कृषि विकास का मॉडल बना मप्र

कृषि
  • डॉ. मोहन सरकार की योजनाओं, तकनीकी और नवाचार का असर

मप्र देश का एक मात्र राज्य है जहां खेती-किसानी के लिए सबसे अधिक योजनाएं हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का पूरा फोकस किसानों के उत्थान पर है। सरकार की नीति और नियत का असर यह देखने को मिल रहा है कि मप्र आज कृषि विकास का मॉडल बना हुआ है।

विनोद कुमार उपाध्याय/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)।
मप्र कृषि क्षेत्र में नवाचार, तकनीक और नीतिगत सुधारों के दम पर देश का प्रमुख फूड-बास्केट और कृषि विकास मॉडल बन गया है। सोयाबीन, चना, दलहन और तिलहन उत्पादन में अग्रणी राज्य ने सिंचाई क्षमता 24 प्रतिशत से बढ़ाकर 45.3 प्रतिशत से अधिक कर, 7.3 प्रतिशत की उच्च कृषि विकास दर हासिल की है। डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार सिंचाई विस्तार, 90 प्रतिशत सोलर पंप सब्सिडी, भावांतर योजना, और कृषि उत्पादों की ब्रांडिंग द्वारा किसानों की आय दोगुनी करने व कृषि को लाभप्रद व्यवसाय बनाने की दिशा में तेजी से अग्रसर है। खेती में ड्रोन, स्मार्ट कृषि यंत्र और रीयल-टाइम डेटा का उपयोग बढ़ाया जा रहा है। प्रदेश में सिंचाई का रकबा 55 लाख हेक्टेयर से अधिक हो गया है, जिसे 2028 तक 100 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य है। सोयाबीन, चना, सरसों के लिए भावांतर भुगतान योजना और सोलर पंप पर 90 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जा रही है। प्राकृतिक कृषि को मिशन मोड पर लिया जा रहा है, जिसमें गाय आधारित खेती के लिए अनुदान मिल रहा है। वहीं पारंपरिक खेती के अलावा उद्यानिकी, पशुपालन और मत्स्य पालन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। मप्र की मोहन सरकार में किसानों की समृद्धि और ग्रामीण विकास की योजनाएं आदर्श शासन की दिशा में एक सार्थक प्रयास हैं। लंबे समय से भारत का सोयाबीन स्टेट और कृषि प्रधान प्रदेश कहे जाने वाले मप्र की बड़ी आबादी सीधे तौर पर खेती और उससे जुड़े कार्यों पर निर्भर करती है। इस स्थिति में किसानों की समृद्धि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सशक्त होना प्रदेश के विकास की आधारशिला माना जाता है। राज्य के किसानों के हित की सोचते हुए मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वर्ष 2026 को कृषक कल्याण वर्ष के रूप में घोषित किया है। अपने इस संकल्प को अमली जामा पहनाने के लिए राज्य के बड़वानी जिले के जनजातीय बहुल गांव नागलवाड़ी में आयोजित पहली कृषि कैबिनेट ने प्रदेश की राजनीति और प्रशासन में एक नई परंपरा की शुरुआत की है।
मप्र में आधुनिक खेती केवल पारंपरिक धान और गेहूं तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि इस समय किसान फलों, सब्जियों, दुग्ध उत्पादन, मत्स्य पालन और प्रोसेसिंग उद्योग से भी जुड़े हुए हैं। निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि सरकार की यह बहु-विभागीय योजना किसानों की आय के नए स्रोत तैयार करने में काफ़ी मददगार साबित हो सकती है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की नेतृत्व शैली देश में एक अलग पहचान बना रही है। वे प्रशासन को केवल कार्यालयों तक सीमित न रखते हुए कि उसे जनता के बीच ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। नागलवाड़ी कृषि कैबिनेट इसका एक बड़ा उदाहरण बन गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सोच में ग्रामीण विकास को प्राथमिकता, किसानों के साथ सीधा संवाद, आधुनिक