दो टूक: दहेज प्रताडऩा से हर मृत्यु में उम्रकैद की सजा नहीं अनिवार्य

कलकत्ता हाईकोर्ट ने दहेज प्रताडऩा से जुड़ी पत्नी और उसकी ग बेटी की मौत के केस में दोषी पति की आजीवन कारावास की सजा घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दी। अदालत ने कहा कि दहेज प्रताडऩा के कारण आत्महत्या के केस न तो बहुत दुर्लभ हैं और न ही हर मामले में आजीवन कारावास देना आवश्यक है। न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी और न्यायमूर्ति अपूर्बा सिन्हा राय की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि दहेज मृत्यु के हर केस में आजीवन कारावास अनिवार्य नहीं है। यह सजा केवल दुर्लभ मामलों में ही दी जानी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति द्वारा पत्नी पर पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा लाने का दबाव बनाना भी दहेज की मांग की श्रेणी में आता है।  अदालत ने दोषी सजल पारुई की सजा आजीवन कारावास से घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दी, जबकि जुर्माने की सजा बरकरार रखी। हाई कोर्ट ने मृतिका के सास-ससुर को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। निचली अदालत ने दोनों को सात-सात वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 304बी के तहत सजल पारुई की दोषसिद्धि को भी बरकरार रखा।  कोर्ट ने कहा-दहेज निषेध अधिनियम, 1961 लागू होने के बावजूद दहेज प्रताडऩा और दहेज मृत्यु आज भी गंभीर सामाजिक अपराध बने हुए हैं।

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