निवेश, नवाचार और रोजगार की बहार

  • मप्र में दिखने लगा डबल इंजन सरकार का दम

मप्र आज तेजी से विकसित हो रहे राज्यों में शामिल है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में डबल इंजन की रफ्तार से मप्र में निवेश, नवाचार और रोजगार की बहार देखी जा रही है। अब केंद्र की योजनाओं और राज्य की हिस्सेदारी से 33 हजार करोड़ से ज्यादा का फंड; सडक़, आवास, स्वास्थ्य, उद्योग, परिवहन और कृषि पर खर्च से विकास को गति देने की तैयारी की जा रही है।

भोपाल। मध्यप्रदेश में केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के संयुक्त क्रियान्वयन से इस वित्तीय वर्ष में विकास कार्यों पर बड़े पैमाने पर खर्च की तैयारी है। वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार की ओर से योजनाओं और विभागीय कार्यों के लिए 11 हजार करोड़ रुपए से अधिक की राशि मिलने का अनुमान है। इसके साथ राज्य सरकार अपनी हिस्सेदारी जोडक़र विभिन्न योजनाओं के संयुक्त क्रियान्वयन पर कुल 33 हजार 589 करोड़ रुपए से अधिक खर्च करने की तैयारी में है। इस पूरी कवायद का असर केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रहने वाला है। पेयजल, आवास, सडक़, स्वास्थ्य, परिवहन, कृषि, सिंचाई और औद्योगिक बुनियादी ढांचे पर होने वाला खर्च स्थानीय स्तर पर निर्माण गतिविधियों को बढ़ाने के साथ रोजगार और निवेश के नए अवसर पैदा करने की दिशा में भी देखा जा रहा है। केंद्र से मिलने वाली राशि में प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वास्थ्य सेवाओं, केन-बेतवा लिंक परियोजना, सडक़ निर्माण और पीएम ई-बस सेवा जैसी योजनाओं का बड़ा हिस्सा शामिल है। राज्य सरकार इन योजनाओं में अपनी हिस्सेदारी जोडक़र विकास की गति को आगे बढ़ाने की तैयारी में है।
केंद्र और राज्य सरकार के बीच योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर बनी सहमति के बाद वित्तीय तस्वीर सामने आई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार केंद्र सरकार की ओर से 11 हजार 255 करोड़ रुपए मिलेंगे, जबकि राज्य सरकार की ओर से 22 हजार 176 करोड़ रुपए की हिस्सेदारी होगी। इस तरह केंद्र और राज्य के संयुक्त प्रयास से कुल 33 हजार 589 करोड़ रुपए विकास कार्यों पर खर्च किए जाने का अनुमान है। यह राशि अलग-अलग क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार और जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर खर्च होगी। यानी एक तरफ ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए आवास का निर्माण होगा, दूसरी तरफ अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार होगा। सडक़ और परिवहन परियोजनाओं से कनेक्टिविटी बढ़ाने की कोशिश होगी तो सिंचाई और जल परियोजनाएं कृषि क्षेत्र को मजबूती देने की दिशा में काम करेंगी। योजनाओं के इस पूरे नेटवर्क को केंद्र और राज्य के संयुक्त वित्तीय मॉडल से जोडक़र देखा जा रहा है।
प्रधानमंत्री आवास के लिए 4300 करोड़
केंद्र से मिलने वाली राशि में बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए प्रस्तावित है। इसके तहत इस साल प्रदेश को करीब 4300 करोड़ रुपए मिलने हैं। इस राशि का उपयोग शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरतमंद परिवारों के लिए आवास निर्माण में किया जाएगा। आवास निर्माण से सीधे तौर पर लाभार्थियों को घर मिलने के साथ निर्माण सामग्री, मजदूरी और स्थानीय रोजगार की गतिविधियां भी बढ़ती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आवास निर्माण का प्रभाव स्थानीय अर्थव्यवस्था पर अधिक व्यापक हो सकता है। मकान बनने के साथ ईंट, सीमेंट, सरिया, रेत, बिजली, प्लंबिंग, पेंट और अन्य निर्माण गतिविधियों से जुड़े कारोबार को भी काम मिलता है। शहरी क्षेत्रों में भी आवास योजना के माध्यम से कमजोर और जरूरतमंद वर्गों के लिए मकान निर्माण का काम तेज करने की तैयारी है। सरकार के लिए चुनौती यह होगी कि आवास के लिए मिलने वाली राशि का उपयोग समय पर हो और स्वीकृत आवास वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचें।