तकनीक और परंपरा का संतुलन यही तीन बातें प्रमुख रूप से दिखाई देतीं हैं। करोड़ों रुपए की योजनाएं, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा, किसानों से सीधा संवाद और जनजातीय क्षेत्रों के विकास की प्रतिबद्धता ये सभी कदम मिलकर एक नई कृषि क्रांति का संकेत बन रहे हैं। कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मप्र कृषि विकास के एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। यदि सरकार की तैयार की गई सभी योजनाएं इसी गति से आगे बढ़ती रहीं मप्र केवल कृषि प्रधान राज्य ही नहीं बल्कि कृषि समृद्धि का राष्ट्रीय मॉडल बनकर भी उभरेगा।
विभागीय योजनाओं का लाभ
किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री एदल सिंह कंषाना ने कहा है कि किसानों को विभागीय योजनाओं का भरपूर लाभ मिल रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग की योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन किया जा रहा है। प्रदेश के लाखों किसानों को योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है। कृषि मंत्री कंषाना ने कहा कि खादय एवं पोषण सुरक्षा मिशन के तहत जिलों में दलहन, धान, गेहूं, मोटा-अनाज (श्रीअन्न), न्यूटीसीरियल, गन्ना एवं कपास फसलों के उत्पादन में बढ़ोतरी करना है। खादय एवं पोषण सुरक्षा (कृषि उन्नति योजना खादय एवं पोषण सुरक्षा मिशन) में चयनित 369324 कृषकों को लाभांवित किया गया है। सबमिशन ऑन एग्रीकल्चर एक्सटेंशन आत्मा की प्रमुख गतिविधियों में कुल लगभग 158763 से अधिक कृषक लाभान्वित हए हैं। रिमोट सेसिंग तकनीक का उपयोग कर खरीफ-2024 से राज्यव्यापी डिजीटल क्रॉप सर्वे किया जा रहा है तथा प्रदेश के सभी क्षेत्रों में उगाई जा रही फसलों का मोबाईल ऐप के माध्यम से जियो टैग सर्वे किया जा रहा है। उर्वरक के लिये भोपाल जिले में पायलेट किया जा रहा है जिसका राज्य व्यापी क्रियान्वयन बीज परीक्षण के लिये भी प्रस्तावित है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के रूप में इस वर्ष प्रदेश के 84 लाख से अधिक कृषकों को 2 किस्तों में3378 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया है। इसी तरह मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना में 3374 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया है।
धरती माता बचाओ अभियान के लिए प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर, अनुभाग स्तर एवं जिला स्तर पर समितियों का गठन किया गया है, जिसका उददेश्य सलित उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देना एवं उर्वरक के अवैधानिक उपयोग को नियंत्रण एवं मृदा स्वास्थ्य में सुधार किया जाना है। जैविक खेती को प्रोत्साहित एवं बढावा देने के लिए वर्ष 2025-26 में 43350 हैक्टेयर में सर्विस प्रोवाईडर के माध्यम से कृषक समूहों में जैविक प्रमाणीकरण कार्यक्रम क्रियान्वित है। कृषकों को राशि रुपये 5000 प्रति हैक्टेयर प्रति वर्ष अनुदान देय है। प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित एवं बढावा देने के लिये 1513 क्लस्टर में 189125 एकड़ में 189125 किसानों के साथ क्रियान्वित किया जा रहा है। प्रत्येक कृषक को 4000 रुपए प्रति एकड़ प्रति वर्ष अनुदान का प्रावधान है। इसके लिए 3026 कृषि सखी चयनित एवं प्रशिक्षित कर प्रति कृषि सखी को 5000 रुपए मानदेय प्रतिमाह दिए जाने का प्रावधान है। दाल वाली फसलों तुअर, उड़द एवं मसूर पर विशेष ध्यान देते हुए दलहन उत्पादन एवं क्षेत्रफल विस्तार करने के लिए 11 अक्टूबर 2025 