जितना पानी निकाला जा रहा, उतना जमीन में नहीं जा रहा

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  • मप्र में भूजल के अंधाधुंध दोहन से बन रही जल संकट की गंभीर स्थिति

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम।  मप्र में भूजल के अंधाधुंध दोहन ने जल संकट की गंभीर स्थिति पैदा कर दी है। प्रदेश के 313 विकासखंडों में से 26 ब्लाक अतिदोहित श्रेणी में पहुंच चुके हैं, जिनमें से 25 मालवा-निमाड़ क्षेत्र के हैं। इसके अलावा छह ब्लाक दोहित और 64 अर्धदोहित श्रेणी में हैं। पिछले आठ सालों में यह पांच बीसीएम तक भूजल दोहन बढ़ा है। यह चिंता की बात इसलिए है कि हम जितना पानी निकाल रहे हैं, उतनी रफ्तार से भू जल बढ़ नहीं पा रहा है। हालांकि भू जल रीचार्ज की स्थिति मानसून पर काफी हद तक निर्भर करती है। हालांकि सिमटती जल संरचनाएं भी भू-जल रीचार्जिंग में बढ़ी बाधा बन गये हैं। इस संदर्भ में बड़ी चिंता की बात ये है कि इस बार अलनीनों के सक्रिय होने की चेतावनी दी गयी है। अगर इसने प्रभावित किया तो आने वाले समय में भूजल रीचार्जिंग बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। इसका सीधा असर न केवल पेयजल बल्कि खेती पर पड़ सकता है।
 चिंताजनक बात यह है कि पिछले लगभग 15 वर्षों से स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते भूजल संरक्षण के लिए ठोस और दीर्घकालिक प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में प्रदेश के कई हिस्सों में गंभीर जल संकट खड़ा हो सकता है।गौरतलब है कि प्रदेश में भूजल भंडारण मानसून पर निर्भर है। चूंकि ग्रामीण जल आपूर्ति का लगभग 70 प्रतिशत दारोमदार भूजल पर निर्भर है। शहरी क्षेत्र भी समान रूप से प्रभावित होगा। दरअसल शहरी क्षेत्रों के आसपास के ताल तलैया सिमटे हैं। वहीं बरसात का पानी कांक्रीटकरण होने भू जल में तब्दील नहीं हो पाता है। फिलहाल केंद्रीय भू जल बोर्ड की हालिया रिपोर्ट बताती है कि राज्य में औसतन 59.32 प्रतिशत भूगर्भका इस्तेमाल हो रहा है। बीते साल 2024 की तुलना में साल 2025 में सालाना भू जल दोहन 19.85 प्रतिशत से बढ़कर 20.26 प्रतिशत हो गया है। भू जल दोहन का स्तर 58.40 प्रतिशत से बढ़कर 59.32 प्रतिशत चला गया है। इसका मतलब है कि इन जिलों में जितना पानी निकाला जा रहा है, उतना हर साल वापस जमीन में जमा ही नहीं हो पा रहा। राज्य का कुल सालाना भूजल भरण क्षमता 36.7 बिलियन क्यूबिक मीटर है।
लगातार बढ़ रहा भू-जल दोहन
 प्रदेश के कई क्षेत्रों में भूजल का अत्यधिक दोहन लगातार जारी है। पिछले डेढ़ दशक से स्थिति लगभग समान बनी हुई है, लेकिन इसके समाधान के लिए गंभीर और प्रभावी प्रयास नहीं किए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण के प्रति जागरूकता और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के बिना स्थिति में सुधार संभव नहीं है। हर साल जमीन से करीब 34 हजार बीएमसी पानी निकाला जा सकता है। 317 असेसमेंट यूनिट्स (313 ब्लॉक और 4 शहरी इलाके) में से, 26 यूनिट्स (8.2 प्रतिशत) को आत्याधिक दोहन, 6 यूनिट्स (1.89 प्रतिशत) को कठिन, 64 यूनिट्स (20.19 प्रतिशत) को कम कठिन और 221 यूनिट्स (69.72 प्रतिशत) को सेफ कैटेगरी में रखा गया है। राज्य का ज्यादातर अत्यधिक दोहन वाला इलाका पश्चिमी हिस्से यानी मालवा क्षेत्र में है, जहां पिछले दशकों में पानी निकालने की दर कई गुना बढ़ गई है। कुछ जिलों के 64 क्षेत्र क्रिटिकल स्थिति में हैं। इनमें आगर मालवा, अनूपपुर, अशोक नगर, बड़वानी, बैतूल, भोपाल, बुरहानपुर, छतरपुर, छिंदवाड़ा, दमोह, देवास, गुना, ग्वालियर, होशंगाबाद, इंदौर, जबलपुर, झाबुआ, खंडवा, मंडला, मैहर, मंदसौर, नरसिंहपुर, राजगढ़, रतलाम, सिवनी, शिवपुरी, टीकमगढ़, उज्जैन  और विदिशा शामिल हैं। वहीं 6 जिले क्रिटिकल स्थिति में हैं, इनमें छिंदवाड़ा, धार, इंदौर, राजगढ़, सतना और सीहोर शामिल है। जबकि 26 जिले अति दोहित हैं, जिनमें इंदौर, धार, देवास, बड़वानी, मंदसौर, नीमच, रतलाम, राजगढ़, शाजापुर और उज्जैन शामिल हैं।

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