
केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। मंदिर का मैनेजमेंट देखने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, किसी धर्म की प्रथा सही है या नहीं, यह तय होगा उसी समुदाय की आस्था के आधार पर। जज खुद यह तय नहीं करेंगे कि धर्म के लिए क्या सही है, क्या गलत। उन्होंने कहा कि धर्म एक समूह या समुदाय की आस्था से जुड़ा है। इसलिए कुछ लोगों के अधिकार को पूरे समुदाय के अधिकारों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता। कानून को कमजोर करने में संवैधानिक नैतिकता का इस्तेमाल गलत क्या संवैधानिक नैतिकता को अलग-अलग परिस्थितियों में अलग तरह से नहीं समझा जा सकता? हम इसके कुछ तय मानक बना सकते हैं, फिर सीधे क्यों कहें कि यह लागू नहीं होती? सिंघवी: अगर कोई कानून नहीं है, तो मायलॉर्ड्स परंपरा या संविधान की भावना का सहारा ले सकते हैं। जस्टिस अमानुल्लाह: यह एक बदलने वाला सिद्धांत है। सिंघवी: जहां-जहां इसे कानून को कमजोर करने के बड़े आधार के रूप में इस्तेमाल किया गया है, मैं कहूंगा कि वह गलत है। यह इस्तेमाल, गलत इस्तेमाल है, क्योंकि इसका डॉ. अंबेडकर की सोच से सीधा संबंध नहीं है।
