
- विधानसभा समितियों की निष्क्रियता से जनता के पैसों पर निगरानी का सिस्टम ही सुस्त
गौरव चौहान/भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। विधानसभा की समितियां लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की जवाबदेही तय करने का सबसे मजबूत संसदीय माध्यम मानी जाती हैं। सरकार जनता का पैसा कैसे खर्च कर रही है, विभागों की योजनाएं तय नियमों के अनुसार चल रही हैं या नहीं, सरकारी निगम-मंडलों में वित्तीय अनुशासन है या नहीं और विधानसभा में सरकार द्वारा किए गए आश्वासनों का पालन हुआ या नहीं, इन सभी सवालों की जांच-पड़ताल इन्हीं समितियों के जिम्मे होती है। लेकिन मध्य प्रदेश में यही निगरानी तंत्र पिछले कुछ समय से खुद सुस्त पड़ गया है। स्थिति यह है कि कई महत्वपूर्ण समितियां पूरे साल नियमित बैठकें तक नहीं कर सकीं। सबसे अहम सार्वजनिक उपक्रम समिति, जो सरकारी निगमों और मंडलों में हजारों करोड़ रुपये के खर्च और वित्तीय प्रबंधन की समीक्षा करती है, वह भी सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकी। इससे विधानसभा के भीतर सरकार की जवाबदेही तय करने वाली संसदीय व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं।
इसी बीच विधानसभा समितियों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की अध्यक्षता में गठित पीठासीन अधिकारियों की समिति ने 11 महत्वपूर्ण सिफारिशें तैयार कर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी हैं। शनिवार को कोलकाता में आयोजित बैठक में इन प्रस्तावों पर विस्तार से चर्चा हुई। माना जा रहा है कि यदि इन सुझावों को लागू किया गया तो विधानसभा समितियों की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
सार्वजनिक उपक्रम समिति की कार्यप्रणाली पर सवाल
सरकारी कंपनियों, निगमों, मंडलों और उपक्रमों के कामकाज पर नजर रखने वाली सार्वजनिक उपक्रम समिति विधानसभा की सबसे महत्वपूर्ण समितियों में गिनी जाती है। इसका काम केवल वित्तीय अनियमितताओं की जांच करना ही नहीं बल्कि यह देखना भी होता है कि सरकारी संस्थान जनता के हित में काम कर रहे हैं या नहीं। इसके बावजूद समिति का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा। जानकारी के अनुसार तत्कालीन सभापति ऊषा ठाकुर के कार्यकाल में पूरे वर्ष केवल एक बैठक आयोजित की गई। इसके बाद नए सभापति सुरेंद्र पटवा के कार्यभार संभालने के बाद अब तक समिति की एक भी बैठक आयोजित नहीं हो सकी है। ऐसे में सरकारी उपक्रमों से जुड़े मामलों की समीक्षा लंबित पड़ी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समितियां नियमित समीक्षा नहीं करेंगी तो सरकारी कंपनियों में वित्तीय अनुशासन और जवाबदेही दोनों प्रभावित होंगे।
महिला एवं बाल विकास समिति भी रही निष्क्रिय
महिला एवं बाल विकास विभाग की योजनाओं की समीक्षा के लिए गठित समिति की स्थिति भी बेहतर नहीं रही। अर्चना चिटनिस की अध्यक्षता वाली समिति में भी बैठकों का अभाव देखने को मिला। प्रदेश में पोषण अभियान, आंगनबाड़ी सेवाएं, महिलाओं और बच्चों के कल्याण से जुड़ी अनेक योजनाओं पर हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। ऐसे में विभागीय योजनाओं की नियमित समीक्षा नहीं होना चिंता का विषय माना जा रहा है।
कुछ समितियों ने पेश किया बेहतर उदाहरण