से दलहनों में आत्मनिर्भरता मिशन प्रारम्भ हुआ है। वर्तमान में दलहन उत्पादन में मप्र प्रथम स्थान पर है। वर्ष 2024-25 में दलहन का कुल क्षेत्रफल 44.92 लाख हैक्टेयर रहा, जिसे आगामी 03 वर्षों में लगभग 55 लाख हैक्टेयर किये जाने का लक्ष्य है। प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना का शुभारंभ कृषि उत्पादकता और ग्रामीण समृद्धि को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया है। योजना में मप्र के 8 जिले अनूपपुर, शहडोल, उमरिया, सीधी, आलीराजपुर, निवाड़ी, टीकमगढ़ एवं डिंडौरी को शामिल किया गया है। प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना में कृषि विभाग की 19 तथा अन्य विभागों की 17 प्रचलित योजनाओं का अभिसरण किया जा रहा है।
तकनीकी नवाचार
मप्र के राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने कहा है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देशन में प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2025-26 को कृषक कल्याण वर्ष के रूप में मनाते हुए किसानों की आय वृद्धि, आधुनिक कृषि तकनीकों के विस्तार और पारदर्शी कृषि प्रबंधन की दिशा में लगातार कार्य किए जा रहे हैं। इसी क्रम में मप्र ने कृषि क्षेत्र में तकनीकी नवाचार को अपनाते हुए डिजिटल फसल सर्वेक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।डीसीएस के सटीक, पारदर्शी और प्रभावी क्रियान्वयन में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए केंद्र सरकार द्वारा मप्र को 130 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई है। राजस्व मंत्री वर्मा ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा फसल सर्वेक्षण प्रणाली (गिरदावरी) को आधुनिक, पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाने के लिए जियो-फेंसिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई/एमएल) और सैटेलाइट डेटा जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का प्रभावी उपयोग किया जा रहा है।डिजिटल फसल सर्वेक्षण में जियो-फेंसिंग तकनीक के माध्यम से सर्वेक्षण का भौतिक सत्यापन सुनिश्चित किया गया है। इसके तहत सर्वेयर की खेत पर प्रत्यक्ष उपस्थिति अनिवार्य की गई है, जिससे बिना स्थल निरीक्षण के डेटा दर्ज नहीं किया जा सकेगा। राजस्व मंत्री वर्मा ने कहा कि जमीनी स्तर पर एकत्रित डेटा का मिलान एआई/एमएल तकनीक और सैटेलाइट इमेजरी से किया जा रहा है। इससे सर्वेक्षण की सटीकता और विश्वसनीयता में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है और मानवीय त्रुटियों की संभावना न्यूनतम हुई है।किसानों को सर्वेक्षण और विभिन्न योजनाओं की जानकारी समय पर उपलब्ध कराने के लिए एसएमएस और एआई आधारित वॉइस कॉल की सुविधा शुरू की गई है। इससे किसानों को उनकी अपनी भाषा में सीधे मोबाइल पर आवश्यक सूचनाएं दी जा रही हैं।
डिजिटल क्रॉप सर्वे (डीसीएस) में खेत पर उपस्थित होकर फसल की फोटो लेकर जानकारी दर्ज की जाती है। सर्वे डेटा का एआई एल्गोरिदम से क्रॉस-वेरिफिकेशन कर डेटा की शुद्धता सुनिश्चित की जा रही है।