
- मोहन सरकार का एक और कमाल…
मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उनकी सरकार जो नवाचार करती है, वह पूरे देश में मिसाल बन जाती है। मप्र सरकार ने जल संरक्षण और प्रबंधन के लिए चलाए जा रहे जल गंगा संवर्धन अभियान में देश में पहला स्थान पाकर अपनी कर्तव्य निष्ठा की मिसाल कायम की है।
गौरव चौहान/ बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)। मप्र ने जल संरक्षण और प्रबंधन के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल की है। भारत सरकार के जल संचय भागीदारी अभियान के तहत मप्र अब पूरे देश में पहले नंबर पर पहुंच गया है। बीते 5 मार्च तक मप्र इस सूची में छठे स्थान पर था, लेकिन मुख्यमंत्री द्वारा जल गंगा संवर्धन अभियान की निरंतर समीक्षा और जन-भागीदारी को प्रोत्साहित करने के परिणामस्वरूप प्रदेश ने रैंकिंग में यह लंबी छलांग लगाई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बताया कि सामुदायिक सहभागिता पर आधारित जल प्रबंधन के मामले में मप्र पूरे देश के सामने एक श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। इस अभियान की सफलता में जिलों का योगदान भी सराहनीय रहा है, जहां राष्ट्रीय स्तर की रैंकिंग में डिंडौरी जिला पहले और खंडवा जिला दूसरे स्थान पर रहा है। प्रदेश में इस महाअभियान के तहत 16 सरकारी विभागों की 82 प्रमुख गतिविधियों को चिन्हित किया गया है, जिसके माध्यम से जल संरचनाओं के पुनर्जीवन और नए जल स्रोतों के निर्माण पर युद्ध स्तर पर कार्य किया जा रहा है। अभियान के तहत न केवल ग्रामीण बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी बड़े स्तर पर काम किए जा रहे हैं। वन भूमि पर होने वाले जल संरक्षण कार्यों को गति देने के लिए एक विशेष ऑनलाइन ऐप भी विकसित किया गया है, जिससे अनुमति की प्रक्रिया सुगम और पारदर्शी हो गई है। जानकारी के अनुसार, जल गंगा संवर्धन अभियान में पूरे अभियान के लिए 6,630 करोड़ रुपए का वित्तीय लक्ष्य निर्धारित किया गया है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत खंडवा जिला प्रदेश में पहले, खरगोन दूसरे और डिंडौरी तीसरे स्थान पर है। अभियान में फार्म पॉन्ड, अमृत सरोवर और पुराने मनरेगा कार्यों को पूर्ण करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। गर्मी की दस्तक के साथ ही प्रदेश में लोगों को जल संकट की आहट सुनाई देने लगी है। इस बीच केंद्र सरकार की ताजा रिपोर्ट में मप्र के लिए एक सुखद खबर आई है कि राज्य में जमीन के नीचे के पानी (ग्राउंड वाटर) की स्थिति में पिछले 10 सालों के मुकाबले बड़ा सुधार हुआ है। लोकसभा में जल शक्ति मंत्रालय द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, मप्र के 82.82 प्रतिशत निगरानी कुओं में पानी का स्तर बढ़ा है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत (73.25 प्रतिशत) से भी काफी ज्यादा है। लोकसभा में पेश की गई डायनामिक ग्राउंड वॉटर असेसमेंट रिपोर्ट 2025 के अनुसार, मप्र उन राज्यों की सूची में ऊपर है, जहां पानी बचाने के प्रयास सफल हो रहे हैं। अगर तुलना की जाए, तो मप्र की स्थिति राजस्थान, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों से काफी अच्छी है। जहां देश के कई हिस्सों में पानी का बहुत ज्यादा दोहन (जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल) चिंता का विषय है, वहीं मप्र के 317 सरकारी ब्लॉकों में से 221 ब्लॉक (लगभग 70 प्रतिशत) पूरी तरह सुरक्षित श्रेणी में हैं। इसका मतलब है कि इन इलाकों में उतना पानी जमीन के अंदर वापस जा रहा है जितना बाहर निकाला जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, 221 ब्लॉक सुरक्षित श्रेणी में हैं, यहां पानी की स्थिति अच्छी है। 