कृषि वर्ष में किसान बेहाल, रबी प्लानिंग पर अफसरों का पहरा

किसान
  • कम बारिश से 5 से 10 फीसदी तक घट सकता है रबी का रकबा
    भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। प्रदेश सरकार वर्ष 2026 को कृषि वर्ष के रूप में मना रही है, लेकिन किसानों के सामने रबी सीजन की तैयारियों को लेकर मुश्किलें खड़ी हैं। कम बारिश के कारण खेतों में नमी कम है और किसान समय पर बोवनी करना चाहते हैं, लेकिन उनकी जरूरतों के हिसाब से सरकारी रबी प्लान अब तक तैयार नहीं हो पाया है। हैरानी यह है कि जिस कृषि वर्ष में खेती को लेकर बड़े दावे किए जा रहे हैं, उसमें किसानों की जरूरतों का रोडमैप बनाने वाली संभागीय बैठकें ही अधूरी हैं।
    प्रदेश के तीन संभागों में कृषि उत्पादन आयुक्त (एपीसी) की बैठक होना बाकी है। रीवा और शहडोल में 4 नवंबर तथा सागर में 5 नवंबर को बैठक प्रस्तावित है। इन बैठकों के बाद ही रबी प्लान को अंतिम रूप दिया जाएगा। तब तक कई जिलों में किसान चना और सरसों की बोवनी शुरू कर चुके हैं, जबकि गेहूं के लिए खेत भी तैयार किए जा रहे हैं।
    हर साल बनते हैं दो प्लान, इस बार देरी
    प्रदेश में खरीफ और रबी सीजन के लिए हर साल अलग-अलग कृषि प्लान तैयार किए जाते हैं। इसमें बारिश के मौसम की फसलों के लिए खरीफ और ठंड के मौसम की फसलों के लिए रबी योजना बनाई जाती है। इसमें संभावित उत्पादन, फसलों का रकबा, खाद-बीज की जरूरत, कीटनाशकों की उपलब्धता और सिंचाई के पानी का पूरा आकलन शामिल रहता है। कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में संभागवार बैठकें होती हैं। इनमें संबंधित विभागों के अधिकारी किसानों की जरूरतों और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर प्रस्ताव रखते हैं। इसके बाद प्लान को अंतिम रूप दिया जाता है। इस बार यही प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो सकी।
    गेहूं और गन्ने से भी दूरी बना रहे किसान
    पानी की कमी का असर फसल चयन पर भी दिखने लगा है। गेहूं और गन्ने जैसी अधिक पानी की जरूरत वाली फसलों से कुछ किसान दूरी बना रहे हैं। नरसिंहपुर, बैतूल और छिंदवाड़ा सहित कई जिलों में किसानों ने इस बार गन्ने की फसल लेने से इनकार किया है। किसान अगले साल की फसल के लिए निजी मिल संचालकों के साथ अनुबंध भी नहीं कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में कम बारिश और सिंचाई के सीमित संसाधनों के कारण किसान जोखिम लेने से बच रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक समय पर पानी और जरूरी कृषि आदान उपलब्ध नहीं हुए तो इसका असर सिर्फ बोवनी पर नहीं, बल्कि उत्पादन और किसानों की आय पर भी पड़ सकता है।
     अफसरों की तैयारी कागजों पर
    रबी प्लान में फसलवार संभावित रकबा, खाद-बीज और कीटनाशकों की जरूरत, उनकी उपलब्धता तथा सिंचाई के पानी का आकलन किया जाता है। इसी आधार पर किसानों को समय रहते सलाह दी जाती है कि किस क्षेत्र में कौन-सी फसल लेना बेहतर रहेगा। लेकिन इस बार यह प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो सकी। किसानों की शिकायत है कि खाद जरूरत के मुताबिक नहीं मिल रही है। बीज की व्यवस्था उन्हें खुद करनी पड़ रही है और बाजार में कई गुना कीमत चुकानी पड़ रही है। कीटनाशकों की उपलब्धता को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। दूसरी तरफ अफसरों का दावा है कि 4.50 लाख मीट्रिक टन यूरिया, 2 लाख टन डीएपी और 1 लाख टन एनपीके खाद बांटी जा चुकी है। खाद सहकारी समितियों तक पहुंचना शुरू हो गई है।
    कम बारिश से रबी का रकबा घटने का खतरा
    प्रदेश में सामान्य तौर पर 1.05 से 1.20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में रबी फसलों की बोवनी होती है। इस बार कम बारिश के कारण रबी का रकबा 5 से 10 फीसदी तक घटने की आशंका है। कई इलाकों में खेतों में पर्याप्त नमी नहीं है। किसानों के पास पलेवा और एक बार सिंचाई के लिए ही पानी उपलब्ध है, जबकि फसलों को उनकी स्थिति के अनुसार दो से तीन बार पानी की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में किसान लागत और संभावित उत्पादन का हिसाब लगाकर फसल चुनने को मजबूर हैं। जिन खेतों में सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, वहां किसान बोवनी टालने या कम रकबे में फसल लेने पर विचार कर रहे हैं।

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