आस्था के शहर में आकार ले रहा नया इकोनॉमिक मॉडल

-सिंहस्थ से पहले बदल रही उज्जैन की अर्थव्यवस्था
-25 हजार करोड़ के 129 प्रोजेक्ट से बदलेगी शहर की तस्वीर
-उद्योगपुरी में 20 हजार करोड़ का निवेश, 75 हजार रोजगार का दावा

भोपाल। महाकाल की नगरी उज्जैन अब सिर्फ धार्मिक पर्यटन के नक्शे पर अपनी पहचान मजबूत करने की तैयारी नहीं कर रही, बल्कि यहां एक ऐसी अर्थव्यवस्था आकार ले रही है, जिसका असर सिंहस्थ-2028 के बाद भी लंबे समय तक दिखाई दे सकता है। अगले दो साल में शहर और उसके आसपास करीब 25 हजार करोड़ रुपए की लागत से 129 बड़े विकास प्रोजेक्ट आकार ले रहे हैं। इनमें सडक़, ब्रिज, एयरपोर्ट, होटल, धार्मिक स्थल, मेडिकल सुविधाएं, आईटी और शहरी अधोसंरचना से जुड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं।
इन परियोजनाओं की खास बात यह है कि इन्हें केवल सिंहस्थ में आने वाली भीड़ को संभालने की व्यवस्था के तौर पर नहीं देखा जा रहा। सरकार की कोशिश उज्जैन को ऐसा धार्मिक-आर्थिक केंद्र बनाने की है, जहां तीर्थयात्री आएं तो पर्यटन उद्योग को फायदा मिले, कंपनियां आएं तो रोजगार पैदा हों और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए शहर की कनेक्टिविटी मजबूत हो। बताया जा रहा है कि करीब 55 से 60 फीसदी काम पूरा हो चुका है। बाकी परियोजनाओं को सिंहस्थ से पहले पूरा करने का लक्ष्य है। यानी अगले डेढ़-दो साल में उज्जैन की तस्वीर तेजी से बदलने वाली है। उज्जैन में इस समय एक साथ तीन तस्वीरें दिखाई दे रही हैं महाकाल की नगरी, सिंहस्थ की तैयारी और औद्योगिक शहर बनने की कोशिश। एक तरफ मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर 1125 करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। दूसरी तरफ एयरपोर्ट, ब्रिज और सडक़ों पर हजारों करोड़ का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार हो रहा है। तीसरी तरफ विक्रम उद्योगपुरी में कंपनियां निवेश कर रही हैं और मेडिकल व आईटी जैसे नए सेक्टर खड़े किए जा रहे हैं।
महाकाल लोक ने खोला अर्थव्यवस्था का नया रास्ता
उज्जैन की अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव महाकाल लोक के निर्माण के बाद दिखाई दिया। वर्ष 2022 में महाकाल लोक शुरू होने के बाद शहर में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में तेज बढ़ोतरी हुई। सामान्य दिनों में रोजाना करीब 1 से 1.5 लाख लोग उज्जैन पहुंच रहे हैं, जबकि पर्व और विशेष अवसरों पर यह संख्या 4 से 5 लाख तक पहुंच जाती है। इतनी बड़ी संख्या में आने वाले लोगों ने होटल, रेस्टोरेंट, परिवहन, स्थानीय बाजार, फूल-प्रसाद, धार्मिक सामग्री, गाइड, पार्किंग और अन्य सेवाओं की मांग बढ़ाई। यानी श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या सीधे स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने लगी। यही वजह है कि अब शहर में धार्मिक पर्यटन को केवल मंदिरों तक सीमित रखने के बजाय उसके आसपास पूरी आर्थिक गतिविधियों का नेटवर्क तैयार किया जा रहा है।
