1200 मलेरिया केस के बाद भी नहीं जागा सिस्टम

  • बालाघाट में फिर 349 मरीज; 307 खतरनाक फैल्सीपेरम

गौरव चौहान/भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। बालाघाट में मलेरिया का खतरा कोई अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं है। पिछले साल जिले में करीब 1200 मलेरिया मरीज मिलने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने बीमारी के दोबारा फैलने से रोकने के लिए पर्याप्त सतर्कता नहीं दिखाई। नतीजा यह है कि इस साल अगस्त तक प्रदेश में मिले 1080 मलेरिया मरीजों में करीब एक-तिहाई बालाघाट के हैं। विभागीय आंकड़ों में जिले में 329 से 349 मरीज मिलने की जानकारी सामने आ रही है, जिनमें बड़ी संख्या खतरनाक माने जाने वाले फैल्सीपेरम संक्रमण की है। सबसे गंभीर स्थिति यह है कि प्रदेश में इस साल मलेरिया से दर्ज दो मौतें भी बालाघाट की हैं। दूसरी ओर जिले में खसरा, मलेरिया और कुपोषण से बच्चों की मौतों का मामला सामने आने के बाद सरकारी दावों और जमीनी स्थिति के बीच अंतर पर सवाल उठ रहे हैं।
बालाघाट में वर्ष 2025 में करीब 1200 मलेरिया मामले सामने आए थे। यह आंकड़ा अपने आप में जिले के लिए अलर्ट था। मलेरिया के लगातार मामले सामने आने वाले इलाकों में समय रहते फीवर सर्वे, संदिग्ध मरीजों की जांच, दवा वितरण और मच्छर नियंत्रण जैसे उपाय तेज किए जाने चाहिए थे। लेकिन इस साल भी अगस्त तक बालाघाट में 329 से ज्यादा मरीज मिलना बताता है कि पिछले साल के आंकड़ों से अपेक्षित सबक नहीं लिया गया। प्रदेश में इस साल अब तक 1080 मरीज मिलने की जानकारी है। इनमें बालाघाट की हिस्सेदारी करीब एक-तिहाई है। जिले के मरीजों में 307 फैल्सीपेरम बताए जा रहे हैं, जो मलेरिया के गंभीर रूपों में शामिल है।
दो मौत सरकारी रिकॉर्ड में, लेकिन बच्चों की मौतों पर बड़ा सवाल
बालाघाट में खसरा, मलेरिया और कुपोषण के बीच बच्चों की मौतों का मामला सबसे चिंताजनक पहलू है। स्थानीय स्तर पर 26 बच्चों की मौत की बात सामने आई है, जबकि सरकार ने इनमें से 10 मौतों की पुष्टि इन बीमारियों से होने की बताई है। स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड में प्रदेश में इस वर्ष मलेरिया से केवल दो बच्चों की मृत्यु दर्ज है और दोनों मामले बालाघाट के बताए गए हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ मलेरिया से हुई मौतों की संख्या का नहीं, बल्कि यह पता लगाने का भी है कि जिन बच्चों की मौत हुई, उनकी वास्तविक चिकित्सकीय वजह क्या थी? यदि खसरा, मलेरिया और कुपोषण एक साथ प्रभावित कर रहे थे तो बीमारी की पहचान और उपचार में देरी की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
सबसे ज्यादा असर बैगा बच्चों पर
मौतों से जुड़े मामलों में बड़ी संख्या बिरसा और बैहर ब्लॉक के बैगा आदिवासी बच्चों की बताई जा रही है। ये इलाके स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच और नियमित निगरानी के लिहाज से चुनौतीपूर्ण माने जाते हैं। माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में पहले स्वास्थ्य अमले की आवाजाही सीमित रहने की बात सामने आती रही है। लेकिन दिसंबर में माओवादियों के समर्पण के बाद भी यदि नियमित टीकाकरण, स्वास्थ्य जांच और बुखार सर्वे का व्यापक अभियान नहीं चलाया गया, तो यह प्रशासनिक तैयारी पर सवाल खड़ा करता है।
खसरा टीकाकरण के आंकड़े भी दे रहे चेतावनी
बालाघाट में खसरा रोधी टीकाकरण को लेकर भी सरकारी आंकड़ों में अंतर सामने आ रहा है। स्वास्थ्य विभाग की एचएमआईएस रिपोर्ट में करीब 70 प्रतिशत बच्चों को खसरा रोधी टीका लगने की जानकारी है, जबकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में यह कवरेज 93 प्रतिशत बताया गया है। दोनों आंकड़ों में 23 प्रतिशत का अंतर है। ऐसे में वास्तविक टीकाकरण कवरेज को लेकर स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है। जानकारों के मुताबिक खसरे से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण बेहद महत्वपूर्ण है। यदि किसी क्षेत्र में टीकाकरण कवरेज कम है और साथ ही बच्चों में बुखार के मामले बढ़ रहे हैं तो वहां विशेष टीकाकरण और फीवर सर्वे अभियान तत्काल चलाया जाना चाहिए।
मंडला-डिंडौरी भी लंबे समय से हॉटस्पॉट
मलेरिया का खतरा सिर्फ बालाघाट तक सीमित नहीं है। वर्ष 2020 से अब तक मंडला में 30,498, डिंडौरी में 21,135, छिंदवाड़ा में 13,970 और बालाघाट में 7,849 मरीज सामने आ चुके हैं। इस साल भी बालाघाट के बाद छिंदवाड़ा में 92, सतना में 53, डिंडौरी में 52 और झाबुआ में 51 मरीज मिले हैं।
पांच साल में घटे केस, लेकिन बालाघाट का खतरा बरकरार
प्रदेश में मलेरिया के कुल मामलों में पिछले कुछ वर्षों में कमी आई है। 2022 में 3826, 2023 में 3794, 2024 में 3247 और 2025 में 2347 मरीज मिले थे। इस साल अगस्त तक 1080 मामले सामने आ चुके हैं। लेकिन राज्य के औसत आंकड़ों में सुधार का मतलब यह नहीं कि संवेदनशील जिलों में खतरा खत्म हो गया। बालाघाट इसका उदाहरण है। पिछले साल 1200 मरीज मिलने के बाद भी इस साल सैकड़ों मामले सामने आना बताता है कि मलेरिया के हॉटस्पॉट जिलों में सामान्य निगरानी के बजाय लगातार और लक्षित अभियान की जरूरत है। सवाल यह नहीं कि मरीज कितने मिले, सवाल यह है कि पहले से पता होने के बाद भी रोकथाम क्यों नहीं हुई? बालाघाट के आंकड़े स्वास्थ्य विभाग के लिए सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा करते हैं कि जब पिछले साल ही जिले में मलेरिया के करीब 1200 मामले सामने आ चुके थे, तब इस साल बीमारी की रोकथाम के लिए क्या अतिरिक्त रणनीति बनाई गई? अगर समय रहते प्रभावित गांवों में फीवर सर्वे, घर-घर जांच, मच्छर नियंत्रण, दवा वितरण और टीकाकरण अभियान तेज किए जाते तो संक्रमण के बढ़ते मामलों को कितना रोका जा सकता था—इसकी समीक्षा अब जरूरी है। मलेरिया के आंकड़े सिर्फ मरीजों की संख्या नहीं बताते, वे यह भी बताते हैं कि बीमारी आने से पहले सिस्टम कितना तैयार था। बालाघाट में इस बार यही तैयारी सबसे बड़ा सवाल बन गई है।

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