- केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर नेता प्रतिपक्ष ने उठाए सवाल

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
केन-बेतवा लिंक परियोजना के प्रभावित परिवारों से मिलकर लौटे नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मुआवजा, जमीन आवंटन और पुलिस व प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सरकारी दस्तावेज दिखाते हुए आरोप लगाया कि आदिवासियों के नाम का मुआवजा एक ऐसे मुस्लिम परिवार को दे दिया गया जो सालों पहले गांव छोड़ चुका है। जमीन को लेकर राजस्व रिकॉर्ड में भी काफी गड़बड़ी की गई हैं। मगर सरकार इन प्रभावित परिवारों को विरोध भी नहीं करने दे रही। दमनकारी कदम उठाकर आदिवासियों की आवाज दबाई जा रही है। नेता प्रतिपक्ष सिंघार ने राजधानी में मीडिया से चर्चा करते हुए 44000 करोड़ की केन-बेतवा लिंक परियोजना में अनियमितता के आरोप लगाए। बड़ा आरोप लगाते हुए सिंघार ने दावा किया कि परियोजना का निर्माण कर रही नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी से भाजपा को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए 60 करोड़ रुपए का चंदा मिला है। इसीलिए सरकार कंपनी के हित में काम कर रही है। कंपनी के हितों का ध्यान रखते हुए प्रभावित आदिवासियों व किसानों की शिकायतों को नजर अंदाज किया जा रहा है। उन्होंने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच और सोशल ऑडिट की मांग की है। नेता प्रतिपक्ष का कहना है कि परियोजना के प्रभावित परिवारों की समस्या को कांग्रेस विधानसभा में भी पुरजोर तरीके से उठाएगी। पन्ना और छतरपुर के प्रभावित गांवों का दौरा कर लौटे सिंघार ने बताया कि कूपी गांव में आंदोलन कर रहे आदिवासियों और किसानों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। 80 साल तक की बुजुर्ग महिलाओं के साथ मारपीट की गई। कंपनी के लिए आदिवासियों और किसानों पर सरकार इतनी सख्ती क्यों कर रही है? जिन गांवों की जमीन अधिग्रहित की जा रही है, वहां कानून के अनुसार ग्राम सभाओं की अनुमति नहीं ली गई।
ये लगाए आरोप
खरिहानी गांव में 11 करोड़ रुपए का मुआवजा स्वीकृत हुआ। इसमें से आठ करोड़ रुपए ऐसे व्यक्तियों को दे दिए गए जिन्होंने 1980-1990 में गांव छोड़ दिया। इस आदिवासी गांव में कोई मुस्लिम परिवार नहीं रहता फिर उनके खाते में मुआवजा राशि कैसे डाली गई। छतरपुर कलेक्टर क्यों जांच दबाना चाहते हैं? सुखवा गांव की एक बुजुर्ग आदिवासी महिला की जमीन राजस्व रिकॉर्ड में दूसरे व्यक्ति के नाम दर्ज कर दी गई। मामला अदालत में लंबित होने के बावजूद मुआवजा दूसरे व्यक्ति को दे दिया गया। आंदोलन में शामिल लोगों को हिरासत में लेकर पुलिस ने 20 से 30 हजार प्रति व्यक्ति तक वसूले। लोगों के मोबाइल फोन, निजी वाहन और जमीन से जुड़े दस्तावेज भी जब्त कर लिए गए। उन्हें कानूनी लड़ाई लड़ने से रोका जा रहा है। प्रशासन जल सत्याग्रह और चिता आंदोलन कर रहे आदिवासियों की मांगों पर प्रशासन ध्यान नहीं दे रहा है। आंदोलन के नेताओं को गिरफ्तार कर प्रताड़ित किया जा रहा है।