सर्वे डेटा का त्रिस्तरीय सत्यापन किया जा रहा है, जिसमें पटवारी स्तर पर जांच और विभिन्न विभागों द्वारा डेटा का उपयोग शामिल है। जियो-फेंसिंग तकनीक से यह भी सुनिश्चित किया गया है कि सर्वे केवल वास्तविक खेत स्थान पर पहुंचकर ही प्रारंभ हो। इंटरनेट उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में भी सर्वे के दौरान ली गई तस्वीरों की प्रामाणिकता और सही लोकेशन का सत्यापन प्रणाली द्वारा किया जाता है। साथ ही सर्वे को निर्धारित समयावधि से जोड़ा गया है, जिससे मोबाइल समय में छेड़छाड़ होने पर प्रणाली स्वत: सर्वे को रोक देती है। फसल क्षेत्र, उत्पादन अनुमान और योजनाओं के क्रियान्वयन में डेटा आधारित निर्णय लेने में भी यह प्रणाली सहायक सिद्ध हो रही है। डिजिटल तकनीकों के प्रभावी उपयोग से मप्र में कृषि प्रबंधन अधिक सुदृढ़, पारदर्शी और किसान हितैषी बन रहा है। उन्नत तकनीक, पारदर्शी डेटा प्रबंधन और केंद्र-राज्य समन्वय से यह पहल किसानों के हित में मजबूत डिजिटल आधार तैयार कर रही है।
आधुनिक तकनीक से कृषि प्रबंधन
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का कहना है कि मप्र में कृषि क्षेत्र को आधुनिक तकनीक से जोडक़र फसल प्रबंधन को अधिक सटीक, पारदर्शी और प्रभावी बनाया जा रहा है। राज्य सरकार की ‘सारा’ और ‘उन्नति’ एग्री-जीआईएस प्रणाली से उपग्रह चित्रों, ड्रोन सर्वेक्षण और खेतों की वास्तविक तस्वीरों का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग (एमएल) से विश्लेषण किया जा रहा है। इससे फसल निगरानी और उत्पादन आंकलन को वैज्ञानिक आधार मिला है और किसानों को योजनाओं का लाभ अधिक पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से मिल रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि ‘उन्नति’ प्लेटफॉर्म और ‘सारा’ एप्लिकेशन से क्रॉप मैपिंग और फसल गिरदावरी की प्रक्रिया को आधुनिक तकनीक से जोड़ा गया है। डीप लर्निंग तकनीक से ‘सारा’ ऐप द्वारा प्राप्त लाखों तस्वीरों का विश्लेषण कर खेत स्तर पर बोई गई फसलों के प्रकार का सत्यापन किया जाता है, जिससे फसलों की वास्तविक स्थिति का सटीक आंकलन संभव हो रहा है।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि स्मार्ट क्रॉप मैपिंग और पहचान के लिए उपग्रह चित्रों और रैंडम फॉरेस्ट मॉडल का उपयोग कर भूमि खंड (खसरा) स्तर पर फसलों की पहचान की जा रही है। साथ ही अधिसूचित फसलों के लिए ‘पटवारी हल्का’ स्तर पर उपज का पूर्वानुमान भी लगाया जा रहा है। इससे कृषि योजना निर्माण, खाद्यान्न खरीद व्यवस्था और फसल बीमा प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल रही है। इस तकनीकी पहल से फसल पहचान और आकलन की सटीकता में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है। वर्ष-2022 में जहाँ सटीकता 66 प्रतिशत थी, वहीं वर्ष-2025 तक यह बढक़र लगभग 85 प्रतिशत हो गई है। हाल के रबी और खरीफ सीजन में इस प्रणाली से 5 करोड़ 37 लाख से अधिक खेतों की तस्वीरों का विश्लेषण किया गया है, जिससे रीयल-टाइम फसल पहचान संभव हुई है। इस प्रणाली से 3 करोड़ से अधिक भूमि खंडों में बोई गई फसलों का डिजिटल मैपिंग किया गया है। साथ ही प्रमुख फसलों की पहचान और डिजिटल फसल गिरदावरी का सत्यापन भी किया जा रहा है। वर्ष 2023 से ‘पटवारी हल्का’ स्तर के लगभग 22 हजार क्षेत्रों में फसल उत्पादन का आंकलन किया जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि भू-स्थानिक (जियो-स्पेशियल) तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग आधारित यह प्रणाली किसानों, सर्वेक्षकों और फसल बीमा कंपनियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही है। इससे जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में फसल नुकसान का समय पर आकलन संभव होगा, जिससे किसानों को मुआवजा सुनिश्चित करने में भी सहायता मिलेगी। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, राजस्व विभाग और किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग के समन्वित प्रयासों से विकसित यह पहल मप्र की कृषि व्यवस्था को तकनीक आधारित, पारदर्शी और भविष्य उन्मुख बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों को आय सुरक्षा और बेहतर कृषि प्रबंधन का लाभ मिलेगा।
