आत्मनिर्भर मप्र को मिलेगी उड़ान

आत्मनिर्भर मप्र
  • 1 जुलाई से लागू होगा विकसित भारत जी-राम-जी अधिनियम

मप्र देश का एक मात्र ऐसा राज्य है, जहां श्रमिकों की सर्वाधिक सामाजिक सुरक्षा योजनाएं हैं। श्रम का सम्मान करने में मप्र सरकार हर कदम पर आगे रही है। कामगारों की सामाजिक सुरक्षा मप्र में निरंतर बढ़ती रही है। इसी कड़ी में अब मप्र में एक जुलाई से विकसित भारत जी राम जी अधिनियम लागू होने जा रहा है, जिससे आत्मनिर्भर मप्र को उड़ान मिलेगी।

विनोद कुमार उपाध्याय/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)।
मप्र के ग्रामीण विकास और रोजगार के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। प्रदेश में 1 जुलाई से विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी वीबी-जी राम-जी अधिनियम पूरी तरह लागू हो जाएगा। इस अधिनियम के लागू होने के साथ ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) स्वत: समाप्त हो जाएगा और उसकी जगह यह नई व्यवस्था लागू होगी। केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित यह नया कानून ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और गांवों में स्थायी अधोसंरचना तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। नए अधिनियम के तहत अब ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में 125 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। अभी तक मनरेगा के तहत 100 दिन का रोजगार सुनिश्चित था, लेकिन नई व्यवस्था में रोजगार के दिनों में वृद्धि कर ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त आर्थिक सुरक्षा देने का प्रयास किया गया है। सरकार का मानना है कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन कम होगा, गांवों की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर विकसित होंगे।
वीबी-जी राम-जी अधिनियम को विकसित भारत 2047 के राष्ट्रीय विजन के अनुरूप तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य केवल मजदूरी आधारित रोजगार देना नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादक परिसंपत्तियों का निर्माण करना, स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना और ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता में व्यापक सुधार लाना है। सरकार का दावा है कि यह अधिनियम ग्रामीण विकास के पारंपरिक मॉडल से आगे बढक़र भविष्य उन्मुख विकास की दिशा में काम करेगा। इसमें रोजगार सृजन के साथ-साथ जल संरक्षण, ग्रामीण सडक़ों, आजीविका संसाधनों, कृषि आधारित संरचनाओं और जलवायु परिवर्तन से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी। यह कानून केवल अस्थायी रोजगार कार्यक्रम नहीं रहेगा, बल्कि गांवों में दीर्घकालीन विकास की नींव रखने वाला मॉडल साबित होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाने, कृषि को समर्थन देने और स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के लिए इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अधिनियम के सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में ग्रामीण परिवारों को 125 दिन रोजगार की गारंटी शामिल है। इसके तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य, जो अकुशल श्रम करने के इच्छुक हैं, उन्हें वर्ष में 125 दिन तक रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। सरकार का कहना है कि रोजगार के दिनों में 25 प्रतिशत की वृद्धि से गरीब और मजदूर परिवारों की आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। इससे ग्रामीण परिवारों को आर्थिक संकट के समय अतिरिक्त सहारा मिलेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर खेती के अतिरिक्त रोजगार के अवसर सीमित होते हैं। ऐसे में यह योजना किसानों, खेतिहर मजदूरों, भूमिहीन परिवारों और गरीब वर्ग के लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है। विशेष रूप से ऐसे परिवार, जिनकी आय पूरी तरह मौसमी कृषि पर निर्भर रहती है, उन्हें इससे आर्थिक स्थिरता मिलेगी।