स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 2000 करोड़
स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए भी करीब 2000 करोड़ रुपए मिलने की बात सामने आई है। इस राशि का इस्तेमाल उप स्वास्थ्य केंद्रों, स्वास्थ्य संस्थानों, मेडिकल शिक्षा से जुड़ी सुविधाओं, स्टाफ भर्ती और आयुष्मान भारत के तहत इलाज पर होने वाले खर्च में किया जाएगा। मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार को लेकर पिछले कुछ समय से कई स्तरों पर काम चल रहा है। नए अस्पतालों की स्वीकृति, मेडिकल कॉलेजों का विस्तार और चिकित्सा शिक्षा में सीटों की संख्या बढ़ाना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। उप स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करने से ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने की कोशिश होगी। वहीं मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढऩे से चिकित्सा शिक्षा के अवसर बढ़ेंगे। स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी खर्च का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानव संसाधन पर भी जाता है। डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ और अन्य कर्मचारियों की जरूरत बढऩे के साथ रोजगार के अवसर भी बनते हैं।
केन-बेतवा लिंक परियोजना पर 630 करोड़
जल संसाधनों से जुड़ी बड़ी परियोजनाओं में केन-बेतवा लिंक परियोजना महत्वपूर्ण है। इसके लिए करीब 630 करोड़ रुपए मिलने का प्रावधान बताया गया है। बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की उपलब्धता लंबे समय से विकास और कृषि के लिहाज से महत्वपूर्ण मुद्दा रही है। ऐसी परियोजनाओं का उद्देश्य सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता को बेहतर बनाना है। जल संसाधन बढऩे से कृषि गतिविधियों को विस्तार मिलने की संभावना रहती है। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने पर किसान केवल वर्षा आधारित खेती पर निर्भर नहीं रहते और फसल विविधीकरण की संभावना भी बढ़ती है। इसके साथ ही बड़े जल प्रोजेक्ट निर्माण के दौरान स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियां भी पैदा करते हैं।
सडक़ निर्माण पर 1150 करोड़
प्रदेश में सडक़ नेटवर्क को मजबूत करने के लिए करीब 1150 करोड़ रुपए मिलने की बात कही गई है। मध्यप्रदेश भौगोलिक रूप से बड़ा राज्य है। यहां ग्रामीण क्षेत्रों को मंडियों, शहरों, औद्योगिक क्षेत्रों और बाजारों से जोडऩे के लिए सडक़ नेटवर्क महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सडक़ें बेहतर होने का सीधा असर परिवहन लागत और समय पर पड़ता है। किसानों के लिए खेत से मंडी तक पहुंच आसान होती है। उद्योगों के लिए कच्चा माल और तैयार उत्पाद पहुंचाने की लागत घटाने में मदद मिल सकती है। नई सडक़ परियोजनाओं के साथ पुराने नेटवर्क के उन्नयन और महत्वपूर्ण औद्योगिक कॉरिडोर से कनेक्टिविटी को भी गति देने की तैयारी है।
पीएम ई-बस और मेट्रो पर 136 करोड़
शहरी परिवहन को आधुनिक बनाने के लिए पीएम ई-बस सेवा और मेट्रो परियोजनाओं के लिए करीब 136 करोड़ रुपए मिलने का प्रावधान है। बढ़ते शहरों में सार्वजनिक परिवहन का विस्तार केवल यातायात व्यवस्था का विषय नहीं है। इसका संबंध प्रदूषण, ईंधन की खपत, यात्रा के समय और शहरी अर्थव्यवस्था से भी है। ई-बस सेवा के विस्तार से सार्वजनिक परिवहन में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश होगी। वहीं मेट्रो परियोजनाएं बड़े शहरों में लंबी दूरी के तेज परिवहन का विकल्प तैयार कर रही हैं। भोपाल और इंदौर जैसे शहरों में सार्वजनिक परिवहन की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में मेट्रो और ई-बस नेटवर्क को जोडऩे की दिशा में आगे का काम शहरी परिवहन की तस्वीर बदल सकता है।