गौ-आधारित प्राकृतिक खेती
मप्र आज प्राकृतिक खेती की पहचान बन गया है। प्रधानमंत्री रेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत आज विकास के उस मार्ग पर अग्रसर है, जहाँ आर्थिक प्रगति के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सांस्कृतिक मूल्यों को समान महत्व दिया जा रहा है। इसी समग्र दृष्टि के अंतर्गत भारतीय कृषि को भी एक नए युग की ओर ले जाया जा रहा है। कृषि सदियों से हमारी सभ्यता की रीढ़ रही है। आधुनिक युग में रासायनिक उर्वरकों और सिंथेटिक कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता ने खेती की लागत बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता, उसकी जलधारण क्षमता और दीर्घकालिक स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप, हमारे भोजन की गुणवत्ता और नागरिकों के स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि भारत की समस्याओं का समाधान हमारी अपनी परंपराओं और ज्ञान प्रणाली में निहित है। इसी विचार से प्राकृतिक खेती को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहन मिल रहा है, जो भारतीय कृषि की मूल आत्मा से जुड़ी हुई है। आज आवश्यकता इस बात की है कि कृषि को केवल उत्पादन के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, स्थिरता और आत्मनिर्भरता के व्यापक संदर्भ में देखा जाए। भारत की पारंपरिक कृषि व्यवस्था सह-अस्तित्व और संतुलन पर आधारित रही है, जिसमें गौमाता की भूमिका केंद्रीय रही है। गौ केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि उत्पादकता और पोषण सुरक्षा का आधार रही हैं। हमारे पूर्वज जानते थे कि गौवंश का संरक्षण सीधे मिट्टी के स्वास्थ्य से जुड़ा है। गोबर और गोमूत्र से भूमि को पोषण मिलता है, सूक्ष्म जीव सक्रिय होते हैं और मिट्टी पुन: जीवंत होती है। स्वस्थ मिट्टी से प्राप्त अन्न अधिक पौष्टिक, सुरक्षित और मानव शरीर के अनुकूल होता है। प्रधानमंत्री मोदी की दृष्टि में प्राकृतिक खेती केवल एक कृषि तकनीक नहीं, बल्कि जीवन जीने की भारतीय पद्धति है। वे इसे किसानों की लागत घटाने, आय बढ़ाने और उन्हें बाहरी निर्भरता से मुक्त करने का सशक्त माध्यम मानते हैं। साथ ही, यह देशवासियों को रसायन-मुक्त, विषरहित भोजन उपलब्ध कराने का मार्ग है। यही कारण है कि प्राकृतिक खेती को आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ा गया है।
प्राकृतिक खेती की कार्यप्रणाली सरल, स्वदेशी और प्रभावशाली है। इसमें गौशालाओं को केवल संरक्षण केंद्र नहीं, बल्कि कृषि आदानों के उत्पादन के आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। गोबर और गोमूत्र से तैयार जीवामृत, बीजामृत और पंचगव्य जैसे प्राकृतिक इनपुट मिट्टी के सूक्ष्म जीवों को सक्रिय करते हैं और भूमि की उर्वरता को दीर्घकालिक रूप से बढ़ाते हैं। पलवार (मल्चिंग) जैसी तकनीकें मिट्टी की नमी बनाए रखती हैं, जल संरक्षण में सहायक होती हैं और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से फसलों की रक्षा करती हैं। इन उपायों से खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आती है, जिससे शून्य बजट प्राकृतिक खेती का लक्ष्य व्यवहारिक रूप से संभव होता है। प्राकृतिक खेती को जन-आंदोलन बनाने में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह