- पांच साल में 12 फीसदी तक लाना होगा नुकसान
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मध्य प्रदेश की बिजली वितरण कंपनियों के लिए आने वाले पांच साल चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं। मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने वित्त वर्ष 2027-28 से 2031-32 तक वितरण कंपनियों के तकनीकी एवं वाणिज्यिक बिजली नुकसान यानी लाइन लॉस को हर साल कम करने के लक्ष्य तय किए हैं। इसके तहत डिस्कॉम को केवल बिजली आपूर्ति बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि वितरण व्यवस्था में होने वाली बिजली की हानि को लगातार कम करने पर भी फोकस करना होगा। आयोग के प्रस्तावित लक्ष्यों में सबसे बड़ी कमी सेंट्रल और ईस्ट डिस्कॉम के लिए तय की गई है। ईस्ट डिस्कॉम को पांच साल में अपना लाइन लॉस 23 प्रतिशत से घटाकर 12 प्रतिशत करना होगा, जबकि सेंट्रल डिस्कॉम को 24.50 प्रतिशत से घटाकर 12.03 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य दिया गया है। यानी दोनों कंपनियों को बिजली नुकसान में करीब 11 से 12.50 प्रतिशत अंक तक की कमी लानी होगी।
ईस्ट डिस्कॉम के लिए 2027-28 में लाइन लॉस का लक्ष्य 23 प्रतिशत रखा गया है। इसके बाद हर साल इसमें कमी करनी होगी। वर्ष 2028-29 में इसे 22 प्रतिशत, 2029-30 में 18 प्रतिशत, 2030-31 में 14 प्रतिशत और 2031-32 में 12 प्रतिशत तक लाना होगा। इस तरह पांच साल में कंपनी को अपने नुकसान में कुल 11 प्रतिशत अंक की कमी करनी होगी। खास बात यह है कि शुरुआत में कमी अपेक्षाकृत कम रखने के बाद अगले वर्षों में लक्ष्य तेजी से नीचे लाया गया है। इससे संकेत मिलता है कि डिस्कॉम को वितरण नेटवर्क मजबूत करने के साथ बिजली चोरी, मीटरिंग और बिलिंग से जुड़े मामलों पर भी प्रभावी नियंत्रण करना होगा।
सेंट्रल डिस्कॉम के सामने सबसे बड़ी चुनौती
सेंट्रल डिस्कॉम के लिए लाइन लॉस घटाने का लक्ष्य और अधिक कड़ा रखा गया है। वर्ष 2027-28 में नुकसान का लक्ष्य 24.50 प्रतिशत निर्धारित किया गया है। इसे 2028-29 में 22.57 प्रतिशत, 2029-30 में 18.09 प्रतिशत, 2030-31 में 14.03 प्रतिशत और 2031-32 में 12.03 प्रतिशत तक लाना होगा। अर्थात पांच साल में करीब 12.47 प्रतिशत अंक की कमी करनी होगी। लक्ष्य को देखते हुए कंपनी को वितरण लाइनों, ट्रांसफार्मर, सब-स्टेशन और मीटरिंग व्यवस्था में सुधार के साथ वाणिज्यिक नुकसान पर भी लगातार काम करना पड़ेगा।
वेस्ट डिस्कॉम को भी करना होगा सुधार
वेस्ट डिस्कॉम के लिए लाइन लॉस घटाने का लक्ष्य तुलनात्मक रूप से कम है। वर्ष 2027-28 में इसे 12.20 प्रतिशत रखा गया है। इसके बाद 2028-29 में 11.85 प्रतिशत, 2029-30 में 11.55 प्रतिशत और 2030-31 में 11.28 प्रतिशत करने का लक्ष्य है। वर्ष 2031-32 तक इसे 11 प्रतिशत तक लाना होगा। इस तरह वेस्ट डिस्कॉम को पांच साल की अवधि में 1.20 प्रतिशत अंक की कमी करनी होगी। हालांकि यहां मौजूदा नुकसान का स्तर सेंट्रल और ईस्ट डिस्कॉम की तुलना में कम है, फिर भी आयोग ने हर वर्ष क्रमिक सुधार सुनिश्चित करने की व्यवस्था की है।
औद्योगिक क्षेत्रों में नुकसान 1 प्रतिशत तक
औद्योगिक क्षेत्रों के लिए लाइन लॉस का लक्ष्य काफी कम रखा गया है। एमपीआईडीसी एसईजेड, पीथमपुर में वर्ष 2027-28 में नुकसान का लक्ष्य 1.20 प्रतिशत है, जिसे 2031-32 तक घटाकर 1 प्रतिशत करना होगा। इसी तरह मोहासा-बाबई औद्योगिक क्षेत्र में लाइन लॉस 2027-28 के 2.50 प्रतिशत से घटाकर 2031-32 तक 1.50 प्रतिशत करने का लक्ष्य है। यानी औद्योगिक क्षेत्रों में भी वितरण कंपनियों को हर साल दक्षता में सुधार करना होगा।
सर्किल और डिवीजन स्तर तक मांगा जा सकेगा हिसाब
नियामक आयोग जरूरत पडऩे पर डिस्कॉम से सर्किल, डिवीजन और महीने के आधार पर भी लाइन लॉस का ब्योरा मांग सकेगा। इससे किसी एक बड़े आंकड़े के बजाय छोटे स्तर पर भी यह पता लगाया जा सकेगा कि बिजली नुकसान कहां और किन कारणों से अधिक हो रहा है। कंपनियों को हर साल अपने वास्तविक लाइन लॉस के आंकड़े टू-अप के साथ प्रस्तुत करने होंगे। साथ ही यह भी बताना होगा कि वास्तविक नुकसान आयोग द्वारा निर्धारित लक्ष्य से कितना कम या ज्यादा रहा।
प्रदर्शन का अहम पैमाना बनेगा लाइन लॉस
नए लक्ष्यों के बाद डिस्कॉम के प्रदर्शन का आकलन केवल बिजली की उपलब्धता और आपूर्ति के आधार पर नहीं होगा। लाइन लॉस में सालाना कमी भी उनके प्रदर्शन का महत्वपूर्ण पैमाना बनेगी। विशेष रूप से सेंट्रल और ईस्ट डिस्कॉम के लिए अगले पांच साल में नुकसान को लगभग आधा करने का लक्ष्य बड़ी चुनौती है। इसके लिए कंपनियों को बिजली नेटवर्क के आधुनिकीकरण, ट्रांसफार्मरों की क्षमता और स्थिति में सुधार, मीटरिंग व्यवस्था मजबूत करने, ऊर्जा ऑडिट को प्रभावी बनाने और बिजली चोरी पर नियंत्रण जैसे मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। आयोग के इन लक्ष्यों का अंतिम असर बिजली वितरण की दक्षता पर पड़ेगा। यदि कंपनियां निर्धारित समय में नुकसान कम करने में सफल रहती हैं तो इससे वितरण प्रणाली की तकनीकी दक्षता बढऩे के साथ बिजली की वास्तविक लागत और आपूर्ति व्यवस्था पर भी सकारात्मक असर पडऩे की उम्मीद है।
