- फेस रिकग्निशन से होगी हाजिरी, देर से आने पर शॉर्ट लीव या हाफ डे की तैयारी

गौरव चौहान
मध्यप्रदेश में सरकारी दफ्तरों का कामकाज एक बार फिर बदलने की तैयारी शुरू हो गई है। कर्मचारियों के समय पर कार्यालय नहीं पहुंचने की लगातार मिल रही शिकायतों के बीच राज्य सरकार मौजूदा पांच दिन के वर्किंग सिस्टम को खत्म कर सप्ताह में छह दिन सरकारी दफ्तर खोलने के विकल्प पर विचार कर रही है। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो इसका असर प्रदेश के करीब साढ़े पांच लाख अधिकारी-कर्मचारियों पर पड़ेगा। सरकार का फोकस केवल कामकाजी दिनों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। कर्मचारियों की उपस्थिति को लेकर भी पूरी व्यवस्था को हाईटेक बनाने की तैयारी है। सामान्य प्रशासन विभाग प्रदेशभर के सरकारी कार्यालयों के लिए रियल टाइम अटेंडेंस सॉफ्टवेयर तैयार कराने की दिशा में काम कर रहा है। इसमें फिंगरप्रिंट के साथ फेस रिकग्निशन जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है।
सरकारी कार्यालयों में अधिकारियों-कर्मचारियों के समय पर नहीं पहुंचने की शिकायतें लंबे समय से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तक पहुंच रही हैं। पार्टी के जनप्रतिनिधियों और अन्य विशिष्ट लोगों ने मंत्रालय समेत राज्य शासन और प्रशासन से जुड़े कार्यालयों में समय पर कामकाज शुरू नहीं होने की शिकायतें की हैं। मुख्यमंत्री ने मामले को गंभीरता से लेते हुए अधिकारियों-कर्मचारियों को कार्यालय समय का पालन करने की सार्वजनिक रूप से हिदायत दी थी। इसके बाद उन्होंने मंत्रालय का औचक निरीक्षण भी किया। मंत्रालय के अलावा विंध्याचल और सतपुड़ा भवन सहित अन्य सरकारी कार्यालयों में कर्मचारियों की उपस्थिति की निगरानी के लिए विशेष टीमों से डाटा भी तैयार कराया गया।
मई की समीक्षा के बाद सामने आईं तकनीकी दिक्कतें
मुख्यमंत्री ने मई में अधिकारियों-कर्मचारियों की उपस्थिति को लेकर समीक्षा की थी। इसके बाद मौजूदा बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम में तकनीकी खामियों और ठीक से काम नहीं करने की शिकायतें सामने आईं। अब सरकार पुराने सिस्टम पर निर्भर रहने के बजाय एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार कराने की तैयारी में है, जिससे कर्मचारियों की उपस्थिति की रियल टाइम निगरानी हो सके। इसके लिए मध्यप्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन को सॉफ्टवेयर तैयार करने की जिम्मेदारी दिए जाने की बात सामने आई है। प्रस्तावित व्यवस्था में फिंगरप्रिंट और फेस रिकग्निशन के जरिए उपस्थिति दर्ज करने की व्यवस्था होगी।
देर से आए तो सिस्टम खुद दर्ज करेगा हाफ डे
नई व्यवस्था का सबसे अहम पहलू यह होगा कि कार्यालय पहुंचने में लगातार देरी करने वाले कर्मचारियों पर सिस्टम के जरिए कार्रवाई का रास्ता तैयार किया जा सकता है। प्रस्तावित सॉफ्टवेयर में कर्मचारी के निर्धारित समय के बाद पहुंचने का रिकॉर्ड दर्ज होगा और तय नियमों के अनुसार शॉर्ट लीव या हाफ डे दर्ज किया जा सकेगा। इसका सीधा असर वेतन और सेवा रिकॉर्ड पर भी पड़ सकता है। हालांकि आंखों की पुतली यानी आइरिस स्कैन से उपस्थिति दर्ज करने जैसी व्यवस्था पर अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
कोविड में शुरू हुआ था पांच दिन का सप्ताह
मध्यप्रदेश में पांच दिन का वर्किंग सिस्टम कोविड संक्रमण के दौरान वर्ष 2020 में लागू किया गया था। बाद में इसे जून 2022 में आगे बढ़ाया गया और तब से यह व्यवस्था लगातार चल रही है। अब सरकार में इस बात पर मंथन शुरू हुआ है कि पांच दिन की व्यवस्था जारी रखी जाए या सरकारी कार्यालयों को पहले की तरह सप्ताह में छह दिन संचालित किया जाए। सरकार का तर्क है कि यदि कार्यालय समय का प्रभावी पालन नहीं हो रहा है तो केवल पांच दिन कामकाज की व्यवस्था से आम लोगों को मिलने वाली सरकारी सेवाओं पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
कर्मचारी संगठनों से भी ली जा सकती है राय
छह दिन की वर्किंग व्यवस्था लागू करने से पहले शासन कर्मचारी और अधिकारी संगठनों से चर्चा कर सकता है। उनकी राय और सुझाव लेने के बाद अंतिम निर्णय की दिशा तय होने की संभावना है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल के बीच भी इस प्रस्ताव को लेकर विस्तृत चर्चा हो सकती है। हालांकि अभी छह दिन का वर्किंग सिस्टम लागू करने का अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। फिलहाल यह विचार और तैयारियों के स्तर पर है।
5.5 लाख कर्मचारियों पर पड़ेगा असर
यदि सरकार छह दिन का वर्किंग सिस्टम लागू करती है तो प्रदेश के करीब साढ़े पांच लाख अधिकारी-कर्मचारियों की दिनचर्या बदल जाएगी। कर्मचारियों के लिए एक अतिरिक्त कार्यदिवस जुडऩे के साथ आम लोगों के लिए सरकारी कार्यालयों में उपलब्ध सेवाओं का समय भी बढ़ सकता है। दूसरी तरफ नई डिजिटल अटेंडेंस व्यवस्था लागू होने पर समय की पाबंदी भी बढ़ेगी। देर से आने या निर्धारित समय से पहले कार्यालय छोडऩे की स्थिति में रिकॉर्ड डिजिटल रूप से दर्ज होने से वेतन कटौती या अवकाश समायोजन जैसी कार्रवाई का आधार तैयार हो सकता है। सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक ओर सरकारी दफ्तरों में कामकाज के घंटे और दिनों को लेकर फैसला करना, वहीं दूसरी ओर कर्मचारियों की समयबद्ध उपस्थिति सुनिश्चित करना। छह दिन की वर्किंग व्यवस्था पर अंतिम निर्णय से पहले कर्मचारी संगठनों की राय और प्रशासनिक जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाएगा।