काम नहीं तो मिलेगा बेरोजगारी भत्ता
अधिनियम में श्रमिकों के अधिकारों को भी मजबूत बनाया गया है। यदि कोई श्रमिक रोजगार की मांग करता है और उसे निर्धारित समय सीमा में काम उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो वह बेरोजगारी भत्ते का पात्र होगा। यह प्रावधान प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में अहम माना जा रहा है। इससे स्थानीय निकायों और प्रशासन पर समय पर रोजगार उपलब्ध कराने का दबाव रहेगा। ग्रामीण विकास विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यवस्था से रोजगार मांगने वाले श्रमिकों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी और रोजगार उपलब्ध कराने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी। वीबी-जी राम-जी अधिनियम में मजदूरी भुगतान को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाया गया है। अधिनियम के तहत श्रमिकों को मजदूरी का भुगतान प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) प्रणाली के माध्यम से सीधे उनके बैंक या डाकघर खातों में किया जाएगा। यदि भुगतान निर्धारित समय सीमा में नहीं होता, तो श्रमिक विलंबित भुगतान क्षतिपूर्ति पाने का भी पात्र होगा। यह प्रावधान मजदूरों को समय पर मजदूरी दिलाने के उद्देश्य से जोड़ा गया है। मनरेगा के दौरान कई बार मजदूरी भुगतान में देरी की शिकायतें सामने आती रही हैं। नई व्यवस्था में तकनीकी निगरानी और डिजिटल भुगतान के माध्यम से इन समस्याओं को कम करने का प्रयास किया जाएगा। अधिनियम में जिन कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी, उनमें जल संरक्षण और जल सुरक्षा से जुड़े कार्य प्रमुख हैं। इसके अलावा ग्रामीण सडक़ों, तालाबों, जल संरचनाओं, सिंचाई सुविधाओं, सामुदायिक परिसंपत्तियों और आजीविका से जुड़े निर्माण कार्यों को भी बढ़ावा दिया जाएगा। सरकार का उद्देश्य गांवों में ऐसी परिसंपत्तियां तैयार करना है, जो लंबे समय तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाएं। इसके तहत जल संकट वाले क्षेत्रों में जल संरक्षण संरचनाएं, खेत तालाब, नहर मरम्मत और भूजल संवर्धन जैसे कार्यों को विशेष प्राथमिकता दी जाएगी। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन और प्रतिकूल मौसमीय परिस्थितियों से निपटने के लिए भी योजनाएं बनाई जाएंगी। ग्रामीण क्षेत्रों में बाढ़ नियंत्रण, सूखा प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़े कार्यों को भी शामिल किया जाएगा। वीबी-जी राम-जी अधिनियम को आधुनिक तकनीकी ढांचे से भी जोड़ा गया है। इसमें भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक और पीएम गति शक्ति प्लेटफॉर्म के साथ एकीकरण का प्रावधान किया गया है। इससे गांवों में होने वाले विकास कार्यों की डिजिटल मैपिंग की जा सकेगी और योजनाओं का बेहतर समन्वय संभव होगा। सरकार का दावा है कि इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग, कार्यों की गुणवत्ता में सुधार और विकास परियोजनाओं की समयबद्ध निगरानी सुनिश्चित की जा सकेगी। यह व्यवस्था ग्रामीण विकास योजनाओं को तकनीकी रूप से अधिक सक्षम और परिणाम आधारित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

डिजिटल निगरानी से बढ़ेगी पारदर्शिता