64 ब्लॉक अर्ध गंभीर श्रेणी में हैं, यहां थोड़ी सावधानी की जरूरत है। वहीं 6 ब्लॉक गंभीर श्रेणी हैं, यहां जलस्तर गिर रहा है। जबकि 26 ब्लॉक अति-दोहित श्रेणी में हैं, यहां पानी का संकट है और सुधार की तुरंत जरूरत है। जल गंगा संवर्धन अभियान की अवधारणा जनसहभागिता से जल संरक्षण और संवर्धन पर केन्द्रित है। इस अभियान के अंतर्गत नवीन जल संग्रहण संरचनाओं के साथ साथ पूर्व से मौजूद जल संग्रहण संरचनाओं का जीर्णोद्धार, जल स्त्रोतों और जल वितरण प्रणालियों की साफ सफाई, जल स्त्रोतों के आस पास पौध रोपण के कार्य प्राथमिकता पर किये जायेगें। समाज की सहभागिता के लिए जल संरक्षण जागरूता के कार्यक्रम आयोजित किये जाये। संपूर्ण अभियान को इस तरह से नियोजित किया जाये जिससे यह अभियान समाज और सरकार की सहभागिता से जल संरक्षण व संवर्धन का जन आंदोलन बन सके।
सरकारी योजनाएं बनी कारगर
मप्र में भूजल स्तर में बढ़ोत्तरी की मुख्य वजह सरकार की स्कीम और पब्लिक के प्रयास हैं। अटल भूजल योजना ने प्रदेश के पानी की कमी वाले इलाकों में कमाल किया है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में इस योजना की वजह से भूजल गिरावट की रफ्तार में 5 मीटर प्रति वर्ष तक की कमी आई है। लगभग 13,493 हेक्टेयर खेती की जमीन को नई सिंचाई पद्धतियों (जैसे ड्रिप सिंचाई) से जोड़ा गया है ताकि कम पानी में ज्यादा पैदावार हो सके। वहीं अमृत सरोवर और तालाब के तहत राज्य में 2,901 अमृत सरोवर (नए या सुधारे गए तालाब) बनाए गए हैं। ये तालाब बारिश के पानी को रोककर जमीन के अंदर भेजने का काम कर रहे हैं। जल शक्ति अभियान से राज्य में करीब 5 लाख से ज्यादा जल संरक्षण के काम (जैसे चेक डैम, मेढ़ बंधान और सोखता गड्ढ़े) किए गए हैं, जिनका सीधा फायदा जमीन के जलस्तर को मिला है। भले ही पानी की मात्रा बढ़ रही है, लेकिन पानी की गुणवत्ता को लेकर एक नई चिंता सामने आई है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार, मप्र के 55 में से 39 जिलों में भूजल में नाइट्रेट की मात्रा अधिक पाई गई है। मामले में मप्र, उप्र के बाद देश में दूसरे नंबर पर है। इसका मुख्य कारण खेती में यूरिया जैसे खादों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल और शहरों में सीवेज (गंदे पानी) के सही निपटान की कमी है। मप्र के कुल 317 सरकारी ब्लॉकों में से 221 ब्लॉक पूरी तरह सुरक्षित हैं। इसका मतलब यह है कि इन इलाकों में हम उतना ही पानी निकाल रहे हैं, जितना बारिश या अन्य तरीकों से जमीन के अंदर वापस जा रहा है। हालांकि, मालवा अंचल के इंदौर, उज्जैन, शाजापुर में अब भी चुनौती बनी हुई है। इंदौर जैसे औद्योगिक और घनी आबादी वाले क्षेत्रों को क्रिटिकल या गंभीर श्रेणी में रखा है, जहां पानी का दोहन 80 प्रतिशत से ज्यादा है। वहीं मप्र में जल जीवन मिशन के तहत चल रही एकल नल जल योजनाओं को तेजी से पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। संभावना जताई जा रही है कि इस माह एकल नल जल योजनाएं पूरी हो जाएंगी, जिसके बाद पानी की आपूर्ति सुचारू रूप से शुरू कर दी जाएगी। हालांकि, इन योजनाओं के संचालन और रखरखाव के लिए ग्रामीणों को अब पानी मुफ्त में नहीं मिलेगा, बल्कि उन्हें हर महीने 100 रुपए (या पंचायत द्वारा निर्धारित रखरखाव शुल्क) देना होगा। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2019 को जल जीवन मिशन की घोषणा की थी। केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन की डेडलाइन मार्च, 2024 रखी थी। चूंकि इस अवधि में अधिकतर राज्यों में जल जीवन मिशन का काम पूरा नहीं हो पाया, इस कारण केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन 2.0 के रूप में पुनर्गठित कर देश में मिशन की अवधि दिसंबर, 2028 तक बढ़ा दी है। गौरतलब है कि प्रदेश में जल जीवन मिशन में दो तरह की योजनाओं (एकल नल जल और समूह नल जल) पर काम चल रहा है। प्रदेश में एकल नल जल योजनाओं की संख्या 28 हजार से ज्यादा है। एकल नल जल योजनाओं का 98 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अप्रैल के अंत तक एकल नल जल योजनाओं का काम पूरा कर लिया जाएगा। पूर्व में इसकी डेडलाइन दिसंबर, 2025 और फिर मार्च, 2026 निर्धारित की गई थी। समूह नल जल योजनाओं की कुल संख्या 147 है। समूह नल जल योजनाओं का करीब 70 प्रतिशत काम पूरा हो गया है। समूह नल जल योजनाओं का काम पूरा करने की डेडलाइन मार्च, 2027 निर्धारित है।
जल स्रोतों का पुनर्जीवन
पानी इंसानी जीवन के लिए बुनियादी जरूरत है, हमने लंबे समय से इस बहुमूल्य संसाधन का अत्यधिक दोहन किया है, जिसके परिणामस्वरूप पानी के पारिस्थितिकी तंत्र जंगलों की तुलना में तीन गुना तेजी से लुप्त हो रहे हैं। भारत, जहां दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी रहती है, के पास वैश्विक पानी के संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत हिस्सा है। यह असंतुलन पानी के कुशल प्रबंधन, संरक्षण और न्यायसंगत वितरण की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है। मप्र में प्रमुख नदियों नर्मदा, ताप्ती, माही, गोदावरी (वैनगंगा) का उद्गम के साथ में बेतवा , केन, तवा नदियों के साथ अन्य बहुत नदियां, सैंकड़ों झीलें झरने और तालाब है। इन सबके बाबजूद, मप्र उन राज्यों में से एक है, जो गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। राज्य मुख्य रूप से कृषि प्रधान है, जहाँ कृषि आबादी के एक बड़े हिस्से की आजीविका का मुख्य स्रोत है। हालांकि, राज्य मे पानी की कमी, गिरते भूजल स्तर और अव्यवस्थित जल प्रबंधन प्रथाओं से जूझ रहा है। नीति आयोग द्वारा जून 2018 में प्रकाशित समग्र जल प्रबंधन सूचकांक नामक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि भारत अपने इतिहास के सबसे भीषण जल संकट से गुजर रहा है और लगभग 6 करोड़ लोग अत्यधिक जल संकट का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में 120वें स्थान पर है, जहां लगभग 70 प्रतिशत जल दूषित है। नीति आयोग की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार मप्र में इंदौर , रतलाम के सहित भारत के 21 प्रमुख शहरों में 2030 तक भूजल समाप्त हो जाने की आशंका है। यह देश के लिए चिंताजनक स्थिति है, जहां अर्थव्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाली कृषि, सिंचाई के लिए भूजल पर बहुत अधिक निर्भर है। इससे 10 करोड़ लोग प्रभावित होंगे और इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि भारत की 40 प्रतिशत आबादी को पीने के पानी तक पहुंच नहीं होगी, जो वास्तव में एक भयावह समस्या होगी। मप्र में जल संकट में योगदान देने वाले प्रमुख कारकों में से एक कृषि उद्देश्यों के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन है। किसान सिंचाई के लिए भूजल पर बहुत अधिक निर्भर हैं, जिससे भूजल स्तर में कमी आ रही है और कुएं सूख रहे हैं। इसके अतिरिक्त, शहरीकरण एवं पारंपरिक जल संसाधनो की अनदेखी, अनियमित वर्षा और जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। जल-संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए एक पूर्णतावादी दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो जल प्रबंधन के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आयामों को ध्यान में रखे। जल संरक्षण करना हमारी सदियों पुरानी परंपरा रही है। इसी बात को तथ्य और कहानी के रुप में सुंदर बयां करती है, अनुपम मिश्र जी की किताब आज भी खरे हैं तालाब, जरूर पढि़एगा। वो लिखते हैं- महाभारत काल के तालाबों में कुरुक्षेत्र का ब्रह्मासर, करनाल की कर्णझील और मेरठ के पास हस्तिानपुर में शुक्रताल आज भी हैं और पर्वों पर यहाँ लाखों लोग इक_े होते हैं। रामायण काल के तालाबों में श्रृंगवेरपुर का तालाब प्रसिद्ध रहा है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के निदेशक बीबी लाल ने पुराने साक्ष्य के आधार पर इलाहाबाद से 60 किलोमीटर दूर खुदाई कर इस तालाब को ढूँढ़ निकाला है। श्री लाल के अनुसार यह तालाब ईसा पूर्व सातवीं सदी में बना था- यानी आज से 2700 बरस पहले। श्रृंगवेरपुर के तालाब का संक्षिप्त विवरण गांधी शांति प्रतिष्ठान से प्रकाशित पुस्तक हमारा पर्यावरण (1988) में तथा विस्तृत विवरण नई दिल्ली के सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट द्वारा देश में जल संग्रह के परंपरागत तरीकों पर अक्तूबर 1990 में आयोजित गोष्ठी में श्रीलाल द्वारा अंग्रेजी में प्रस्तुत लेख में उपलब्ध है। समाज के द्वारा जल संरक्षण के उत्कृष्ठ प्रयास और उपेक्षा से सभी परिचित है। देश के जल संसाधनों को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, जल शक्ति मंत्रालय ने पहली बार जल निकायों की गणना कराई। इस गणना के नतीजों से पूरे देश में जल निकायों की स्थिति और उनके वितरण के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। गणना के अनुसार, कुल 24,24,540 जल निकायों में से तालाबों की संख्या सबसे ज़्यादा 59.5 प्रतिशत (14,42,993) है; इसके बाद टैंक 15.7 प्रतिशत (3,81,805), जलाशय 12.1 प्रतिशत (2,92,280), जल संरक्षण संरचनाएँ (जैसे परकोलेशन टैंक और चेक डैम) 9.3 प्रतिशत (2,26,217), झीलें 0.9 प्रतिशत (22,361) और अन्य 2.5 प्रतिशत (58,884) हैं। 80के दशक से सरकारी तंत्र में जल संरक्षण के ऊपर ज्यादा ध्यान दिया गया, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की तहत इस काम को और मजबूती मिली।
अमृत सरोवर योजना
अमृत सरोवर एक और अच्छा मुहिम था इस कड़ी को आगे बढ़ाने में। आज के समय में भूतल जल की मांग दिन पर दिन बढ़ रही है। राष्ट्रीय जल नीति, 1987, संशोधन नियम 2002 एबं 2012 में एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन, संरक्षण और पानी के समान वितरण की आवश्यकता, वैज्ञानिक आधार पर भूजल संसाधनों का मूल्यांकन पर जोर दिया गया है। मप्र की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। राज्य में दर्ज 82,643 जल निकायों में से, वर्तमान में केवल 37,257 ही उपयोग में हैं, जबकि 45,386 जल निकाय अप्रयुक्त पड़े हैं। इसका मतलब है कि विभिन्न कारणों से लगभग 54.91 प्रतिशत जल निकाय बेकार पड़े हैं, जो जल संसाधन प्रबंधन में एक गंभीर कमी का संकेत है। पीने के लिए सुरक्षित पानी और स्वच्छता को एक महत्वपूर्ण सूचक के रूप में माना जाना चाहिए और इसके बाद अन्य के लिए प्राथमिकता के साथ आवंटन किया जाना चाहिए। घरेलू जरूरतें (जानवरों की ज़रूरतों सहित), खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने के लिए कृषि एबं अन्य जीविका एबं उद्योग का समर्थन करना की जरूरतें। केंद्रीय भूमिजल बोर्ड 2023 के रिपोर्ट के आधार पर आज भूतल जल का 87 प्रतिशत सिंचाई, 11त्न घेरलू उपयोग और 2 प्रतिशत उद्योग में उपयोग किया जाता है। जल संसाधन की सहभागी