
बिच्छू डॉट कॉम। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त हो रहे न्यायमूर्ति संजय करोल ने अपने विदाई संबोधन में कहा-न्यायाधीश भगवान नहीं होते और उनसे हर फैसला पूरी तरह सही होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। न्याय करने के लिए विनम्रता अत्यंत जरूरी है और न्यायाधीशों को याचिका के पीछे छिपे इंसान के दर्द को समझना चाहिए। संविधान न्यायाधीशों से केवल कानून को लागू करने की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि उसे न्यायपूर्ण तरीके से लागू करने की मांग करता है। अदालत के सामने खड़े व्यक्ति की स्थिति और उम्मीदों को समझना ही सच्चा न्याय है। सीजेआई सूर्यकांत के कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत के पास केवल जीवंत संविधान होना काफी नहीं है, बल्कि देश को हर दिन संविधान को जीना भी होगा। किसी याचिका में केस के तथ्य दर्ज हो सकते हैं, लेकिन वह व्यक्ति के दर्द को पूरी तरह बयां नहीं कर सकती। अदालतों में बोले गए तर्कों के साथ-साथ उन बातों को भी सुनना जरूरी है जो शब्दों में नहीं कही जातीं। करीब 40 साल के कानूनी करियर (19 वर्ष बतौर जज) का अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की असली ताकत उस आम नागरिक के भरोसे में है, जो सुनवाई की उम्मीद लेकर आता है। उन्होंने उन लोगों को भी याद रखने की जरूरत बताई जो अदालती प्रक्रिया को महंगा या डराने वाला मानकर पहुंच ही नहीं पाते।
