
- विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी से चरमराई व्यवस्था
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति एक बार फिर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में उजागर हुई है। विधानसभा के पटल पर रखी गई रिपोर्ट बताती है कि राज्य में मानसिक रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन उनके उपचार के लिए न तो पर्याप्त विशेषज्ञ चिकित्सक हैं और न ही सरकार उपलब्ध बजट का प्रभावी उपयोग कर पा रही है। हालत यह है कि प्रदेश में हर सातवां व्यक्ति किसी न किसी मानसिक बीमारी से प्रभावित है और विशेषज्ञों की भारी कमी के कारण बड़ी संख्या में मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा।
कैग ने अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएमएचएस) 2015-16 का हवाला देते हुए बताया कि मध्यप्रदेश की करीब 13.9 प्रतिशत आबादी, यानी लगभग 1.01 करोड़ लोग, मानसिक बीमारियों से प्रभावित हैं। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत की तुलना में 10.70 प्रतिशत अधिक है। इसके बावजूद मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी।
डॉक्टरों की भारी कमी, इलाज पर असर
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू विशेषज्ञ मनोचिकित्सकों की उपलब्धता को लेकर है। कैग के अनुसार प्रदेश में प्रति एक लाख आबादी पर केवल 0.05 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, जबकि न्यूनतम आवश्यकता प्रति एक लाख आबादी पर कम से कम एक मनोचिकित्सक की मानी जाती है। इसका सीधा असर मरीजों के इलाज पर पड़ रहा है। जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में विशेषज्ञों की कमी के कारण बड़ी संख्या में मरीजों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता। गंभीर मानसिक रोगों से पीडि़त लोगों को कई बार इलाज के लिए दूसरे राज्यों के बड़े चिकित्सा संस्थानों का रुख करना पड़ता है।
बजट मिला, लेकिन खर्च नहीं हुआ
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 2020 में राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण (एसएमएचए) का गठन किया था। इसके बाद जनवरी 2021 में वित्त विभाग ने इसके लिए अलग कोष बनाया और वर्ष 2023-24 में ?2.40 करोड़ का बजट भी उपलब्ध कराया। लेकिन कैग ने पाया कि उपलब्ध कराए गए बजट का बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं हो सका। 2020-21 और 2021-22 में जारी राशि का कोई उपयोग नहीं हुआ। 2022-23 में भी बजट का पूर्ण उपयोग नहीं किया गया। 2023-24 में उपलब्ध राशि का 46 से 89 प्रतिशत हिस्सा विभिन्न मदों में खर्च ही नहीं हो पाया। रिपोर्ट के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए धन की कमी नहीं थी, बल्कि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में कमी रही।
कानून बना, लेकिन शिकायत निवारण व्यवस्था नहीं
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम-2017 के तहत प्रत्येक जिले में मेंटल हेल्थ रिव्यू बोर्ड (एमएचआरबी) का गठन किया जाना था, ताकि मानसिक रोगियों और उनके परिजनों की शिकायतों का समयबद्ध निराकरण हो सके। कैग ने पाया कि अधिनियम लागू होने के कई वर्ष बाद भी अधिकांश जिलों में इन बोर्डों का गठन नहीं हो सका। शासन ने भी रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि एमएचआरबी के गठन में देरी हुई है और प्रक्रिया अभी भी जारी है। परिणामस्वरूप मानसिक रोगियों की शिकायतों के निवारण की प्रभावी व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी।
जागरूकता कार्यक्रम भी कागजों तक सीमित
रिपोर्ट में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों की स्थिति पर भी सवाल उठाए गए हैं। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों तथा सिविल सर्जनों को स्कूलों, कॉलेजों, जेलों, पुलिस विभाग, वृद्धाश्रमों और अन्य संस्थानों में मेंटल हेल्थ एवं स्ट्रेस मैनेजमेंट पर सेमिनार आयोजित करने के निर्देश दिए गए थे। इन कार्यक्रमों के लिए बजट भी आवंटित किया गया, लेकिन कैग के परीक्षण में सामने आया कि कई जिलों में ऐसे सेमिनार आयोजित ही नहीं किए गए।
एनएचएम के आंकड़े भी बढ़ाते हैं चिंता
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के आंकड़े भी प्रदेश में मानसिक स्वास्थ्य संकट की गंभीरता को रेखांकित करते हैं। एनएचएम के अनुसार प्रदेश की 13.9 प्रतिशत आबादी, यानी करीब 1 करोड़ 12 लाख लोग, किसी न किसी मानसिक बीमारी से प्रभावित हैं। इनमें लगभग 12 लाख लोग सिजोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर जैसी गंभीर मानसिक बीमारियों से जूझ रहे हैं। जबकि करीब 1 करोड़ लोग अवसाद (डिप्रेशन), तनाव, चिंता और अनिद्रा जैसी मानसिक समस्याओं से प्रभावित हैं।
नीति और व्यवस्था के बीच बढ़ती खाई
कैग की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर नीतिगत स्तर पर कदम तो उठाए गए, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाया। एक ओर प्रदेश में मानसिक रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर विशेषज्ञ चिकित्सकों की भारी कमी, बजट का समुचित उपयोग न होना, शिकायत निवारण तंत्र का अभाव और जागरूकता कार्यक्रमों में ढिलाई जैसी कमियां व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बनाते हुए जिला स्तर पर विशेषज्ञों की नियुक्ति, सामुदायिक परामर्श सेवाओं का विस्तार और जागरूकता अभियानों को प्रभावी बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अन्यथा आने वाले वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य का यह संकट और गहरा सकता है।