सुप्रशासन और मांग-आपूर्ति प्रबंधन सुनिश्चित करने के महत्वपूर्ण भूमिका है। केंद्रीय भूमिजल बोर्ड (सी जी डबल्यू बी ) भूतल जल के रिपोर्ट 2023 में यह कहा की मप्र में 317 ब्लॉक के भूतल जल असेसमेंट में से 60 ब्लॉक सेमी क्रिटिकल, 5 ब्लॉक क्रिटिकल और 26 ब्लॉक में ओवर एक्सप्लोटाइटेड है। इस चुनौती से निपटने के लिए सामुदायिक नेतृत्व वाली देखरेख की ओर बदलाव की आवश्यकता है। स्थानीय समुदायों को जल निकायों की योजना बनाने, उनके जीर्णोद्धार और प्रबंधन में सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इस तरह के सहभागी दृष्टिकोण न केवल स्थिरता सुनिश्चित करते हैं, बल्कि अपनेपन और जवाबदेही की भावना को भी बढ़ावा देते हैं। जल प्रशासन में लैंगिक दृष्टिकोण को शामिल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। महिलाएँ, जो अक्सर घरेलू स्तर पर पानी की प्राथमिक उपयोगकर्ता और प्रबंधक होती हैं, उन्हें जल संसाधन योजना और प्रबंधन से संबंधित निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में अपनी बात रखने का अधिकार मिलना चाहिए। कृषि, जो भूजल संसाधनों का लगभग 87 प्रतिशत उपभोग करती है, इस चर्चा में एक केंद्रीय भूमिका निभाती है। मप्र जैसे राज्य में, जहां कृषि राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में लगभग 43-47 प्रतिशत का योगदान देती है,जो अधिक भूजल उपयोग की मांग को उत्पन्न करती है। जिन ब्लॉक को सेमी क्रिटिकल से ओवर एक्सप्लोटाइटेड गंभीर भूजल क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया गया है, वहां अलग तरह की योजना बनाने की तत्काल आवश्यकता है। फसल के लिए जल बजट को बढ़ावा देना और कम पानी की ज़रूरत वाली फसलों की खेती सहित फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना इस बोझ को कम करने में मदद कर सकता है। इसके अलावा, ऐसी फसलों के लिए विशेष न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ- साथ किसानों की आय को सुरक्षित रखने के लिए प्रोत्साहन राशि जैसी सुविधाओं को भी शुरू किया जाना चाहिए। जल निकाय न केवल मानव उपयोग के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे वन्यजीवों और जलीय जैव विविधता को सहारा देने वाले महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में भी काम करते हैं। इसलिए, जीर्णोद्धार के प्रयासों में स्थानीय जलीय प्रजातियों और पारिस्थितिक संतुलन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके अलावा, संरक्षण रणनीतियों का विस्तार केवल जल निकायों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें नदियों और धाराओं के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों का जीर्णोद्धार भी शामिल होना चाहिए। इन स्रोत क्षेत्रों की सुरक्षा, निचले जल प्रणालियों के स्वास्थ्य और दीर्घायु को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक, भू-दृश्य-आधारित योजना के साथ मिलाना आगे बढऩे का एक आशाजनक मार्ग प्रदान करता है। भारत की जल संरक्षण प्रथाओं की समृद्ध विरासत, जब आधुनिक दृष्टिकोणों के साथ जोड़ी जाती है, तो यह लचीली और टिकाऊ जल प्रणालियों के निर्माण में मदद कर सकती है। चुनौती बहुत बड़ी है, लेकिन अवसर भी उतना ही बड़ा है। जल निकायों को प्रभावी ढंग से पुनर्जीवित करना और उनका प्रबंधन करना, आने वाली पीढिय़ों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, आजीविका को सहारा दे सकता है और पारिस्थितिक संतुलन को बहाल कर सकता है। अब कार्रवाई करने का समय आ गया है। यह रिपोर्ट हमें सतर्क और दीर्घ कालीन प्रंबधन , साथ में जल को सामुहिक संसाधन के रूप में देखने की ओर इशारा कर रही है। मप्र में जल संकट को दूर करने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें नीतिगत हस्तक्षेप, तकनीकी समाधान और सामुदायिक भागीदारी शामिल हो।