नई व्यवस्था में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर विशेष बल दिया गया है। योजना के क्रियान्वयन में बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, मोबाइल आधारित निगरानी, रियल टाइम डैशबोर्ड और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मॉनिटरिंग प्रणाली का उपयोग किया जाएगा। इसका उद्देश्य फर्जी उपस्थिति, भुगतान में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं को रोकना है। अधिकारियों के अनुसार सभी कार्यों की निगरानी रियल टाइम में की जाएगी और समयबद्ध रिपोर्टिंग सुनिश्चित होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी निगरानी से योजनाओं की गुणवत्ता में सुधार आएगा और सार्वजनिक धन के उपयोग में पारदर्शिता बढ़ेगी। ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल गवर्नेंस को मजबूत करने में भी यह व्यवस्था सहायक होगी। अधिनियम में एक महत्वपूर्ण प्रावधान विराम अवधि का भी किया गया है। इसके तहत एक वित्तीय वर्ष में 60 दिनों की अवधि ऐसी होगी, जब योजना के तहत कार्य नहीं कराया जाएगा। इसका उद्देश्य बुवाई और कटाई के पीक सीजन में कृषि कार्यों के लिए पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध कराना है। कई बार मनरेगा जैसी योजनाओं के कारण किसानों को कृषि कार्यों के लिए मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ता था। नई व्यवस्था में इस समस्या को ध्यान में रखते हुए यह प्रावधान जोड़ा गया है। सरकार का मानना है कि इससे कृषि और ग्रामीण रोजगार योजनाओं के बीच संतुलन बनाया जा सकेगा। किसान संगठनों ने भी इस प्रावधान का स्वागत किया है क्योंकि इससे खेती के महत्वपूर्ण समय में श्रमिकों की उपलब्धता बनी रहेगी।
अधिनियम में ग्राम पंचायतों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है। विकसित ग्राम पंचायत प्लान के माध्यम से पंचायतें स्थानीय जरूरतों के अनुसार कार्ययोजनाएं तैयार करेंगी। ग्राम पंचायतें श्रमिकों का पंजीकरण करेंगी, रोजगार गारंटी कार्ड जारी करेंगी और स्थानीय स्तर पर कार्यों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी निभाएंगी। ग्राम सभा नियमित सामाजिक अंकेक्षण करेगी ताकि योजनाओं की निगरानी जनता के माध्यम से हो सके। ब्लॉक स्तर पर मध्यवर्ती पंचायतें योजनाओं के समेकन और समन्वय का कार्य करेंगी, जबकि जिला पंचायतें समर्पित संचालन समिति के माध्यम से समग्र निगरानी और पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी निभाएंगी। इस प्रकार अधिनियम में विकेंद्रीकृत प्रशासनिक ढांचे पर विशेष जोर दिया गया है ताकि स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों का बेहतर संचालन हो सके।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया आधार
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि योजना का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया आधार मिल सकता है। रोजगार के अवसर बढऩे से गांवों में क्रय शक्ति बढ़ेगी, स्थानीय बाजार मजबूत होंगे और छोटे व्यवसायों को भी लाभ मिलेगा। इसके अलावा जल संरक्षण और अधोसंरचना निर्माण से कृषि उत्पादकता में भी सुधार हो सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में सडक़ों, जल संसाधनों और सामुदायिक परिसंपत्तियों के निर्माण से लंबे समय में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। इस अधिनियम के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में सडक़, तालाब, नहर, जल संरक्षण संरचनाएं, सामुदायिक भवन, खेत सडक़, वृक्षारोपण और सिंचाई से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी। ग्रामीण अधोसंरचना मजबूत होने से गांवों का समग्र विकास संभव होगा। बेहतर सडक़ें बनने से किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने में आसानी होगी। जल संरक्षण के कार्यों से भूजल स्तर सुधरेगा और सिंचाई की सुविधा बढ़ेगी। तालाबों और जल संरचनाओं के निर्माण से सूखे की समस्या से निपटने में भी मदद मिलेगी। इससे कृषि उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आय में सुधार होगा।