विकास के साथ निवेश पर फोकस
मध्यप्रदेश में विकास का अगला चरण केवल सरकारी योजनाओं के खर्च तक सीमित नहीं है। सरकार का जोर औद्योगिक निवेश आकर्षित करने पर भी है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट और विभिन्न क्षेत्रीय सम्मेलनों के माध्यम से प्रदेश को निवेश प्रस्ताव मिले हैं। सरकार का दावा है कि इन प्रस्तावों के जरिए उद्योगों की स्थापना और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। निवेश के लिए किसी राज्य की पहली जरूरत बुनियादी ढांचा होती है। सडक़, बिजली, पानी और जमीन की उपलब्धता जितनी बेहतर होगी, निवेशकों के लिए परियोजनाएं स्थापित करना उतना ही आसान होगा। इसी वजह से मध्यप्रदेश में नए औद्योगिक कॉरिडोर और एक्सप्रेसवे परियोजनाओं को निवेश रणनीति से जोडक़र देखा जा रहा है। मध्यप्रदेश में नर्मदा प्रगति पथ समेत कई एक्सप्रेसवे परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इनके जरिए प्रदेश के विभिन्न हिस्सों को तेज सडक़ संपर्क से जोडऩे की कोशिश है। नर्मदा प्रगति पथ, विंध्य एक्सप्रेसवे, मालवा-निमाड़ एक्सप्रेसवे, अटल प्रगति पथ, बुंदेलखंड विकास पथ और मध्य भारत एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं से प्रदेश की कनेक्टिविटी का विस्तार करने की योजना है। औद्योगिक निवेश के लिहाज से एक्सप्रेसवे का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि उद्योगों के लिए परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत एक बड़ा कारक होती है। यदि औद्योगिक क्षेत्रों को बेहतर सडक़ नेटवर्क मिलता है तो माल की आवाजाही तेज हो सकती है। इससे नए औद्योगिक क्लस्टर विकसित होने की संभावना बढ़ती है।
निवेशकों के लिए प्रदेश में 500 वर्ग किलोमीटर से अधिक औद्योगिक भूमि बैंक उपलब्ध कराने की बात कही गई है। औद्योगिक निवेश के लिए जमीन की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती जरूरतों में से एक है। यदि जमीन, बिजली और पानी जैसी सुविधाएं पहले से उपलब्ध हों तो परियोजनाओं को जमीन पर उतारने में समय कम लग सकता है। प्रदेश सरकार का फोकस ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों को विकसित करने पर है जहां निवेशकों को आवश्यक सुविधाएं एक ही स्थान पर मिल सकें। टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और एग्रीटेक जैसे क्षेत्रों में नई यूनिट लगाने की संभावनाओं पर भी जोर दिया जा रहा है। टेक्नोलॉजी और इनोवेशन को निवेश के नए क्षेत्र के रूप में विकसित करने के लिए प्रदेश में एमपी टेक ग्रोथ कॉन्क्लेव और स्टार्टअप समिट जैसे आयोजन किए गए हैं। इसका उद्देश्य पारंपरिक उद्योगों के साथ-साथ तकनीकी कंपनियों और नए उद्यमों को भी प्रदेश से जोडऩा है। एआई आधारित शासन, डिजिटल सेवाएं, डेटा आधारित निर्णय और सौर ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में निवेश की संभावनाएं बढ़ रही हैं। स्टार्टअप के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात केवल पूंजी नहीं बल्कि बाजार, मेंटरशिप, तकनीकी नेटवर्क और सरकारी सहयोग है। प्रदेश में इन क्षेत्रों को विकसित करने की कोशिश की जा रही है।
अर्थव्यवस्था की रफ्तार 11 प्रतिशत के आसपास
मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था में भी वृद्धि दर्ज होने का दावा किया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राज्य की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर हाल के वर्षों में औसतन 9 से 11 प्रतिशत के आसपास रही है। वर्ष 2025-26 के अनुमानों के अनुसार प्रदेश की जीएसडीपी करीब 17.47 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। आर्थिक वृद्धि का आधार केवल सरकारी खर्च नहीं होता। कृषि, उद्योग, सेवा क्षेत्र, निर्माण, व्यापार और निवेश सभी मिलकर अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। इसलिए सरकार की योजनाओं में बुनियादी ढांचे के साथ औद्योगिक निवेश और रोजगार पर भी समान जोर दिखाई देता है।
केंद्र की योजनाओं का क्रियान्वयन
केंद्र सरकार की कई योजनाओं का क्रियान्वयन मध्यप्रदेश में राज्य सरकार के माध्यम से हो रहा है। मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत जैसी पहलों से प्रदेश में टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और एग्रीटेक क्षेत्र में नई इकाइयों के विस्तार की बात सामने आई है। इन उद्योगों का विस्तार होने पर रोजगार की मांग बढ़ती है। खासकर मैन्युफैक्चरिंग और एग्री-प्रोसेसिंग में स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की संभावना रहती है। वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में प्रधानमंत्री जनधन योजना की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। प्रदेश में 4.69 करोड़ से अधिक खाते खोले जाने की बात दी गई है। इन खातों के जरिए बैंकिंग व्यवस्था से दूर रहे लोगों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोडऩे का प्रयास हुआ। डीबीटी के जरिए सरकारी योजनाओं की राशि सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाने में भी इन खातों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे सरकारी सहायता के वितरण की प्रक्रिया में बैंकिंग सिस्टम की भूमिका बढ़ी है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत मध्यप्रदेश में 89 लाख से अधिक कनेक्शन दिए जाने का दावा है। ग्रामीण और कम आय वाले परिवारों में एलपीजी कनेक्शन मिलने से महिलाओं को पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने में मदद मिली है। इस योजना का असर स्वास्थ्य और घरेलू समय दोनों पर पड़ता है। लकड़ी और अन्य ठोस ईंधन के धुएं से होने वाले घरेलू वायु प्रदूषण को कम करना इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा है। जल जीवन मिशन के माध्यम से प्रदेश में घर-घर नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य आगे बढ़ाया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के 1 करोड़ 11 लाख परिवारों को सीधे लाभ मिलने की बात कही गई है। ग्रामीण परिवारों के लिए पाइप से पानी की उपलब्धता का असर महिलाओं और बच्चों के समय पर भी पड़ता है। दूर से पानी लाने की जरूरत कम होने पर घरेलू कामकाज और शिक्षा के लिए समय उपलब्ध हो सकता है। जल आपूर्ति का यह नेटवर्क ग्रामीण जीवन की बुनियादी सुविधा को बदलने की क्षमता रखता है, हालांकि इसकी स्थायी सफलता के लिए जल स्रोतों का संरक्षण और नियमित आपूर्ति भी जरूरी होगी।
छोटे कारोबार और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में लाभार्थियों को ऋण दिया गया है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में करीब 32.41 लाख लाभार्थियों को ऋण वितरण का आंकड़ा दिया गया है, जबकि अगले वित्तीय वर्ष में यह संख्या 4.82 लाख तक पहुंचने का उल्लेख है। मुद्रा योजना का उद्देश्य छोटे उद्यमियों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से ऋण उपलब्ध कराना है। छोटे कारोबार के लिए शुरुआती पूंजी की उपलब्धता कई बार सबसे बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में बैंक ऋण का विस्तार स्वरोजगार और माइक्रो एंटरप्राइज के विकास में मदद कर सकता है। शहरी क्षेत्रों के छोटे दुकानदारों और स्ट्रीट वेंडर्स के लिए प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना भी महत्वपूर्ण है। प्रदेश में 15.78 लाख प्रकरणों में करीब 2469.49 करोड़ रुपए का ऋण वितरण किए जाने की जानकारी दी गई है। रेहड़ी-पटरी और छोटे कारोबारियों के लिए औपचारिक ऋण तक पहुंच मुश्किल रही है। स्वनिधि योजना ऐसे कारोबारियों को कार्यशील पूंजी उपलब्ध कराने की कोशिश करती है। छोटे कारोबारी नियमित रूप से बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ते हैं तो उनके कारोबार के विस्तार की संभावना भी बढ़ सकती है।
