34 डंपिंग साइटों पर 13 लाख टन लीगेसी वेस्ट

डंपिंग साइटों
  • स्वच्छता रैंकिंग से पहले कचरे के पहाड़ चुनौती, बढ़ते कचरे के साथ प्रोसेसिंग का गैप भी बढ़ा
  • एक साल में 1730 टन बढ़ा रोजाना घरेलू कचरा, प्रोसेसिंग गैप भी तीन गुना

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश के शहर स्वच्छता की रैंकिंग में ऊंची छलांग लगाने की तैयारी में हैं, लेकिन कचरे के पहाड़ उनकी राह में सबसे बड़ी बाधा बन सकते हैं। प्रदेश की 34 डंपिंग साइटों पर करीब 13 लाख मीट्रिक टन लीगेसी वेस्ट अब भी जमा है। दूसरी ओर, एक साल में रोजाना निकलने वाले घरेलू कचरे की मात्रा में 1730 टन की बढ़ोतरी हुई है। कचरे की बढ़ती मात्रा के मुकाबले प्रोसेसिंग क्षमता नहीं बढ़ पाने से शहरों के सामने स्वच्छता रैंकिंग बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है। स्वच्छ सर्वेक्षण 2025-26 के परिणाम अक्टूबर में घोषित होने हैं। प्रदेश के करीब 15 शहर रैंकिंग की दौड़ में हैं। इनमें भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन, सागर और सतना जैसे बड़े शहर शामिल हैं। सर्वेक्षण में कचरा प्रबंधन के साथ मैदानी स्थिति और नागरिकों का फीडबैक भी महत्वपूर्ण होगा।
प्रदेश में एक साल में प्रतिदिन निकलने वाले घरेलू कचरे की मात्रा 1730 टन बढ़ गई। इसके साथ ही कचरे की प्रोसेसिंग में भी अंतर बढ़ा है। एक साल पहले जहां 18.05 टन प्रतिदिन कचरा प्रोसेस नहीं हो पा रहा था, अब यह गैप बढकऱ 55.39 टन प्रतिदिन हो गया है। यानी कचरा सिर्फ पैदा नहीं हो रहा, बल्कि उसके निस्तारण और प्रोसेसिंग की चुनौती भी बढ़ रही है। यही स्थिति शहरों की स्वच्छता रैंकिंग पर असर डाल सकती है।
12,500 अंकों की परीक्षा में मैदान अहम
स्वच्छता अवार्ड की रैंकिंग 12,500 अंकों के आधार पर होगी। इसमें ओडीएफ, वाटर प्लस और गार्बेज फ्री सिटी के लिए 1000-1000 अंक निर्धारित हैं। शेष 10,500 अंक मैदानी निरीक्षण के आधार पर तय किए जाएंगे। यही वजह है कि शहरों में सिर्फ कागजों पर व्यवस्थाएं पूरी होना पर्याप्त नहीं होगा। डंपिंग साइट, कचरे का संग्रहण, सेग्रीगेशन, परिवहन और प्रोसेसिंग जैसी व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति टीम के निरीक्षण में सामने आएगी।
बड़े शहरों में भी कचरे के पहाड़
राजधानी भोपाल के साथ इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन, सागर और सतना जैसे बड़े शहरों में भी कचरे के ढेर और पुराना लीगेसी वेस्ट चुनौती बने हुए हैं। 34 डंपिंग साइटों पर जमा करीब 13 लाख मीट्रिक टन पुराना कचरा शहरों की स्वच्छता व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है।
इस बार धार्मिक स्थल और स्कूल भी जांच के दायरे में
स्वच्छ सर्वेक्षण की टीमों ने फरवरी-मार्च में नगरीय निकायों का सर्वे किया था। इस बार पर्यटक, हेरिटेज और धार्मिक स्थलों के अलावा ऐसे स्थानों की स्वच्छता भी जांची गई, जहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। स्कूलों में बच्चों के व्यवहार में स्वच्छता को लेकर बदलाव आया या नहीं, इसका भी जायजा लिया गया। नई टूलकिट में खुले में शौच और यूरिनेशन रोकने से जुड़ा इंडिकेटर भी शामिल किया गया। टीमों ने सार्वजनिक स्थानों पर इसके लिए उपलब्ध व्यवस्थाओं को भी देखा।
स्वच्छ शहर जोड़ी से छोटे शहरों को फायदा
इस बार स्वच्छ शहर जोड़ी नाम से नई अवार्ड कैटेगरी शुरू की गई है। इसके तहत बेहतर प्रदर्शन करने वाला शहर अपने आसपास के शहर को स्वच्छता के क्षेत्र में सहयोग देकर जोड़ी में पुरस्कार हासिल कर सकता है। पिछले वर्ष मध्यप्रदेश के आठ शहरों—इंदौर, उज्जैन, बुदनी, भोपाल, देवास, शाहगंज, जबलपुर और ग्वालियर—को अवॉर्ड मिला था। इस बार इनके आसपास के शहरों को भी जोड़ी की श्रेणी में फायदा मिलने की संभावना है।
किस क्षेत्र के कितने अंक
दिखाई देने वाली स्वच्छता — 1500
कचरे का सेग्रीगेशन, संग्रहण और परिवहन — 1000
सॉलिड वेस्ट प्रोसेसिंग — 1500
एक्सेस टू सेनिटेशन — 1000
उपयोग किए गए पानी का प्रबंधन — 1000
डीस्लजिंग सर्विसेज का मशीनीकरण — 500
स्वच्छता की एडवोकेसी — 1500
इकोसिस्टम सशक्तिकरण — 1000
स्वच्छता कर्मियों का कल्याण — 500
सिटीजन फीडबैक और शिकायत निवारण — 1000
कुल — 10,500 अंक

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