गई है। एक ही यूनिट से कई तरफ से लाभ मिल रहा है, जिससे ग्रामीण परिवारआर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं। योजना ने वास्तव में गांवों में छोटे स्तर पर भी उद्यमिता की नींव रखी है। योजना की आवेदन प्रक्रिया भी बेहद आसान बनाई गई है, जिससे युवाओं में उत्साह तेजी से बढ़ा है। मप्र पशुपालन विभाग के अनुसार, अब आवेदन ऑनलाइन किए जा सकते हैं और दस्तावेज कम लगते हैं। इससे गांवों के युवा डेयरी को एक स्थायी करियर की तरह देखने लगे हैं। दूध की बढ़ती मांग, सरकार की सहायता और आसान प्रक्रिया-इन तीनों ने मिलकर डेयरी को सबसे तेजी से बढऩे वाला ग्रामीण व्यवसाय बना दिया है। कई जगहों पर दूध उत्पादन पिछले कुछ सालों की तुलना में काफी बढ़ा है, जिससे किसान और युवा दोनों खुश हैं। विभाग का मानना है कि आने वाले समय में यह योजना प्रदेश को डेयरी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
अगर आपकी भैंस देसी नस्ल की है और आप उससे ज्यादा दूध देने वाली अच्छी नस्ल तैयार करना चाहते हैं, तो अब यह काम आसान हो गया है। मप्र सरकार की समुन्नत पशु प्रजनन योजना के तहत पशुपालकों को उच्च वंशावली का मुर्रा पड़ा (सांड) दिया जा रहा है। इस योजना का मकसद देसी भैंसों की नस्ल सुधारना, दूध उत्पादन बढ़ाना और पशुपालकों की कमाई मजबूत करना है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसकी कीमत का 75 प्रतिशत हिस्सा सरकार देती है, जबकि लाभार्थी को सिर्फ 25 प्रतिशत अंशदान देना होता है। सरकारी यूनिट लागत 45,000 रुपये तय है। मप्र पशुपालन विभाग के अनुसार, इस योजना के तहत पशुपालक को एक उन्नत नस्ल का मुर्रा सांड दिया जाता है। इसका इस्तेमाल देसी भैंसों के प्रजनन के लिए किया जाता है, जिससे अगली पीढ़ी में अच्छी नस्ल की पडिय़ा और पड़े तैयार होते हैं। इससे भैंसों का दूध उत्पादन बढ़ता है और आने वाले समय में पशुपालक को बेहतर नस्ल के पशु भी मिलते हैं। सरकारी जानकारी के अनुसार इसकी कुल लागत 45,000 रुपये है। इसमें से 33,750 रुपये सरकार अनुदान के रूप में देती है, जबकि पशुपालक को सिर्फ 11,250 रुपये जमा करना होता है। यह योजना छोटे और मध्यम पशुपालकों के लिए बहुत फायदेमंद मानी जा रही है। इस योजना की अच्छी बात यह है कि इसमें सभी वर्गों के किसान और पशुपालक आवेदन कर सकते हैं। एससी, एसटी, ओबीसी और सामान्य वर्ग-सभी के लिए 75 फीसदी अनुदान का प्रावधान है। हालांकि सरकारी पात्रता के अनुसार पशुपालक के पास आमतौर पर कम से कम 5 भैंसें होना जरूरी माना जाता है, ताकि नस्ल सुधार का सीधा फायदा दिख सके। यह योजना खासकर उन पशुपालकों के लिए बहुत उपयोगी है जो दूध का व्यवसाय बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन अच्छी नस्ल के सांड की ऊंची कीमत के कारण खरीद नहीं कर पाते। मुर्रा नस्ल अपनी बेहतर दूध क्षमता और मजबूत जेनेटिक क्वालिटी के लिए जानी जाती है। जब देसी भैंसों का प्रजनन मुर्रा सांड से होता है, तो अगली पीढ़ी में दूध देने की क्षमता काफी बढ़ जाती है। यही वजह है कि यह योजना सीधे पशुपालकों की आय बढ़ाने से जुड़ी हुई है। सरकार हर साल ब्लॉक स्तर पर लक्ष्य तय करती है और उसी हिसाब से आवेदन लिए जाते हैं। इसलिए पशुपालकों को सलाह है कि नजदीकी पशु चिकित्सालय में समय रहते आवेदन जरूर करें। सीधी बात यह है कि सिर्फ 25 फीसदी खर्च में हाई नस्ल का मुर्रा सांड मिलना दूध और मुनाफा दोनों बढ़ाने का शानदार मौका है