जहां कुछ समितियां निष्क्रिय रहीं, वहीं कुछ ने प्रभावी काम भी किया। लोकलेखा समिति के अध्यक्ष भंवर सिंह शेखावत के नेतृत्व में वर्षों से लंबित प्रतिवेदनों का तेजी से निराकरण किया गया। समिति ने वर्ष 2004 से लंबित रिपोर्टों का निपटारा कर महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की। इसी प्रकार आश्वासन समिति ने विधानसभा में सरकार द्वारा दिए गए लंबित आश्वासनों को पूरा कराने की दिशा में उल्लेखनीय काम किया। इससे पहले यशपाल सिंह सिसोदिया के सार्वजनिक उपक्रम समिति के सभापति रहने के दौरान भी रिकॉर्ड संख्या में प्रतिवेदन निपटाए गए थे।
साढ़े चार लाख करोड़ के बजट पर भी होगी निगरानी
मध्य प्रदेश सरकार का वार्षिक बजट लगातार बढ़ रहा है और अब इसका आकार लगभग साढ़े चार लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इतने बड़े बजट की प्रभावी निगरानी के लिए विधानसभा में अब तक कोई स्थायी व्यवस्था नहीं थी। अब विधानसभा बजट मॉनिटरिंग कमेटी गठित करने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित समिति विभिन्न विभागों के बजटीय प्रावधानों, खर्च और योजनाओं के क्रियान्वयन की नियमित समीक्षा करेगी। इससे सरकारी खर्च में पारदर्शिता और जवाबदेही बढऩे की उम्मीद है।
समितियों को प्रभावी बनाने के लिए प्रमुख सुझाव
पीठासीन अधिकारियों की समिति ने विधानसभा समितियों की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं कि प्रत्येक समिति की बैठकों का वार्षिक कैलेंडर पहले से निर्धारित किया जाए, ताकि नियमित समीक्षा सुनिश्चित हो सके। बैठक शुरू करने के लिए न्यूनतम कोरम अनिवार्य किया जाए। सामान्य मामलों में 11 सदस्यों में से कम से कम चार तथा विशेषाधिकार से जुड़े मामलों में पांच से छह सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक हो। विभागीय अधिकारियों की बैठक में उपस्थिति अनिवार्य बनाई जाए, ताकि समितियों को आवश्यक जानकारी और मौखिक साक्ष्य मिल सकें। समितियों द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन और अनुशंसाओं पर संबंधित विभागों के लिए समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। विधानसभा में प्रस्तुत होने वाले महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करने से पहले संबंधित समितियों के पास परीक्षण और विस्तृत समीक्षा के लिए भेजा जाए। बजट की प्रभावी जांच के लिए स्थायी और सलाहकार समितियों का गठन किया जाए। समितियों द्वारा किए गए अध्ययन दौरों के बाद यह भी मूल्यांकन किया जाए कि संबंधित विभागों ने वास्तव में क्या कार्रवाई की।
क्यों महत्वपूर्ण है विधानसभा समितियां
विधानसभा में पूरे सत्र के दौरान हर विषय पर विस्तृत चर्चा संभव नहीं होती। इसलिए अलग-अलग विषयों के लिए समितियों का गठन किया जाता है। ये समितियां विभागीय रिकॉर्ड का अध्ययन करती हैं, अधिकारियों से जवाब मांगती हैं, स्थलीय निरीक्षण करती हैं और अपनी रिपोर्ट विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत करती हैं। इन्हीं रिपोर्टों के आधार पर सरकार की जवाबदेही तय होती है तथा प्रशासनिक सुधारों का रास्ता खुलता है। यदि समितियां निष्क्रिय रहें तो विधानसभा की निगरानी व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है और सरकारी खर्च व योजनाओं की प्रभावी जांच प्रभावित होती है। विधानसभा अध्यक्ष की पहल पर तैयार किए गए सुधार प्रस्तावों से समितियों की कार्यप्रणाली में बदलाव की उम्मीद जरूर जगी है, लेकिन असली परीक्षा इनके क्रियान्वयन की होगी। यदि नियमित बैठकें, समयबद्ध रिपोर्ट, अधिकारियों की अनिवार्य उपस्थिति और सिफारिशों पर कार्रवाई सुनिश्चित होती है तो विधानसभा समितियां एक बार फिर सरकार पर प्रभावी संसदीय नियंत्रण स्थापित कर सकती हैं। अन्यथा जनता के पैसों और योजनाओं की निगरानी करने वाला तंत्र कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।
