हजारों शिक्षकों की पेंशन पर सरकार और कोर्ट आमने-सामने

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  • हाईकोर्ट ने संविलियन को नई नियुक्ति नहीं माना, पुरानी सेवा गिनकर ओपीएस देने के निर्देश

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्य प्रदेश में करीब 80 हजार शिक्षकों की पुरानी पेंशन का मामला अब सरकार और कर्मचारियों के बीच प्रशासनिक विवाद से निकलकर कानूनी टकराव की दिशा में बढ़ता दिख रहा है। जबलपुर हाईकोर्ट की एकल पीठ द्वारा पूर्व शिक्षाकर्मियों की सेवा को निरंतर मानते हुए पुरानी पेंशन का लाभ देने के आदेश के करीब तीन महीने बाद भी स्कूल शिक्षा विभाग ने इसका पालन नहीं किया है। इसके बजाय अब सरकार इस फैसले को चुनौती देने के लिए रिव्यू याचिका और आगे डबल बेंच में जाने की तैयारी कर रही है।
मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हाईकोर्ट ने वर्ष 2018 के संविलियन को नई नियुक्ति मानने के शासन के तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि शिक्षाकर्मियों का अध्यापक संवर्ग में शामिल होना सेवा का नया प्रारंभ नहीं, बल्कि संविलियन और पदनाम परिवर्तन की प्रक्रिया थी। ऐसे में उनकी पूर्व सेवा को पेंशन की गणना से बाहर नहीं किया जा सकता।
1998 की नियुक्ति से शुरू हुआ विवाद
मामले में याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति 22 अगस्त 1998 को जिला पंचायत के माध्यम से शिक्षाकर्मी वर्ग-2 के पद पर हुई थी। बाद में पंचायत अध्यापक संवर्ग नियम, 2008 के तहत वे अध्यापक और फिर वरिष्ठ अध्यापक बने। इसके बाद 15 फरवरी 2019 को उन्हें उच्च माध्यमिक शिक्षक पद पर पदस्थ किया गया। विवाद तब पैदा हुआ, जब शासन ने वर्ष 2018 के सेवा भर्ती नियमों के नियम 18.1 और 18.2 का हवाला देते हुए इस प्रक्रिया को नई नियुक्ति माना और पूर्व सेवा को पेंशन के लिए स्वीकार नहीं किया। इसी आधार पर संबंधित कर्मचारियों को नई पेंशन योजना यानी एनपीएस के दायरे में रखा गया।
कोर्ट ने कहा- सेवा में ब्रेक नहीं तो नई नियुक्ति कैसे?
हाईकोर्ट ने शासन के इस तर्क को खारिज करते हुए 2008 के अध्यापक संवर्ग नियमों के नियम 5 का हवाला दिया। कोर्ट के मुताबिक शिक्षाकर्मियों को अध्यापक संवर्ग में शामिल किया जाना संविलियन था। जब कर्मचारी की सेवा में एक दिन का भी व्यवधान नहीं आया, तो केवल संवर्ग और पदनाम बदलने से इसे नई नियुक्ति नहीं माना जा सकता। अदालत ने पेंशन के लिए संविलियन से पहले की सेवा अवधि को भी जोडऩे और पात्र कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना का लाभ देने के निर्देश दिए।
आदेश के बाद भी लागू नहीं हुआ फैसला
हाईकोर्ट के आदेश के बाद शिक्षकों को उम्मीद थी कि सरकार पेंशन संबंधी प्रक्रिया आगे बढ़ाएगी। लेकिन करीब तीन महीने गुजरने के बावजूद विभाग ने आदेश पर अमल नहीं किया है। अब विभाग की ओर से फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करने की तैयारी की जा रही है। मामले को लेकर 5 अक्टूबर को जबलपुर में स्कूल शिक्षा विभाग के शीर्ष अधिकारियों की महाधिवक्ता और अतिरिक्त महाधिवक्ता के साथ बैठक भी प्रस्तावित की गई, जिसमें आगे की कानूनी रणनीति पर चर्चा की जानी है।
सरकार के सामने 80 हजार कर्मचारियों का सवाल
इस मामले का असर उन करीब 80 हजार शिक्षकों और संविदा शिक्षकों पर पड़ सकता है, जिनकी नियुक्ति प्रदेश में नई पेंशन योजना लागू होने से पहले हुई थी। एनपीएस की जगह ओपीएस लागू होने पर सरकार को इन कर्मचारियों की पुरानी सेवा को पेंशन लाभ के लिए जोडऩा पड़ेगा। इससे राज्य के पेंशन व्यय पर बड़ा वित्तीय असर पडऩे की आशंका है। यही वित्तीय दायित्व अब सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। एक ओर कोर्ट का आदेश है, दूसरी ओर उसके अनुपालन से बढऩे वाला दीर्घकालिक वित्तीय भार। ऐसे में विभाग सीधे आदेश लागू करने के बजाय पहले न्यायिक विकल्प तलाश रहा है।
शिक्षकों का सवाल- कोर्ट के आदेश के बाद भी इंतजार क्यों?
मामले से जुड़े शिक्षक राजेश मिश्रा का कहना है कि विभाग पहले भी शिक्षाकर्मियों को ओपीएस का लाभ नहीं मिलने की बात कहता रहा है, लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। उनका कहना है कि शिक्षक कई बार विभाग को आदेश के पालन के लिए रिमाइंडर दे चुके हैं, इसके बावजूद अब तक कोई निर्णय नहीं हुआ। यानी मामला अब सिर्फ पुरानी और नई पेंशन योजना का नहीं रहा। हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकार के सामने यह सवाल भी खड़ा है कि वह अदालत के फैसले को लागू करती है या उसके खिलाफ नई कानूनी लड़ाई शुरू करती है। आगामी रिव्यू याचिका पर सरकार का रुख करीब 80 हजार शिक्षकों के पेंशन भविष्य की दिशा तय कर सकता है।

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