मप्र कृषि प्रधान राज्य है। प्रदेश की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। विकसित भारत जी राम जी अधिनियम के तहत किए जाने वाले जल संरक्षण, खेत सुधार और सिंचाई संबंधी कार्य कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने में मदद करेंगे। यदि गांवों में तालाब गहरीकरण, नहर मरम्मत, खेत समतलीकरण और जल संग्रहण संरचनाओं का निर्माण होता है, तो किसानों को पर्याप्त पानी मिल सकेगा। इससे फसल उत्पादन बढ़ेगा और खेती की लागत कम होगी। कृषि आधारित रोजगार बढऩे से ग्रामीण युवाओं को भी गांव में अवसर मिलेंगे। इससे खेती को आधुनिक और लाभकारी बनाने की दिशा में मदद मिलेगी। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं अक्सर आर्थिक रूप से निर्भर रहती हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत स्वयं सहायता समूहों और महिला श्रमिकों को भी रोजगार एवं विकास कार्यों में भागीदारी मिलने की संभावना है। यदि महिलाओं को स्थानीय स्तर पर काम मिलता है, तो उनकी आय बढ़ेगी और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढऩे से सामाजिक सशक्तिकरण भी होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण विकास योजनाओं में महिलाओं की भागीदारी बढऩे से बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। प्रदेश के ग्रामीण युवाओं के सामने रोजगार की बड़ी चुनौती रहती है। अधिनियम के तहत निर्माण कार्य, कौशल आधारित गतिविधियां और विकास परियोजनाओं में युवाओं को काम मिलने की संभावना है। यदि सरकार इन योजनाओं को कौशल विकास कार्यक्रमों से जोड़े, तो ग्रामीण युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण भी मिल सकता है। इससे वे भविष्य में स्वरोजगार या अन्य क्षेत्रों में बेहतर अवसर प्राप्त कर सकेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध होने से युवाओं में बेरोजगारी और निराशा की समस्या कम हो सकती है।

पलायन रोकने में मिलेगी मदद
ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन लंबे समय से बड़ी समस्या रहा है। रोजगार की कमी के कारण बड़ी संख्या में मजदूर शहरों की ओर जाते हैं। सरकार का मानना है कि 125 दिन के रोजगार और स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों से पलायन को कम करने में मदद मिलेगी। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त रोजगार और आय के अवसर उपलब्ध होंगे, तो लोगों को अपने गांव छोडक़र बाहर जाने की आवश्यकता कम पड़ेगी। इससे सामाजिक और पारिवारिक स्थिरता भी बनी रहेगी। हालांकि इस नई व्यवस्था के सामने कई चुनौतियां भी रहेंगी। सबसे बड़ी चुनौती प्रभावी क्रियान्वयन की होगी। योजना के तहत पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना, समय पर भुगतान सुनिश्चित करना और तकनीकी ढांचे को मजबूत बनाना सरकार के लिए महत्वपूर्ण होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और डिजिटल सुविधाओं की कमी भी कई स्थानों पर समस्या बन सकती है। बायोमेट्रिक और डिजिटल निगरानी प्रणाली को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए मजबूत तकनीकी आधार जरूरी होगा। इसके अलावा पंचायत स्तर पर क्षमता निर्माण और प्रशासनिक प्रशिक्षण की भी आवश्यकता होगी ताकि नई व्यवस्था का सही तरीके से संचालन हो सके।
राज्य सरकार ने संकेत दिए हैं कि केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप जल्द ही प्रदेश में वीबी-जी राम-जी अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए विस्तृत नियम जारी किए जाएंगे। इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। सरकार का कहना है कि योजना के सफल संचालन के लिए पंचायतों, जिला प्रशासन और संबंधित विभागों के बीच समन्वय स्थापित किया जा रहा है। बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। वीबी-जी राम-जी अधिनियम को ग्रामीण भारत के लिए एक बड़े संरचनात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। यह केवल रोजगार योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास के व्यापक मॉडल की ओर बढ़ाया गया कदम है। यदि यह योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो मप्र सहित देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, अधोसंरचना और आजीविका के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं। 125 दिन के रोजगार, डिजिटल पारदर्शिता, पंचायत आधारित योजना निर्माण और जल संरक्षण जैसे प्रावधान इसे पारंपरिक योजनाओं से अलग बनाते हैं। अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि 1 जुलाई 2026 से लागू होने के बाद यह नई व्यवस्था जमीन पर कितना प्रभावी साबित होती है और क्या यह वास्तव में ग्रामीण भारत को विकसित भारत ञ्च2047 के विजन की दिशा में आगे बढ़ाने में सफल हो पाती है।

