मप्र बन रहा एजुकेशन हब

उच्च शिक्षा से मेडिकल एजुकेशन तक विस्तार

भोपाल। मध्यप्रदेश अब उच्च शिक्षा के क्षेत्र में केवल पारंपरिक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के विस्तार तक सीमित नहीं है। राज्य सरकार उच्च शिक्षा को रोजगार, तकनीक, वैश्विक संस्थानों और मेडिकल एजुकेशन से जोडक़र प्रदेश को राष्ट्रीय और वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के स्टडी सेंटर से लेकर प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, मेडिकल कॉलेजों के विस्तार और नए विश्वविद्यालयों की स्थापना तक, शिक्षा के क्षेत्र में संस्थागत ढांचे का तेजी से विस्तार हुआ है।
प्रदेश में पिछले करीब ढाई दशक में विश्वविद्यालयों की संख्या 13 से बढक़र 81 हो गई है। इसी अवधि में शासकीय महाविद्यालयों की संख्या भी 200 से बढक़र 570 तक पहुंच गई। उच्च शिक्षा में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। दूसरी ओर मेडिकल एजुकेशन के क्षेत्र में भी प्रदेश ने विस्तार किया है। वर्ष 2003 तक जहां प्रदेश में सिर्फ 6 मेडिकल कॉलेज थे, वहीं अब इनकी संख्या 33 हो चुकी है। अगले कुछ वर्षों में नए मेडिकल कॉलेज शुरू होने से यह संख्या और बढऩे की संभावना है।
ग्लोबल एजुकेशन की ओर कदम
मध्यप्रदेश सरकार ने उच्च शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय स्तर से जोडऩे की दिशा में भी पहल शुरू की है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर अमेरिका और ताइवान के प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ प्रदेश में स्टडी सेंटर शुरू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी, पड्र्यू यूनिवर्सिटी और एशिया यूनिवर्सिटी जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के अध्ययन केंद्र शुरू होने से विद्यार्थियों को प्रदेश में रहते हुए वैश्विक पाठ्यक्रमों और अकादमिक संसाधनों से जुडऩे का अवसर मिल सकता है। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उच्च शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब केवल डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि विद्यार्थियों को उद्योग की जरूरतों के अनुरूप कौशल, तकनीकी ज्ञान और वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना भी जरूरी है। प्रदेश के सभी 55 जिलों में प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस की शुरुआत की गई है। इन संस्थानों में पारंपरिक विषयों के साथ ड्रोन टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और अन्य तकनीकी पाठ्यक्रमों पर जोर दिया जा रहा है। इस मॉडल का उद्देश्य उच्च शिक्षा को सीधे रोजगार से जोडऩा है। तकनीकी क्षेत्रों में तेजी से बदलती जरूरतों के बीच विद्यार्थियों को शुरुआती स्तर पर ही नए कौशल उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है। इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि प्रदेश के छोटे शहरों और जिलों से बड़ी संख्या में विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए भोपाल, इंदौर, जबलपुर या दूसरे बड़े शहरों का रुख करते रहे हैं। यदि स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण और रोजगारपरक पाठ्यक्रम उपलब्ध होते हैं तो विद्यार्थियों को अपने जिले में ही बेहतर विकल्प मिल सकते हैं।
13 से 81 विश्वविद्यालयों तक पहुंचा प्रदेश
वर्ष 2002 में मध्यप्रदेश में कुल 13 विश्वविद्यालय थे। इनमें 11 विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत और दो अन्य विभागों के अंतर्गत संचालित होते थे। वर्ष 2026 में इनकी संख्या बढक़र 81 हो गई है। वर्तमान में उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत 17 शासकीय और 54 निजी विश्वविद्यालय हैं, जबकि 10 विश्वविद्यालय अन्य विभागों के अधीन संचालित हो रहे हैं। विश्वविद्यालयों की संख्या में हुई यह वृद्धि केवल संस्थानों की संख्या बढऩे तक सीमित नहीं है। इसके साथ पाठ्यक्रमों, व्यावसायिक शिक्षा, शोध, तकनीकी शिक्षा और विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध विकल्पों का दायरा भी बढ़ा है। नए विश्वविद्यालयों और निजी संस्थानों के आने से उच्च शिक्षा का भौगोलिक विस्तार भी हुआ है। बड़े शहरों के साथ छोटे शहरों में भी उच्च शिक्षा के नए केंद्र विकसित हुए हैं। उच्च शिक्षा के संस्थागत विस्तार का दूसरा बड़ा आधार सरकारी महाविद्यालय हैं। वर्ष 2002 में प्रदेश में करीब 200 शासकीय महाविद्यालय थे। वर्तमान में इनकी संख्या बढक़र 570 के आसपास हो गई है। इस विस्तार का सीधा संबंध विद्यार्थियों की पहुंच से है। सरकारी कॉलेजों की संख्या बढऩे से उन विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा के अवसर बढ़े हैं जो निजी संस्थानों की फीस वहन नहीं कर सकते। महाविद्यालयों के विस्तार के साथ ई-प्रवेश जैसी डिजिटल व्यवस्थाओं ने प्रवेश प्रक्रिया को भी अधिक व्यवस्थित करने की दिशा में भूमिका निभाई है। संस्थानों की संख्या बढऩे के साथ उच्च शिक्षा में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। शैक्षणिक सत्र 2002-03 में प्रदेश में करीब 2 लाख 46 हजार 643 विद्यार्थी उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेशित थे। इसके करीब 22 साल बाद शैक्षणिक सत्र 2024-25 में यह संख्या बढक़र करीब 12 लाख 10 हजार 653 हो गई। यानी इस अवधि में करीब 9 लाख 64 हजार विद्यार्थियों की अतिरिक्त भागीदारी उच्च शिक्षा व्यवस्था में जुड़ी। विद्यार्थियों की संख्या में यह वृद्धि बताती है कि उच्च शिक्षा तक पहुंच का दायरा पहले की तुलना में काफी विस्तृत हुआ है। हालांकि केवल प्रवेश संख्या बढऩा ही पर्याप्त नहीं है। उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, पाठ्यक्रमों की प्रासंगिकता, शिक्षकों की उपलब्धता, शोध और रोजगार के अवसर भी इस विस्तार की सफलता के महत्वपूर्ण पैमाने होंगे।
बजट में करीब 15 गुना वृद्धि
उच्च शिक्षा के संस्थागत विस्तार के साथ सरकार ने वित्तीय प्रावधान में भी वृद्धि की है। वर्ष 2002-03 में उच्च शिक्षा विभाग का बजट प्रावधान करीब 2990.43 करोड़ रुपये था। वर्ष 2026-27 में यह बढक़र करीब 42,796.91 करोड़ रुपये हो गया है। इस तरह करीब 24 साल के दौरान बजट प्रावधान में लगभग 39,806 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई। बजट का यह विस्तार उच्च शिक्षा के बुनियादी ढांचे, संस्थागत क्षमता, शैक्षणिक सुविधाओं और नए कार्यक्रमों के लिए बढ़ते वित्तीय निवेश को दर्शाता है। उच्च शिक्षा के बाद मध्यप्रदेश में मेडिकल एजुकेशन ऐसा क्षेत्र है जहां पिछले दो दशकों में बड़ा विस्तार हुआ है। वर्ष 2003 तक प्रदेश में केवल 6 मेडिकल कॉलेज थे। इनमें पांच सरकारी और एक निजी मेडिकल कॉलेज शामिल था। वर्ष 2026 तक मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढक़र 33 हो गई है। इनमें 19 सरकारी और 14 निजी मेडिकल कॉलेज हैं। सरकार ने वर्ष 2028 तक मेडिकल कॉलेजों की संख्या 52 तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। यदि प्रस्तावित संस्थान निर्धारित समय में शुरू होते हैं तो प्रदेश के मेडिकल एजुकेशन नेटवर्क का और विस्तार होगा।
राजधानी भोपाल में वर्तमान में कई मेडिकल संस्थान संचालित हैं और आने वाले समय में दो नए मेडिकल कॉलेज शुरू होने की संभावना है। सेज यूनिवर्सिटी का मेडिकल कॉलेज कटारा हिल्स स्थित कैंपस में प्रस्तावित है। वहीं सेम यूनिवर्सिटी का मेडिकल कॉलेज आगरिया चौपड़ा क्षेत्र में शुरू होने की तैयारी में है। इन संस्थानों के लिए चिकित्सा शिक्षा संचालनालय की ओर से डिमांड एंड डेजिग्नेशन संबंधी प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है। अब राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से आवश्यक अनुमति की प्रक्रिया आगे बढऩी है। यदि प्रस्तावित दोनों संस्थान शुरू होते हैं तो भोपाल में मेडिकल शिक्षा की क्षमता और बढ़ेगी। इसका असर केवल एमबीबीएस सीटों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।
एमबीबीएस सीटों में भी रिकॉर्ड विस्तार
मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढऩे के साथ एमबीबीएस सीटों में भी बड़ा इजाफा हुआ है। वर्ष 2003 में प्रदेश में एमबीबीएस की करीब 1250 सीटें थीं। वर्ष 2025 के प्रवेश सत्र में यह संख्या बढक़र 5550 हो गई। यानी करीब 22 वर्षों में एमबीबीएस सीटों की संख्या में चार गुना से अधिक वृद्धि हुई। अब वर्ष 2028 तक एमबीबीएस सीटों की संख्या 7450 तक ले जाने की तैयारी है। भोपाल में प्रस्तावित दो नए मेडिकल कॉलेजों के शुरू होने से यहां भी एमबीबीएस सीटों की संख्या बढ़ सकती है। यह विस्तार प्रदेश के विद्यार्थियों के लिए मेडिकल शिक्षा के अवसर बढ़ाने के साथ स्वास्थ्य क्षेत्र में मानव संसाधन तैयार करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण होगा। मेडिकल शिक्षा का प्रभाव केवल एमबीबीएस तक सीमित नहीं है। प्रदेश में वर्तमान में करीब 2,682 पीजी सीटें और 93 सुपर स्पेशियलिटी सीटें उपलब्ध हैं। मेडिकल कॉलेजों की संख्या और क्षमता बढऩे के साथ पीजी सीटों में भी विस्तार की संभावना है। इसका सीधा संबंध विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता से है। प्रदेश के बड़े शहरों के साथ मेडिकल कॉलेज यदि छोटे और अपेक्षाकृत दूरस्थ जिलों में स्थापित होते हैं तो वहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है। भोपाल में मेडिकल शिक्षा का विस्तार आने वाले वर्षों में और तेज हो सकता है। वर्तमान में शहर में करीब 14 सरकारी-निजी मेडिकल कॉलेजों की सीटें उपलब्ध हैं। दो नए मेडिकल कॉलेज शुरू होने के बाद यह संख्या बढक़र 17 के आसपास पहुंच सकती है। इसके अलावा आने वाले पांच वर्षों में आईआईएसईआर से जुड़े मेडिकल कॉलेज, सागर ग्रुप का एक मेडिकल कॉलेज, मध्यांचल यूनिवर्सिटी का मेडिकल कॉलेज और अन्य निजी समूहों के संस्थान शुरू करने की तैयारी में हैं। इंदौर में भी नए निजी मेडिकल कॉलेज के प्रस्ताव सामने आए हैं। इससे संकेत मिलता है कि मेडिकल एजुकेशन अब केवल भोपाल और इंदौर तक सीमित नहीं रह रहा है।
मध्यप्रदेश में मेडिकल कॉलेजों का विस्तार अब भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर और रीवा जैसे बड़े शहरों से आगे बढ़ चुका है। सिवनी, नीमच, मंदसौर, श्योपुर और सिंगरौली जैसे जिलों में भी मेडिकल कॉलेज शुरू हो चुके हैं। इससे दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थियों को अपने आसपास मेडिकल शिक्षा के विकल्प मिल रहे हैं। इस विस्तार का एक संभावित प्रभाव स्वास्थ्य सेवाओं पर भी पड़ सकता है। स्थानीय स्तर पर मेडिकल संस्थान विकसित होने से प्रशिक्षित डॉक्टरों, विशेषज्ञों और स्वास्थ्यकर्मियों का आधार तैयार होगा। इससे गंभीर बीमारियों के मामलों में मरीजों को हर बार भोपाल या इंदौर जैसे बड़े शहरों तक रेफर करने की जरूरत कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि इसका वास्तविक असर संस्थानों की पूरी क्षमता से संचालन, विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता, अस्पतालों के इंफ्रास्ट्रक्चर और मरीजों को गुणवत्तापूर्ण उपचार मिलने पर निर्भर करेगा। मध्यप्रदेश में शिक्षा के इस विस्तार की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी रोजगार से जुड़ी है। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की संख्या बढऩे के साथ यह जरूरी हो गया है कि विद्यार्थियों को ऐसे पाठ्यक्रम उपलब्ध हों जिनकी बाजार में मांग हो। प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस में ड्रोन, एआई और डेटा साइंस जैसे पाठ्यक्रम इसी बदलाव का संकेत हैं। दूसरी ओर मेडिकल कॉलेजों का विस्तार स्वास्थ्य क्षेत्र में रोजगार और विशेषज्ञ मानव संसाधन तैयार करने का अवसर देता है। अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के स्टडी सेंटर यदि प्रभावी ढंग से संचालित होते हैं तो विद्यार्थियों को वैश्विक अकादमिक नेटवर्क से जुडऩे के अवसर मिल सकते हैं। इस तरह प्रदेश में शिक्षा का मॉडल तीन स्तरों पर विस्तार करता दिखाई देता है—पहला, संस्थानों की संख्या बढ़ाना; दूसरा, विद्यार्थियों की पहुंच बढ़ाना; और तीसरा, शिक्षा को तकनीक, कौशल और रोजगार से जोडऩा।

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