बड़े विमानों की लैंडिंग की तैयारी
उज्जैन की सबसे बड़ी जरूरत लंबे समय से बेहतर हवाई कनेक्टिविटी रही है। सिंहस्थ से पहले इसे दूर करने की तैयारी है। करीब 437.5 एकड़ जमीन में एयरपोर्ट विकसित करने की योजना है। भूमि अधिग्रहण के लिए करीब 590 करोड़ रुपए मंजूर किए गए हैं। मौजूदा रनवे को भी विस्तार दिया जाएगा। लक्ष्य ऐसा रनवे तैयार करना है, जहां एटीआर-72 जैसे विमानों के साथ बड़े यात्री विमान भी उतर सकें। भविष्य में जरूरत पडऩे पर बड़े विमानों की लैंडिंग की क्षमता विकसित करने की तैयारी है। इसके अलावा चार हेलीपैड भी बनाए जा रहे हैं। अगर यह एयर कनेक्टिविटी समय पर विकसित हो जाती है तो इसका फायदा सिर्फ सिंहस्थ के दौरान आने वाले श्रद्धालुओं को नहीं मिलेगा। धार्मिक पर्यटन के साथ उद्योग, मेडिकल सेवाओं, कॉरपोरेट गतिविधियों और निवेश को भी इससे गति मिलने की उम्मीद है।
मंदिरों पर 1125 करोड़
उज्जैन के धार्मिक स्थलों को भी इस नए मॉडल का अहम हिस्सा बनाया जा रहा है। प्रमुख मंदिरों के विकास और सौंदर्यीकरण के लिए करीब 1125 करोड़ रुपए खर्च किए जाने की योजना है। इसमें काल भैरव, मंगलनाथ, शनि मंदिर, 84 महादेव, अंगारेश्वर महादेव, गढक़ालिका, बगलामुखी माता, भूखी माता, सिद्धवट और सांदीपनि आश्रम जैसे धार्मिक स्थलों को शामिल किया गया है। इसका मकसद यह है कि उज्जैन आने वाला श्रद्धालु सिर्फ महाकाल मंदिर तक सीमित न रहे। वह शहर के दूसरे धार्मिक स्थलों तक जाए, अधिक समय रुके और स्थानीय अर्थव्यवस्था में ज्यादा खर्च करे। यानी धार्मिक सर्किट जितना लंबा होगा, उतने ही होटल, परिवहन, खान-पान और स्थानीय कारोबार को फायदा मिलने की संभावना बढ़ेगी।
कृष्ण लोक बनेगा नया आकर्षण
महाकाल लोक के बाद अब कृष्ण लोक विकसित करने की तैयारी है। करीब 30 एकड़ में 220 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले इस परिसर में भगवान कृष्ण की 181 फीट ऊंची प्रतिमा प्रस्तावित है। इसे 31 दिसंबर 2027 से पहले पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस परियोजना का महत्व इसलिए भी है क्योंकि उज्जैन को भगवान कृष्ण की शिक्षा और सांदीपनि आश्रम से जोडक़र धार्मिक पर्यटन का एक नया अध्याय तैयार किया जा सकता है। महाकाल लोक के बाद कृष्ण लोक बनने से शहर में धार्मिक पर्यटन के दो बड़े आकर्षण केंद्र तैयार होंगे। इसके अलावा करीब 3.20 हेक्टेयर क्षेत्र में 300 करोड़ रुपए की लागत से यूनिटी मॉल भी विकसित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य खरीदारी और स्थानीय उत्पादों के लिए नया प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराना है।
आस्था के साथ उद्योग का विस्तार