90 लाख को मिलेगा आर्थिक संबल
मप्र की डॉ. मोहन यादव सरकार ग्रामीण विकास और रोजगार के क्षेत्र में एक बड़े परिवर्तनकारी कदम के रूप में प्रस्तुत कर रही है। इस अधिनियम का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को अधिक रोजगार, मजबूत अधोसंरचना, स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति और गांवों को आत्मनिर्भर बनाना है। राज्य सरकार का दावा है कि इस कानून के लागू होने से ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी, पलायन कम होगा और गरीब तथा श्रमिक वर्ग के जीवन स्तर में सुधार आएगा। इस योजना के तहत मप्र में मनरेगा के तहत पंजीकृत कुल श्रमिकों लगभग 90 लाख से अधिक (एक्टिव श्रमिकों की संख्या लगभग 89 लाख) को आर्थिक संबल मिलेगा। यह अधिनियम केवल रोजगार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से गांवों में स्थायी परिसंपत्तियों का निर्माण, कृषि उत्पादकता में वृद्धि, जल संरक्षण, सडक़ और सामुदायिक ढांचे का विकास तथा महिलाओं और युवाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का प्रयास किया जाएगा। गौरतलब है कि मजदूरों के लिए 22 प्रकार की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के संचालन के साथ मध्यप्रदेश मजदूर परिवारों के हित सर्वाधिक योजनाएं चलाना वाला राज्य बन गया है। इन योजनाओं का लाभ देने के लिए श्रम सेवा पोर्टल काम कर रहा है। मुख्यमंत्री जन कल्याण (संबल) योजना में पिछले डेढ़ दशकों में 4.92 लाख मजदूरों को 4749 करोड रुपये की सहायता दी गई है। श्रमिक बन्धुओं के लिए सर्वाधिक योजनाएं चलाई जा रही हैं। इनमें अनुग्रह सहायता, स्थाई एवं अस्थाई रूप से अपंग होने पर सहायता, मप्र श्रम कल्याण बोर्ड के अंतर्गत श्रमिकों को शैक्षणिक छात्रवृत्ति योजना, शिक्षा पुरस्कार योजना, रियायती मूल्य पर कॉपी वितरण योजना, कन्या विवाह सहायता योजना, कल्याणी सहायता योजना, मुख्यमंत्री जन कल्याण प्रसूति सहायता योजना, कक्षा दसवीं और 12 वीं के लिए सुपर-5000 योजना, सायकिल और उपकरण खरीदने के लिए अनुदान योजना, उत्तम श्रमिक पुरस्कार योजना, श्रमिक साहित्य पुरस्कार योजना, अनुग्रह सहायता योजना जैसी योजनाओं का लाभ मिल रहा है। श्रम कल्याण मंडल की विभिन्न योजनाओं में 6646 श्रमिकों को 4 करोड़ 30 लाख 67 हजार रुपए की सहायता दी गई। चालू वित्त वर्ष में मंडल की विभिन्न योजनाओं में 2043 मजदूरों को एक करोड़ 41 लाख 18 हजार रुपए की सहायता दी गई है। इन योजनाओं के प्रारंभ से अब तक 5 लाख 86 हजार मजदूरों को 35 करोड़ 77 लाख की सहायता दी गई। मप्र स्लेट पेंसिल कर्मकार कल्याण मंडल के माध्यम से 2008-09 से 2022-23 तक 17,274 श्रमिकों को 8 करोड 55 लाख रूपये की सहायता दी गई। मध्यप्रदेश भवन एवं संनिर्माण कर्मकार मंडल में दर्ज सभी कामगारों को सहायता दी जा रही है।

सामाजिक सुरक्षा को मिलेगा बल
ग्रामीण गरीब परिवार अक्सर आर्थिक संकट के समय कर्ज और असुरक्षा की स्थिति में पहुंच जाते हैं। नियमित रोजगार मिलने से उनकी आर्थिक स्थिरता बढ़ेगी। जब परिवारों की आय स्थिर होगी, तो वे स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और पोषण पर अधिक खर्च कर पाएंगे। इससे जीवन स्तर में सुधार होगा और गरीबी कम करने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही सामाजिक असमानता को कम करने में भी यह अधिनियम सहायक साबित हो सकता है। जल संरक्षण, वृक्षारोपण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़े कार्य इस अधिनियम