कृषि को नई तकनीक से जोडऩे की कोशिश
मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका बड़ी है। ऐसे में किसान की आय और उत्पादकता बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्य की कई योजनाओं को एक साथ लागू किया जा रहा है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना के जरिए किसानों को आर्थिक सहायता, सिंचाई और अन्य सुविधाएं देने की कोशिश की जा रही है। डिजिटल कृषि सेवाओं के विस्तार से किसानों को मौसम, मंडी भाव, फसल रोग प्रबंधन और ड्रोन स्प्रे जैसी सुविधाओं की जानकारी वास्तविक समय में उपलब्ध कराने पर जोर है। तकनीक के इस्तेमाल से कृषि क्षेत्र में लागत और उत्पादन दोनों को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने की संभावना बढ़ती है।
सरकार का जोर गौशालाओं को बढ़ावा देने, दूध उत्पादन बढ़ाने और कृषि प्रसंस्करण इकाइयों का विस्तार करने पर भी है। कृषि उत्पादों को केवल कच्चे माल के रूप में बेचने की जगह यदि स्थानीय स्तर पर उनका प्रसंस्करण हो तो किसानों को मूल्य संवर्धन का लाभ मिल सकता है। दूध से जुड़े उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, कोल्ड चेन, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। यही वजह है कि कृषि को उद्योग और बाजार से जोडऩे पर जोर दिया जा रहा है।
शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी बड़ा निवेश
विकास की तस्वीर केवल सडक़ और उद्योगों से पूरी नहीं होती। शिक्षा और स्वास्थ्य मानव पूंजी के निर्माण के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। मध्यप्रदेश में नई शिक्षा नीति को लागू करने, सकल नामांकन दर बढ़ाने और उच्च शिक्षा के अवसरों के विस्तार पर काम किया जा रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में आयुष्मान भारत के साथ राज्य सरकार की योजनाओं से उपचार की सुविधा बढ़ाने की कोशिश है। उज्जैन में मेडिसिटी और मेडिकल कॉलेज से जुड़े काम आगे बढ़े हैं। पीएम श्री एम्बुलेंस जैसी सेवाओं के विस्तार से गंभीर मरीजों को समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। प्रदेश में एमबीबीएस की 5500 और स्नातकोत्तर की 2682 सीटों में वृद्धि होने की जानकारी दी गई है। मेडिकल सीटों की संख्या बढऩे से प्रदेश के विद्यार्थियों को चिकित्सा शिक्षा के ज्यादा अवसर मिलते हैं। लंबे समय में इससे डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है। मैहर, मऊगंज और पांढुर्णा में तीन नए अस्पतालों की स्वीकृति से इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार की उम्मीद है। ग्रामीण और अपेक्षाकृत दूरस्थ जिलों में अस्पतालों की उपलब्धता स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच के लिहाज से महत्वपूर्ण है। सर्वाइकल कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचाव के लिए एचपीवी टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है। उपलब्ध सामग्री के अनुसार मध्यप्रदेश इस अभियान में देश के शीर्ष राज्यों में शामिल हुआ है। टीकाकरण कार्यक्रमों का असर तत्काल आंकड़ों में दिखाई नहीं देता, लेकिन लंबे समय में बीमारी की रोकथाम और स्वास्थ्य खर्च को कम करने की दिशा में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
गरीब, युवा, किसान और महिला पर फोकस