उज्जैन की बदलती अर्थव्यवस्था का दूसरा बड़ा आधार धार्मिक पर्यटन नहीं, बल्कि औद्योगिक निवेश है। करीब 2300 एकड़ में फैली विक्रम उद्योगपुरी में निवेश की गतिविधियां तेज हुई हैं। यहां लगभग 350 एकड़ क्षेत्र में मेडिकल डिवाइस पार्क विकसित किया गया है। 20 से ज्यादा कंपनियां अपनी इकाइयां स्थापित कर चुकी हैं और 25 से अधिक इकाइयों में उत्पादन शुरू होने की जानकारी है। दूसरे चरण के लिए भी कंपनियों की रुचि सामने आई है। कुल मिलाकर 68 से ज्यादा कंपनियों के निवेश प्रस्ताव सामने आने की बात कही जा रही है। अनुमान के मुताबिक उद्योगों में करीब 20 हजार करोड़ रुपए का निवेश प्रस्तावित या प्रक्रियाधीन है। इससे करीब 75 हजार रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान है।
पेप्सिको से अदाणी तक, बड़े निवेशकों की एंट्री
विक्रम उद्योगपुरी में बड़े औद्योगिक समूहों की मौजूदगी इस बदलाव को और महत्वपूर्ण बनाती है। पेप्सिको इंडिया की ओर से करीब 1266 करोड़ रुपए के निवेश की जानकारी है। अदाणी सीमेंट्स करीब 1500 करोड़ रुपए और वीई कमर्शियल व्हीकल्स करीब 580 करोड़ रुपए का निवेश कर रही है। अमूल और वॉल्वो से जुड़े काम भी आगे बढ़ रहे हैं। अगर ये परियोजनाएं तय समय पर पूरी होती हैं तो उज्जैन की अर्थव्यवस्था का आधार केवल तीर्थयात्रियों पर निर्भर नहीं रहेगा। उद्योग, लॉजिस्टिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र भी इसमें हिस्सेदार बनेंगे।
स्वास्थ्य सेवाओं का नया केंद्र बनने की कोशिश
उज्जैन में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को भी बड़े स्तर पर विकसित किया जा रहा है। करीब 592 करोड़ रुपए की लागत से 14 मंजिला मेडिसिटी तैयार हो रही है। इसमें करीब 550 बेड का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल प्रस्तावित है। इससे उज्जैन और आसपास के जिलों के मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिलने के साथ मेडिकल टूरिज्म की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं। धार्मिक पर्यटन के साथ मेडिकल सुविधाओं का विस्तार शहर की अर्थव्यवस्था के लिए नया सेक्टर पैदा कर सकता है। बाहर से आने वाले मरीज और उनके परिजन भी होटल, परिवहन और स्थानीय सेवाओं का इस्तेमाल करेंगे।
आईटी पार्क भी तस्वीर बदलने की कोशिश में
इंदौर-उज्जैन रोड पर करीब 46 करोड़ रुपए की लागत से आईटी पार्क विकसित किया जा रहा है। इसका लगभग 50 फीसदी काम पूरा होने की जानकारी है। उज्जैन जैसे धार्मिक शहर में आईटी सेक्टर का विस्तार यह संकेत देता है कि शहर की भविष्य की अर्थव्यवस्था केवल मंदिर और पर्यटन तक सीमित रखने की योजना नहीं है। सरकार धार्मिक अर्थव्यवस्था के साथ आधुनिक सेवा क्षेत्र को भी जोडऩा चाहती है।
22 नए ब्रिज से कनेक्टिविटी का नेटवर्क
सिंहस्थ में सबसे बड़ी चुनौती श्रद्धालुओं की आवाजाही और ट्रैफिक मैनेजमेंट की होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए शहर में 22 नए ब्रिज बनाए जा रहे हैं। इनमें दो एलिवेटेड ब्रिज, शिप्रा नदी पर 17 ब्रिज और चार रेलवे ओवरब्रिज शामिल हैं। इनका मकसद शहर के भीतर यातायात का दबाव कम करना और प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों के बीच कनेक्टिविटी मजबूत करना है। सिंहस्थ के दौरान लाखों लोगों की आवाजाही को देखते हुए इन परियोजनाओं की उपयोगिता सिर्फ मेले तक सीमित नहीं रहेगी। स्थायी तौर पर बेहतर सडक़ और ब्रिज नेटवर्क शहर के व्यापार और पर्यटन को भी फायदा पहुंचा सकता है।
