- अवैध कॉलोनियों के खिलाफ सख्ती के सरकारी दाव भोपाल में हवा हवाई
- गौरव चौहान

राजधानी भोपाल में अवैध कॉलोनियों के खिलाफ सख्ती के सरकारी दावों के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। नगर निगम द्वारा 500 से अधिक अवैध कॉलोनियां चिन्हित किए जाने के बावजूद अब तक केवल 159 अवैध कॉलोनाइजरों के खिलाफ ही प्राथमिकी दर्ज हो सकी है। इससे भी अधिक गंभीर तथ्य यह है कि वर्ष 2016-17 से दर्ज मामलों में पुलिस द्वारा एक भी चालान न्यायालय में पेश नहीं किया गया है। ऐसे में अवैध कॉलोनियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कागजों तक सीमित नजर आ रही है।
शहर में तेजी से फैल रही अवैध कॉलोनियों के मामले में प्रशासनिक कार्रवाई की रफ्तार और उसके परिणामों पर सवाल उठने लगे हैं। नगर निगम के रिकॉर्ड के अनुसार सबसे अधिक 41 प्रकरण गोरा गांव क्षेत्र से जुड़े हैं, जहां बड़े पैमाने पर अवैध प्लॉटिंग और कॉलोनियों के विकास की शिकायतें सामने आई हैं। इसके बावजूद अधिकांश मामलों में जांच और अभियोजन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी है।
अदालत तक नहीं पहुंचे मामले
अवैध कॉलोनियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद अपेक्षा थी कि पुलिस विवेचना पूरी कर न्यायालय में चालान पेश करेगी, जिससे दोषियों पर कानूनी शिकंजा कस सके। लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी एक भी मामले में चालान पेश नहीं होना पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। परिणामस्वरूप कॉलोनाइजरों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई अधर में लटकी हुई है। नगर निगम अधिकारियों का कहना है कि उनकी ओर से प्रकरण दर्ज कराने और संबंधित विभागों को जानकारी भेजने की प्रक्रिया पूरी कर दी गई है। अब आगे की कार्रवाई पुलिस और अन्य एजेंसियों के स्तर पर लंबित है।
नए कानून के बावजूद पुरानी फाइलों का बोझ
राज्य सरकार ने 1 अप्रैल से अवैध कॉलोनियों पर अंकुश लगाने के लिए इंटीग्रेटेड कॉलोनाइजर एक्ट लागू किया है। इसके तहत अवैध कॉलोनी विकसित करने वालों के लिए 10 वर्ष तक की सजा और एक करोड़ रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। साथ ही प्रत्येक वैध कॉलोनी को यूनिक आईडी देने, प्लॉट रजिस्ट्री को स्वीकृत ले-आउट से जोडऩे और नई अवैध कॉलोनियों पर 45 दिन के भीतर कार्रवाई का प्रावधान भी किया गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पुराने मामलों में प्रभावी अभियोजन और न्यायालयीन कार्रवाई नहीं होगी, तब तक नए कानून का अपेक्षित असर दिखाई देना मुश्किल होगा।
खरीदार सबसे बड़े पीडि़त
अवैध कॉलोनियों के विस्तार का सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों को उठाना पड़ता है। लोग जीवनभर की बचत लगाकर प्लॉट खरीदते हैं, लेकिन बाद में पता चलता है कि कॉलोनी को वैधानिक स्वीकृति ही नहीं मिली है। परिणामस्वरूप सडक़, पानी, सीवर, बिजली और अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिए उन्हें वर्षों तक संघर्ष करना पड़ता है। राजधानी में चिन्हित अवैध कॉलोनियों में नीलबड़, कोलार रोड, बैरागढ़ चीचली, मिसरोद और टीटी नगर क्षेत्र की कई कॉलोनियां शामिल हैं। इनमें माधव बाग, हेवेन्स पार्क, ड्रीमलैंड फार्म, वाटिका फार्म, गोकुल ग्रीन, कुसुमा विहार, हिल्स व्यू सिटी, गोल्डन सिटी, गोल्डन पार्क, दुर्गा विहार कॉलोनी, व्यंकटेश्वर धाम और सांई रेसीडेंसी जैसी कॉलोनियों के नाम सामने आए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब 500 से अधिक अवैध कॉलोनियां चिन्हित हैं, तो एफआईआर केवल 159 मामलों में ही क्यों दर्ज हुई? और जिन मामलों में एफआईआर हो चुकी है, उनमें वर्षों बाद भी चालान अदालत तक क्यों नहीं पहुंचा? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक अवैध कॉलोनियों के खिलाफ सख्ती के दावे अधूरे ही माने जाएंगे।