सरकार की योजनाओं में चार बड़े वर्ग लगातार केंद्र में दिखाई देते हैं-गरीब, युवा, किसान और महिलाएं। महिलाओं के लिए मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना, स्वयं सहायता समूहों को प्रोत्साहन और उद्यमिता कार्यक्रमों के जरिए आर्थिक भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। लाड़ली बहना योजना में मासिक सहायता राशि को 1250 रुपए से बढ़ाकर 1500 रुपए किए जाने का उल्लेख है। सरकारी भर्ती में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत आरक्षण तथा लखपति दीदी मिशन के जरिए महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोडऩे की कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा है। महिलाओं को आर्थिक सहायता देना एक स्तर है, लेकिन उन्हें स्थायी आय के साधनों से जोडऩा उससे आगे की चुनौती है। स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को बैंकिंग, छोटे कारोबार, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि आधारित गतिविधियों और स्थानीय उत्पादों से जोडऩे की कोशिश की जा रही है। यदि समूहों को बाजार, प्रशिक्षण, ऋण और तकनीक का पर्याप्त सहयोग मिलता है तो महिलाएं केवल सहायता की लाभार्थी न रहकर स्थानीय अर्थव्यवस्था की सक्रिय भागीदार बन सकती हैं। यही वजह है कि महिला सशक्तिकरण को अब केवल सामाजिक योजना नहीं बल्कि आर्थिक विकास की रणनीति से भी जोडक़र देखा जा रहा है।
डबल इंजन मॉडल का असली इम्तिहान जमीन पर
केंद्र और राज्य में एक ही राजनीतिक दल की सरकार होने से योजनाओं के समन्वय और वित्तीय संसाधनों के प्रवाह में आसानी का दावा किया जाता है। मध्यप्रदेश में भी यही मॉडल विकास के लिए इस्तेमाल किए जाने की बात कही जा रही है। केंद्र की योजनाओं में राज्य की हिस्सेदारी जोडक़र बड़े पैमाने पर खर्च की तैयारी है। लेकिन असली सवाल यह है कि प्रस्तावित राशि कितनी तेजी से जमीन पर उतरती है। किसी योजना की सफलता केवल बजट आवंटन से तय नहीं होती। इसके लिए समय पर टेंडर, निर्माण की गुणवत्ता, लाभार्थियों का सही चयन, विभागों के बीच समन्वय, भुगतान व्यवस्था और निगरानी जरूरी होती है। इसी तरह निवेश प्रस्ताव और वास्तविक निवेश में भी अंतर होता है। किसी सम्मेलन में मिले निवेश प्रस्ताव तभी आर्थिक उपलब्धि में बदलते हैं जब उद्योग जमीन पर स्थापित हों, उत्पादन शुरू करें और रोजगार पैदा करें।
निवेश से रोजगार तक की लंबी श्रृंखला
मध्यप्रदेश के सामने अब अगला लक्ष्य निवेश प्रस्तावों को वास्तविक परियोजनाओं में बदलना है। औद्योगिक निवेश के साथ जमीन, बिजली, पानी और परिवहन की सुविधा जरूरी है। उसके बाद कुशल श्रमिक, तकनीकी मानव संसाधन और बाजार की जरूरत होती है। यदि ये सभी कडिय़ां एक साथ मजबूत होती हैं तो निवेश का प्रभाव रोजगार तक पहुंच सकता है। इसीलिए एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर, औद्योगिक भूमि बैंक, बिजली और जल संसाधनों पर खर्च को रोजगार की व्यापक रणनीति से जोडक़र देखा जा रहा है।33 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का प्रस्तावित संयुक्त खर्च मध्यप्रदेश के विकास के लिए बड़ा वित्तीय हस्तक्षेप है। लेकिन इसके परिणाम तभी स्पष्ट होंगे जब योजनाओं का लाभ समय पर लोगों तक पहुंचे। आवास योजना में घर पूरा होना चाहिए। जल जीवन मिशन में नल लगने के साथ नियमित पानी भी मिलना चाहिए। स्वास्थ्य बजट से अस्पताल बने तो वहां डॉक्टर और स्टाफ भी उपलब्ध होना चाहिए। सडक़ बने तो उसकी गुणवत्ता और रखरखाव सुनिश्चित होना चाहिए। इसी तरह उद्योग के लिए जमीन देने के बाद वहां वास्तविक उत्पादन और रोजगार पैदा होना जरूरी है। यानी अगले चरण की चुनौती कितना पैसा आया से आगे बढक़र कितना काम हुआ और उसका असर कितना पड़ा पर होगी।

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