का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं। यदि बड़े स्तर पर पौधरोपण और जल संरचनाओं का निर्माण होता है, तो पर्यावरण संतुलन बेहतर होगा। इससे जल संकट कम करने, मिट्टी संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में मदद मिल सकती हैग्रामीण क्षेत्रों में हरित विकास की दिशा में यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जब गांवों में लोगों के पास नियमित आय होगी, तो स्थानीय बाजारों में खरीदारी बढ़ेगी। इससे छोटे दुकानदारों, कारीगरों और स्थानीय व्यापारियों को लाभ मिलेगा। गांवों में निर्माण कार्य बढऩे से सीमेंट, रेत, ईंट, परिवहन और अन्य स्थानीय सेवाओं की मांग भी बढ़ेगी। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। अर्थशास्त्रियों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में पैसा पहुंचने से उसका प्रभाव पूरे स्थानीय बाजार पर पड़ता है और आर्थिक चक्र मजबूत होता है।
मप्र के आदिवासी बहुल जिलों में रोजगार और विकास की चुनौतियां अधिक हैं। ऐसे क्षेत्रों में यह अधिनियम आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ग्रामीण विकास परियोजनाओं से सडक़, पानी और रोजगार की सुविधाएं बढ़ेंगी। इससे आदिवासी समुदायों का जीवन स्तर सुधारने में मदद मिलेगी। यदि योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ, तो पिछड़े क्षेत्रों में आर्थिक असमानता कम करने में भी यह कानून महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। विकसित भारत जी राम जी अधिनियम को ग्रामीण आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। यदि गांवों में रोजगार, अधोसंरचना और आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं, तो ग्रामीण विकास का नया मॉडल तैयार हो सकता है। यह अधिनियम केवल मजदूरी आधारित योजना न रहकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम बन सकता है। स्थायी परिसंपत्तियों का निर्माण, कृषि सुधार, जल संरक्षण और स्थानीय रोजगार के जरिए गांवों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की संभावना दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री डा मोहन यादव मानते हैं कि आर्थिक विकास में श्रम शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका है। केंद्र सरकार ने 29 केंद्रीय कानूनों को एक साथ लाकर चार श्रम संहिताएं लागू की हैं। इनमें वेतन संहिता 2019, औद्योगिक संबंध संहिता 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता 2020 शामिल है। ये संहिताएं पुराने श्रम कानूनों को सरल बनाने और निर्णय प्रक्रिया में सुधार लाने के उददेश्य से लागू की गई हैं। आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना स्वास्थ्य कवर प्रदान करती है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को वृद्धावस्था सुरक्षा प्रदान करने के लिए भारत सरकार ने प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन (पीएम-एसवाईएम) पेंशन योजना शुरू की। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में वन नेशन वन राशन कार्ड योजना से सार्वजनिक वितरण प्रणाली, दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, गरीब कल्याण रोजगार अभियान, महात्मा गांधी बुनकर बीमा योजना, दीन दयाल अंत्योदय योजना, पीएमस्वनिधि, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना आदि जैसी अन्य योजनाएं भी मजदूरों सहित असंगठित श्रेत्र के श्रमिकों के लिए उनकी पात्रता मानदंडों के आधार पर उपलब्ध हैं। ई-श्रम पोर्टल के माध्यम से संगठित एवं असंगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों का पंजीयन कर उन्हें सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराई जाती है। सामाजिक सुरक्षा का चक्र पहली बार इतने व्यापक तौर पर असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों तक पहुंचा है।

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