लाइन लॉस का भार उपभोक्ताओं पर थोपने की तैयारी

  • मप्र में 15-20 प्रतिशत बढ़ेगी बिजली की दर!

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश में अगले पांच साल के बिजली वितरण टैरिफ को लेकर शुरू हुई प्रक्रिया में बिजली कंपनियों के प्रस्ताव पर उपभोक्ताओं और उद्योग जगत ने सवाल उठाए हैं। सबसे बड़ा विवाद वितरण लाइन लॉस के तय मानकों को लेकर है। आपत्तिकर्ताओं का कहना है कि बिजली कंपनियों को लाइन लॉस घटाने की दिशा में काम करना चाहिए, लेकिन प्रस्ताव में कुछ क्षेत्रों के लिए अगले पांच साल तक अपेक्षाकृत ज्यादा लाइन लॉस को मान्यता देने की तैयारी की गई है। इसका सीधा असर भविष्य में बिजली दरों पर पड़ सकता है। बिजली दरों में 15 से 20% तक बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। मध्यप्रदेश विद्युत विनियामक आयोग की सुनवाई में बिजली उपभोक्ताओं और उद्योग प्रतिनिधियों ने कंपनियों के पांच वर्षीय टैरिफ प्रस्ताव पर आपत्तियां दर्ज कराईं। बिजली मामलों के जानकार राजेंद्र अग्रवाल ने कहा कि लाइन लॉस को नियंत्रित करना वितरण कंपनियों की जिम्मेदारी है। यदि अधिक लाइन लॉस को नियामकीय मान्यता दी जाती है तो उसका वित्तीय दबाव अंतत: उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। बिजली कंपनियों के प्रस्ताव के मुताबिक वर्ष 2027-28 में ईस्ट डिस्कॉम का लाइन लॉस 23 प्रतिशत, सेंट्रल डिस्कॉम का 24.50त्न और वेस्ट डिस्कॉम का 12.20त्न रखने का प्रस्ताव है। सुनवाई में आपत्तिकर्ताओं ने इन मानकों को मंजूरी नहीं देने की मांग की। उनका तर्क है कि जब वितरण व्यवस्था को आधुनिक बनाने और लाइन लॉस कम करने के लिए लगातार निवेश किया जा रहा है, तब अगले पांच वर्षों के लिए अधिक नुकसान को मानक बनाना उचित नहीं है।
स्मार्ट मीटर के बाद भी लाइन लॉस क्यों?
आपत्तिकर्ताओं ने आरडीएसएस योजना का भी हवाला दिया। प्रदेश में इस योजना के तहत स्मार्ट मीटर सहित बिजली वितरण व्यवस्था को आधुनिक बनाने पर काम चल रहा है। ऐसे में सवाल उठाया गया कि तकनीकी सुधारों और स्मार्ट मीटरिंग के बावजूद यदि लाइन लॉस अपेक्षित स्तर तक नहीं घटता है तो इसकी कीमत ईमानदारी से बिजली बिल चुकाने वाले उपभोक्ताओं से क्यों वसूली जाए। राजेंद्र अग्रवाल के मुताबिक यदि 24.50 प्रतिशत तक लाइन लॉस को मान्यता दी जाती है तो बिजली कंपनियों के खर्च और राजस्व की भरपाई के लिए टैरिफ पर दबाव बढ़ सकता है। उन्होंने दावा किया कि इससे बिजली दरों में हर साल 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी का दबाव बन सकता है।
अप्रैल 2027 से लागू होगा नया टैरिफ
मध्यप्रदेश विद्युत विनियामक आयोग की प्रक्रिया के तहत अप्रैल 2027 से मार्च 2032 तक पांच साल की नियंत्रण अवधि के लिए बिजली वितरण टैरिफ तय किया जाना है। इस दौरान बिजली कंपनियों की बिजली खरीद लागत, संचालन खर्च, वितरण हानि और अन्य नियामकीय मानकों का परीक्षण किया जाएगा। आयोग सुनवाई के दौरान प्राप्त आपत्तियों और सुझावों पर विचार करने के बाद अंतिम टैरिफ और नियामकीय मानक तय करेगा। इसलिए फिलहाल 15 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी संभावित दबाव के तौर पर सामने आई है, अंतिम दर वृद्धि के रूप में नहीं।
उद्योगों ने थ्री-पार्ट टैरिफ पर जताई आपत्ति
सुनवाई में उद्योग प्रतिनिधियों ने भी बिजली कंपनियों के प्रस्ताव का विरोध किया। उनका मुख्य मुद्दा उद्योगों पर लागू थ्री-पार्ट टैरिफ रहा। उद्योग जगत का कहना है कि औद्योगिक उपभोक्ताओं पर बिजली की लागत पहले से ही बड़ा खर्च है। ऐसे में टैरिफ संरचना में अतिरिक्त भार पडऩे से उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है। अब आयोग के सामने चुनौती यह है कि बिजली कंपनियों की वित्तीय जरूरतों और वितरण व्यवस्था के खर्च के साथ उपभोक्ताओं पर पडऩे वाले बोझ के बीच संतुलन बनाया जाए। आने वाले महीनों में इस प्रक्रिया के तहत दाखिल आपत्तियों और कंपनियों के जवाब के आधार पर नए टैरिफ की दिशा स्पष्ट होगी।

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