
- डीएमएफ में बड़ी रकम जमा, प्रदेशभर में 16,081 काम मंजूर लेकिन 7,835 ही पूरे; प्रभावित इलाकों तक फंड का लाभ पहुंचाने की चुनौती
गौरव चौहान/भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश के खनिज बहुल जिलों में खनन से मिलने वाली राशि विकास के लिए बड़ा संसाधन बन गई है, लेकिन इस निधि से स्वीकृत परियोजनाओं की धीमी रफ्तार इसकी उपयोगिता पर सवाल खड़े कर रही है। प्रदेश के 55 जिलों के पास जिला खनिज प्रतिष्ठान यानी डीएमएफ की करीब 3574.53 करोड़ रुपए की राशि उपलब्ध है। इसमें से अकेले 10 खनिज जिलों—सिंगरौली, अनूपपुर, शहडोल, कटनी, बालाघाट, सतना, जबलपुर, छिंदवाड़ा, उमरिया और बैतूल—के पास करीब 3147 करोड़ रुपए हैं। इसके बावजूद डीएमएफ से स्वीकृत परियोजनाओं का बड़ा हिस्सा अभी पूरा नहीं हो पाया है। प्रदेश में अब तक 16,081 परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं, लेकिन इनमें से केवल 7,835 परियोजनाएं ही पूरी हुई हैं। यानी स्वीकृत कामों का आधे से भी कम हिस्सा पूरा हो सका है। बड़ी राशि उपलब्ध होने के बावजूद परियोजनाओं के अधूरे रहने से सबसे बड़ा सवाल यही है कि खनन से प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए जुटाया गया पैसा जमीन पर कितनी तेजी से पहुंच रहा है।
डीएमएफ की व्यवस्था खनन से प्रभावित क्षेत्रों और लोगों के विकास के लिए बनाई गई है। खनिज खदानों के लीजधारकों को खनिज रॉयल्टी का 10 प्रतिशत हिस्सा डीएमएफ में जमा करना होता है। इस राशि का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क, पर्यावरण और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास में किया जाना है। यानी यह सामान्य बजट की तरह खर्च होने वाली राशि नहीं, बल्कि खनन गतिविधियों का सीधा असर झेलने वाले क्षेत्रों के लिए निर्धारित निधि है। ऐसे में परियोजनाओं के लंबे समय तक अधूरे रहने का असर भी सीधे उन्हीं क्षेत्रों की विकास जरूरतों पर पड़ता है।
अब पांच साल की योजना से खर्च पर जोर
राज्य सरकार ने डीएमएफ के नियमों में बदलाव कर निधि के इस्तेमाल को अधिक लक्षित करने की व्यवस्था की है। अब डीएमएफ की राशि किसी दूसरी योजना में स्थानांतरित नहीं की जा सकेगी और खर्च का निर्णय जिला खनिज प्रतिष्ठान बोर्ड करेगा। दूसरे जिले में भी राशि ट्रांसफर नहीं की जा सकेगी। प्रभावित लोगों और क्षेत्रों की जरूरतों के आधार पर जिलों को पांच वर्षीय दीर्घकालिक योजना और वार्षिक योजना तैयार करनी होगी। इसमें स्थानीय निकायों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य प्रतिष्ठित संगठनों की मदद से प्राथमिकताएं तय करने का प्रावधान है। नए नियमों में डीएमएफ की 70 प्रतिशत राशि प्रभावित क्षेत्र में खर्च करने पर भी जोर दिया गया है। इससे उन इलाकों तक पैसा पहुंचाने की कोशिश है, जहां खनन का प्रत्यक्ष असर पड़ा है।
सिंगरौली में खर्च का मॉडल, लेकिन पर्यावरण चुनौती
सिंगरौली के पास करीब 962 करोड़ रुपए की डीएमएफ राशि उपलब्ध है। जिले में इस फंड से जिला अस्पताल और ट्रॉमा सेंटर जैसी जनहित परियोजनाएं विकसित की गई हैं। इससे स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार में मदद मिली है। हालांकि सिंगरौली के सामने खनन गतिविधियों से जुड़े पर्यावरणीय दबाव की चुनौती भी बनी हुई है। खासतौर पर वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए और प्रभावी हस्तक्षेप की जरूरत बताई जा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी सिंगरौली को शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल कल्याण, कृषि, वन, पर्यावरण, सड़क और वाटरशेड के क्षेत्र में मॉडल जिला बनाने पर जोर दिया है।
अब असली परीक्षा पैसा खर्च करने की नहीं, सही जगह पहुंचाने की
डीएमएफ के पास उपलब्ध राशि यह बताती है कि खनिज जिलों के पास विकास के लिए संसाधन की कमी नहीं है। चुनौती अब योजना बनाने, समय पर काम शुरू करने और स्वीकृत परियोजनाओं को पूरा करने की है। 3147 करोड़ रुपए रखने वाले 10 जिलों के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि डीएमएफ में कितना पैसा जमा है, बल्कि यह है कि उस राशि से कितने स्कूल, अस्पताल, सड़क, पेयजल और पर्यावरण संबंधी काम वास्तव में जमीन पर पूरे हुए। यदि नई पांच वर्षीय योजनाएं प्रभावी ढंग से लागू होती हैं तो डीएमएफ खनन प्रभावित क्षेत्रों के लिए बड़ा विकास साधन बन सकता है; लेकिन परियोजनाओं की धीमी गति बनी रही तो बड़ी राशि उपलब्ध होने के बावजूद उसका अपेक्षित लाभ लोगों तक पहुंचने में देरी होती रहेगी।