जी का मार्गदर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके विजन सहकारिता से समृद्धि के तहत, प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को संगठित किया जा रहा है एवं किसान उत्पादक संगठनों को सशक्त बनाया जा रहा है ताकि छोटे किसानों को न केवल सस्ती दरों पर प्राकृतिक खाद-बीज मिल सकें, बल्कि उनके विषमुक्त उत्पादों को उचित बाजार और लाभकारी मूल्य भी प्राप्त हो सके। गौ-आधारित प्राकृतिक खेती और सहकारिता का मेल ही ग्रामीण समृद्धि का नया मार्ग है। प्राकृतिक खेती का महत्व केवल खेत तक सीमित नहीं है; इसका सीधा संबंध मानव स्वास्थ्य और जीवनशैली से है। आज जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं, जिनका एक बड़ा कारण रासायनिक अवशेषों से युक्त भोजन है। प्राकृतिक खेती से प्राप्त शुद्ध और विषमुक्त अन्न पाचन तंत्र को सुदृढ़ करता है, रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और दीर्घकालिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। ्रधानमंत्री मोदी द्वारा योग और आयुष को वैश्विक पहचान दिलाना इसी समग्र स्वास्थ्य दृष्टि का हिस्सा है। योग, प्राणायाम और संतुलित दिनचर्या तभी पूर्ण लाभ देती है जब भोजन भी शुद्ध और प्राकृतिक हो। प्राकृतिक खेती, स्वस्थ भोजन और योग—तीनों मिलकर स्वस्थ भारत की परिकल्पना को साकार करते हैं। प्राकृतिक खेती को अपनाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी का व्यावहारिक मंत्र—‘एक एकड़, एक मौसम’—किसानों के लिए प्रेरणास्रोत है। छोटे स्तर पर प्रयोग कर किसान बिना जोखिम उठाए परिणाम देख सकता है और फिर धीरे-धीरे विस्तार कर सकता है। केंद्र सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन, आदानों की उपलब्धता और बाजार से जोडऩे के लिए मजबूत संस्थागत समर्थन दिया जा रहा है। किसान उत्पादक संगठन इस दिशा में अहम भूमिका निभा रहे हैं, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को सामूहिक शक्ति प्राप्त हो रही है। यह भी उल्लेखनीय है कि महिला किसान इस परिवर्तन में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। इस संपूर्ण प्रयास में गौ-सेवा का स्थान केंद्रीय है। गौवंश का संरक्षण और संवर्धन केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण रोजगार और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी जी की दृष्टि में गौ-आधारित प्राकृतिक खेती ग्रामीण भारत को सशक्त बनाने और सतत विकास सुनिश्चित करने का एक प्रभावी माध्यम है। मध्यप्रदेश सरकार प्रधानमंत्री श्री मोदी की इस दूरदर्शी सोच को धरातल पर उतारने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। राज्य में प्राकृतिक खेती, गौ-संवर्धन और किसान कल्याण को समन्वित रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। हमारा लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मिट्टी, किसान और उपभोक्ता—तीनों के स्वास्थ्य की रक्षा करना है। गौ-आधारित प्राकृतिक खेती केवल कृषि सुधार की पहल नहीं, बल्कि भारतीय जीवनदृष्टि का पुनर्जागरण है। गौमाता और मिट्टी की रक्षा के अपने सांस्कृतिक दायित्व को निभाते हुए, हम आने वाली पीढिय़ों के लिए स्वस्थ भोजन, संतुलित जीवनशैली और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं। यही प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के विकसित, आत्मनिर्भर और स्वस्थ भारत के स्वप्न को साकार करने का सशक्त मार्ग है।

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