होटल उद्योग को भी मिल रही नई जमीन
बढ़ती पर्यटक और श्रद्धालु संख्या के साथ होटल उद्योग में भी निवेश बढ़ा है। रेडिसन, विवांता टाटा, हॉलिडे इन, लेमन ट्री और अनंता जैसे ब्रांड के होटल प्रोजेक्ट सामने आए हैं। इससे शहर में ठहरने की क्षमता बढ़ेगी। बड़े होटल आने का अर्थ केवल कमरों की संख्या बढऩा नहीं है। इसके साथ रोजगार, कैटरिंग, परिवहन, इवेंट, स्थानीय खरीद और सप्लाई चेन जैसी गतिविधियां भी बढ़ती हैं।
असली परीक्षा 2028 के बाद होगी
उज्जैन में चल रहे 129 प्रोजेक्ट और हजारों करोड़ के निवेश को देखकर तस्वीर बड़ी जरूर दिखाई देती है, लेकिन इस पूरे मॉडल की असली परीक्षा सिंहस्थ-2028 के बाद होगी। सवाल यह होगा कि क्या सिंहस्थ के लिए बनाया गया इंफ्रास्ट्रक्चर अगले 10-20 वर्षों तक शहर की अर्थव्यवस्था को गति दे पाएगा? क्या उद्योगों में प्रस्तावित निवेश वास्तव में जमीन पर उतरकर बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करेगा? क्या लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही को स्थायी पर्यटन में बदला जा सकेगा? अगर जवाब हां रहा तो उज्जैन का मॉडल देश के दूसरे धार्मिक शहरों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। सिंहस्थ-2028 उज्जैन के लिए सिर्फ करोड़ों श्रद्धालुओं का धार्मिक आयोजन नहीं होगा। यह इस बात की परीक्षा भी होगी कि आस्था को किस तरह पर्यटन, उद्योग, रोजगार और निवेश की स्थायी अर्थव्यवस्था में बदला जा सकता है। यदि 2028 तक ये परियोजनाएं तय समय पर पूरी होती हैं और निवेश वास्तविक उत्पादन व रोजगार में बदलता है, तो महाकाल की नगरी की पहचान केवल देश की प्रमुख धार्मिक नगरी के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक पर्यटन और आधुनिक अर्थव्यवस्था के नए मॉडल के तौर पर भी स्थापित हो सकती है।
945 करोड़ के दो ब्रिज से मिलेगी जाम से राहत
सिंहस्थ-2028 की तैयारियों के तहत शहर में बन रहे दो एलिवेटेड ब्रिज का काम अब जमीन पर नजर आने लगा है। आगर रोड पर कृषि उपज मंडी के सामने पिलर बनाने के लिए खुदाई शुरू हो गई है। इससे पहले 15 अगस्त को चरक अस्पताल के सामने पिलर के लिए खुदाई शुरू की गई थी। यानी 23 दिन में प्रोजेक्ट के दूसरे स्थान पर भी काम शुरू हो गया है। करीब 945.20 करोड़ रुपए की लागत से दोनों एलिवेटेड ब्रिज की कुल लंबाई करीब 5.32 किलोमीटर होगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के भूमिपूजन के बाद इंदिरा नगर से इंदौर गेट चौराहे के बीच प्रोजेक्ट का निर्माण शुरू हो गया है। प्रोजेक्ट में पहला चार लेन एलिवेटेड ब्रिज चिमनगंज मंडी चौराहे से इंदौर गेट तक बनेगा। दूसरा दो लेन ब्रिज निकास चौराहे से इंदौर गेट तक बनाया