जनसामान्य की पहल से जल संरक्षण
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि जल ही जीवन है और जल संरक्षण ही सुरक्षित भविष्य की सबसे मजबूत नींव है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रेरक मार्गदर्शन में जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत पानी को सहेजने के कार्य में जन-जन को जोड़ा जा रहा है। मध्यप्रदेश में जनभागीदारी आधारित जल संचय अभियान में राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। यह उपलब्धि केवल एक रैंक नहीं बल्कि प्रदेशवासियों की जागरूकता, सहभागिता और भविष्य के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। जल संरक्षण और प्रकृति अनुरूप रहन-सहन की व्यवस्था भारतीय जीवनशैली और परम्पराओं में सदियों से रची-बसी है। हमारे यहां नदी-तालाब-कुंओं की साफ-सफाई को पुण्य कार्य माना गया है। इन गतिविधियों के धार्मिक महत्व को देखते हुए गंगा दशहरा 25 मई को जल स्त्रोतों के आस-पास साफ-सफाई और पौधरोपण के लिए श्रमदान तथा अन्य गतिविधियां संचालित की जाएंगी। इन गतिविधियों का पुण्य प्राप्त करने के लिए अधिक से अधिक नागरिक गंगा दशहरा पर अपने आस-पास के जल स्त्रोतों और जल संरचनाओं की साफ-सफाई तथा रखरखाव के कार्य से जुड़ें। जनसामान्य की यह पहल मध्यप्रदेश को जल संरक्षण में एक आदर्श व अनुकरणीय राज्य के रूप में देश में प्रस्तुत करेगी। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि जल संचय भागीदारी अभियान में मध्यप्रदेश राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम रहा है। अभियान के अंतर्गत प्रदेश में 5 लाख 64 हजार 119 कार्य पूर्ण हुए हैं। जिला स्तर पर डिण्डौरी और खण्डवा जिले देश में क्रमश: प्रथम और द्वितीय रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि आने वाली पीढिय़ों को बेहतर, सुरक्षित और सस्टेनेबल धरती सौंपना हमारा दायित्व है, जो बिना पर्याप्त जल की उपलब्धता के संभव नहीं है। अत: जल संरक्षण के कार्य में जन-जन को जोडऩा जरूरी है। उन्होंने पंचायतों, नगरीय निकायों, सामाजिक-धार्मिक संगठनों, स्वंयसेवी संस्थाओं, स्व-सहायता समूहों, व्यापारिक संगठनों तथा अन्य सभी संस्थाओं से पानी बचाने की गतिविधियों में जुडऩे का आहवान किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि पानी बचाने और जल स्त्रोतों की बेहतरी के लिए पारिवारिक और व्यक्तिगत स्तर पर पहल करने के लिए भी लोग आगे आएं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत राज्य सरकार, नगरीय और ग्राम स्तर पर अनेक गतिविधियां संचालित कर रही है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने 2 लाख 43 हजार 887 कार्यों के लिए 6 हजार 232 करोड़ रूपए की स्वीकृति प्रदान की है। प्रदेश में 45 हजार 132 खेत-तालाब, 68 अमृत सरोवर, 77 हजार 975 डगवेल रिचार्ज औ वॉटर शेड से संबंधित 3 हजार 346 कार्य पूर्ण किए जा चुके हैं। नगरीय क्षेत्र में भी तालाबों, कुंओं, बावडिय़ों को अतिक्रमण मुक्त करने, नाले-नालियों की साफ-सफाई आदि का कार्य जारी है। नगरीय निकायों द्वारा 3 हजार 40 रेन वॉटर हार्वेस्टिंग इकाईयां स्थापित की गई हैं। जन सहयोग से बड़े पैमाने पर प्याऊ सेवा संचालित की जा रही हैं। स्कूल, कॉलेजों और जन अभियान परिषद से जुड़ी संस्थाओं के माध्यम से जन-जन को अभियान से जोडऩे के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
