- 5 हजार टन कचरे में सिर्फ 10 प्रतिशत का वैज्ञानिक निपटारा
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्य प्रदेश में तेजी से बढ़ रहे ई-कचरे के वैज्ञानिक निपटारे की व्यवस्था पर अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सवाल खड़े किए हैं। प्रदेश में हर साल करीब 5 हजार मीट्रिक टन ई-वेस्ट निकलने और उसका बड़ा हिस्सा अधिकृत केंद्रों के बजाय अनाधिकृत कबाडिय़ों तक पहुंचने के दावे पर एनजीटी ने सख्त रुख अपनाया है। अधिकरण ने भोपाल कलेक्टर, नगर निगम कमिश्नर समेत संबंधित विभागों के अधिकारियों से जवाब मांगा है। मामले की जमीनी हकीकत जांचने के लिए एनजीटी ने पांच सदस्यीय समिति गठित की है। समिति को ई-कचरे के संग्रहण से लेकर परिवहन, प्रसंस्करण और निपटारे तक की पूरी व्यवस्था की जांच कर चार सप्ताह में तथ्यात्मक एवं कार्रवाई रिपोर्ट पेश करनी होगी।
याचिका में पेश आंकड़ों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार प्रदेश में ई-कचरे की मात्रा वर्ष 2019 में करीब 500 मीट्रिक टन थी, जो अब बढकऱ लगभग 5 हजार मीट्रिक टन सालाना हो गई है। यानी छह साल में इसमें करीब 17 गुना वृद्धि का दावा किया गया है। सबसे गंभीर बात यह है कि याचिका में दावा किया गया है कि कुल ई-कचरे का केवल करीब 10 प्रतिशत ही वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्कृत हो रहा है। बाकी कचरे के संग्रहण और निपटारे की व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और उज्जैन को प्रमुख ई-कचरा उत्पादक शहरों में बताया गया है। भोपाल में ही सालाना करीब 415 मीट्रिक टन ई-वेस्ट निकलने का आंकड़ा याचिका में दिया गया है।
अधिकृत केंद्रों के बजाय कबाडिय़ों तक पहुंच रहा कचरा: याचिकाकर्ता नितिन सक्सेना ने ई-कचरे के बढ़ते बोझ और उसके वैज्ञानिक निपटारे की व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए हैं। याचिका में आरोप है कि बड़ी मात्रा में ई-कचरा अधिकृत रिसाइक्लिंग या प्रोसेसिंग केंद्रों तक पहुंचने के बजाय अनाधिकृत कबाडिय़ों के पास जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को तोडऩे और उनसे उपयोगी सामग्री निकालने के बाद बचे कचरे को खुले में जलाने जैसी गतिविधियों से पर्यावरणीय खतरा और बढ़ सकता है।
खुले में जलाया तो हवा-पानी दोनों पर खतरा
ई-कचरे में मौजूद सीसा, पारा, कैडमियम, क्रोमियम और आर्सेनिक जैसे भारी धातु पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। इसे खुले में जलाने पर जहरीले धुएं और प्रदूषक तत्व वातावरण में फैल सकते हैं। वहीं गलत तरीके से डंप किए जाने पर मिट्टी और भूजल प्रभावित होने की आशंका रहती है। असंगठित क्षेत्र में ई-कचरे के निपटारे से जुड़े श्रमिकों, बच्चों और अन्य संवेदनशील समूहों के स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता जताई गई है।
पांच सदस्यीय समिति करेगी पड़ताल
एनजीटी की गठित समिति में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय के प्रतिनिधि, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नामित विशेषज्ञ, मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग और इलेक्ट्रिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के प्रतिनिधि तथा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव शामिल हैं। समिति संबंधित क्षेत्रों का स्थल निरीक्षण कर यह देखेगी कि ई-कचरे का संग्रहण, परिवहन, प्रसंस्करण और अंतिम निपटारा किस तरीके से किया जा रहा है।
अब प्रशासन को देना होगा जवाब
भोपाल कलेक्टर और नगर निगम कमिश्नर के अलावा राज्य सरकार, पर्यावरण विभाग और प्रदूषण नियंत्रण तंत्र से भी जवाब मांगा गया है। अधिकरण यह जानना चाहता है कि ई-कचरा प्रबंधन नियमों के पालन और अवैध गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई है। समिति की रिपोर्ट सामने आने के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रदेश में ई-कचरा प्रबंधन की वास्तविक स्थिति क्या है?