जाएगा। फिलहाल चरक अस्पताल और मंडी गेट के सामने पिलर के लिए काम शुरू हो चुका है। अंकपात मार्ग वाले ब्रिज का काम अभी शुरू नहीं हुआ है। आगर रोड शहर के व्यस्त मार्गों में शामिल है। इसी रास्ते पर कृषि उपज मंडी, नगर निगम, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन जैसे प्रमुख स्थान हैं। वाहन चालकों को कई चौराहों और ट्रैफिक सिग्नलों से गुजरना पड़ता है। पीक टाइम में जाम के कारण सफर में करीब 30 मिनट तक अतिरिक्त समय लग जाता है। एलिवेटेड ब्रिज बनने के बाद सीधा और भारी ट्रैफिक ऊपर से गुजरेगा, जबकि नीचे का मार्ग स्थानीय आवाजाही और व्यापार के लिए इस्तेमाल होगा। इससे ट्रैफिक दबाव और सिग्नल पर लगने वाले समय में कमी आने की उम्मीद है। प्रोजेक्ट को सिंहस्थ-2028 से पहले करीब 18 महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। निर्माण पूरा होने के बाद आगर रोड पर लंबी दूरी के ट्रैफिक को अलग मार्ग मिलने से शहर के व्यस्त हिस्से में आवाजाही आसान होने की उम्मीद है।
इंदौर-उज्जैन के लिए देशभर से चलेंगी सवा सौ ट्रेनें
रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष सतीश कुमार रविवार को इंदौर प्रवास पर आए। उन्होंने मीडिया से चर्चा की और इंदौर से जुड़े प्रोजेक्टों में गति लाने की बात कही। उन्होंने कहा कि सिंहस्थ 2028 के दौरान इंदौर और उज्जैन के लिए देशभर के शहरों से सवा सौ से ज्यादा ट्रेनें चलेंगी। सतीश कुमार ने इंदौर और आसपास की रेल परियोजनाओं की समीक्षा की है। वे जल्द से जल्द पूरी होंगी। इंदौर को नई ट्रेनें भी दी जाएंगी। मेमू ट्रेन भी इंदौर को मिलेगी। मेमू ट्रेन का निर्माण तेजी से हो रहा है। सिंहस्थ से पहले इंदौर को मेमू ट्रेन मिलेगी। उन्होंने कहा कि इंदौर के लक्ष्मीबाई नगर स्टेशन से सिंहस्थ की कई गाडिय़ां चलेंगी। उज्जैन से इंदौर के बीच के दूसरे स्टेशनों की व्यवस्थाएं भी बढ़ाई जाएंगी, ताकि ज्यादा से ज्यादा गाडिय़ां चल सकें। सिंहस्थ के दौरान सवा सौ ट्रेनें देश के अलग-अलग शहरों से चलेंगी। उन्होंने कहा कि इंदौर-मनमाड़ प्रोजेक्ट पांच साल में पूरा हो जाएगा। भूमि अधिग्रहण का काम जारी है। यह लंबी प्रक्रिया होती है। एक से डेढ़ साल का समय इसमें लगता है। इस प्रोजेक्ट के पूर्ण होने से मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच की दूरी कम होगी।
रीगल ओवरब्रिज देखने पहुंचे
स्टेशन पर अफसरों से मुलाकात के बाद सतीश कुमार रीगल ओवर ब्रिज देखने पहुंचे। इस ब्रिज का निर्माण रेलवे कर रहा है। पुराना ब्रिज तोडऩे से पहले वैकल्पिक ब्रिज तैयार किया जाएगा, ताकि शहर का ट्रैफिक प्रभावित न हो। इसके बाद वे इंदौर से उज्जैन तक ट्रैक देखने के लिए निरीक्षण कोच में सवार हो गए। सांसद शंकर लालवानी ने भी उनसे मुलाकात की और कहा कि इंदौर स्टेशन के पुनर्निर्माण का काम न रोका जाए। सिंहस्थ से पहले जितना निर्माण हो सकता है, उसे पूरा किया जाना चाहिए।

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